‘जैसे हो वैसे ही शरण हो जाओ।’ जैसे हैं उनके हैं-ऐसा विश्वासकर सचमुच ही अपने-आपको भगवान्की शरणमें अर्पण कर दो, फिर तुम्हारी शुद्धि स्वयं भगवान् करेंगे।
२४-शरणागतिके दो स्वरूप हैं। (१) शुद्ध होकर भगवान्की शरणमें जाना। इसमें शुद्धिके लिये अपना बल लगाना पड़ता है; अपने बलपर शुद्धि करनी पड़ती है। (२) ‘जैसे हो वैसे ही शरण…







