स्कूलों में आखिर क्यों 3 साल के बच्चे को एडमिशन देने का नियम है?

स्कूलों में आखिर क्यों 3 साल के बच्चे को एडमिशन देने का नियम बनाया गया है। बच्चा इतना छोटा होता है कि उसे बड़े स्कूल में भेजना बहुत जोखिम भरा होता है।

मुझे याद है कि जब हम 5 साल के थे, तब हमारा स्कूल में एडमिशन पहली कक्षा में हुआ था। हमारे माता-पिता बताते हैं कि हम पास 5 साल में शारीरिक और मानसिक तौर पर थोड़ा बहुत आत्मनिर्भर हो गए थे।

अब मेरे पड़ोस में एक छोटी सी बच्ची है जो अभी 3 साल की भी पूरी नहीं हो पाई है और अब उसे 1 अप्रैल से जबरन स्कूल जाना पड़ेगा क्योंकि वह मार्च महीने के अंतिम दिनों में 3 साल की पूरी हो रही हैं। शारीरिक और मानसिक तौर पर स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं दिखती लेकिन इसके बावजूद भी मौजूदा सिस्टम की वजह से उसे स्कूल जाना ही पड़ेगा।

कम उम्र में ही बच्चे को स्कूल भेजना का यह सिस्टम सीधे तौर पर प्राइवेट स्कूलों को फायदा पहुंचता हुआ दिखता है।

बहुत से मां-बाप चाहते भी नहीं है कि अपने बच्चों को इतनी कम उम्र में स्कूल भेजें। हालांकि कुछ माता-पिता दोनों नौकरी करने की वजह से जरूर चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी उनका बच्चा स्कूल जाना शुरू कर दे ताकि वे अपनी नौकरी टेंशन फ्री होकर कर सकें।

सबकी अलग-अलग प्राथमिकता हो सकती है लेकिन बच्चों के हित में लगता है कि उनका 5 साल के बाद ही स्कूल भेजने की जरूरत है।

अभी कर्नाटक में वहां की सरकार ने 6 साल के बच्चे को पहली क्लास में दाखिला देने के नियम को शक्ति से लागू करने का निर्देश दिया है।

मुझे कर्नाटक सरकार के इस फैसले से काफी खुशी है और छोटे बच्चों को इसे जरूर राहत मिलेगी। हालांकि मैं एक वीडियो यह भी देखा है कि एक माता इस नियम को बदलने की मांग कर रही थी और 5 साल में ही बच्चे को स्कूल भेजना की वकालत कर रही थी। सोशल मीडिया में कुछ लोगों ने इस माता का विरोध भी किया। विरोध करने वालों का कहना था कि हम इतनी छोटी उम्र में ही अपने बच्चों को रेस का घोड़ा बनाना चाहते हैं।

इस मुद्दे पर बहुत लंबे समय से बहस चल रही है। अदालतों पर भी यह मामला गया है, लेकिन एक यूनिफॉर्म सिस्टम नहीं बन पा रहा है। कर्नाटक सरकार का कहना है कि उसने नई शिक्षा नीति और शिक्षा देने के अधिकार राइट टू एजुकेशन के तहत ही 6 साल के बच्चे को पहली कक्षा में एडमिशन कराने के नियम को लागू किया है। उम्मीद है कि सरकार किसी निजी स्कूल के दबाव में ना आकर बच्चों के हित में फैसला लेंगी।

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