क्यों रे मन तू इतना गन्दा क्यों है……

क्यों रे मन तू इतना गन्दा क्यों है……

यह मन दूसरों की कमियां भर भर करके गिनाता है, जबकि अपनी कमी पर सोचता तक नहीं. दूसरों को भाषण तो बहुत देता है, पर खुद सही चीज पर टिक पाता नहीं.

तू इसलिए गन्दा है, क्योंकि तू प्रभु का नाम जप करने नहीं देता, जब भी नाम जप भजन करने बैठे, कही से कही उलझा देता है. कभी घर, कभी बाहर, कभी काम, कभी क्रोध कभी मोह आदि में फंसा देता है.

महाराज जी कहते है, नाम जप bhajan कीर्तन होगा नहीं करना पड़ेगा, जबरदस्ती करना पड़ेगा, चाहे मन लगे ना लगे, चाहे भाव आये ना आये, वरना ये मन कहाँ से कहां से पहुंचा देगा.

ये मन ही तो है जो गंदे से गन्दा बना देता है और ये मन ही तो है जो अच्छे से अच्छा बना देता है.

ऐ आँखें हमेशा इस मन पर नजर रख, ऐ बुद्धि इसके झांसे में मत आ, इसकी चाल को पकड़.

हे प्रभु तू ही इसे शासन में लेने की हममें हिम्मत दें. हमारी अकेले की बस की तो नहीं. गुरु जी और आप ही अब इस गंदे मन को संभालने में सामर्थ दें.

महाराज जी कहते है, इस मन में एक बार प्रभु का का रंग चढ़ गया, तो भगवान् को दिलवाके छोड़ेगा फिर इसे भगवान् के अलावा कोई भोग परास्त नहीं कर सकते.

महाराज जी कहते है, हर सांस में नाम चले, पर ऐसा कैसे होगा, फिर सोचता हूँ अरे कुछ तो होगा, मन की चाल में ना फंस, रोज रोज कोशिश तो कर, महाराज जी तो साफ़ कहते है, नाम तुम्हे धन भी देगा और धन देने वाले को यानि भगवान् को भी देगा, जब धन मिलेगा, भगवान् भी मिलेंगे, तो तू क्यों काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर में फंस रहा है.

चल कोशिश तो शुरू कर, विषयी पुरुष बनना है या परमार्थी.

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