कृपा और प्रेम में क्या अन्तर है ? -द्वितीय माला

आदरणीय परम पूज्य श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी की लाभदायक पुस्तक ‘सत्संग के बिखरे मोती ‘

१५-भगवान्ने कहा-

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ।।

‘जिसने मुझे सुहृद् जान लिया, बस, उसे इतना जाननेसे ही शान्ति मिल जाती है।’ कितनी बड़ी बात है। भगवान् सबके सुहृद् हैं, मित्र हैं, पर हमलोग इस भगवद्वचनपर विश्वास नहीं करते।

१६-कृपा और प्रेममें अन्तर है। कृपामें कुछ परायापन है, वह किसी दीनपर होती है; पर प्रेममें निकटका सम्बन्ध होता है तथा सुहृद् एवं मित्रके सम्बन्धमें तो और निकटता होती है। भगवान् कहते हैं, ‘मैं सुहृद् हूँ, सबका मित्र हूँ।’ भला, यह बात जिसने जान ली उसके आनन्दका क्या ठिकाना। भगवान् हमारे मित्र हैं, फिर क्या चाहिये। इस बातको जानते ही मनमें कितना गौरव होगा, कितनी शान्ति मिलेगी। एक सर्वोपरि लौकिक शासकसे मित्रता होनेमें मनुष्य कितने गौरवका अनुभव करता है, फिर सर्वलोक-महेश्वर भगवान् हमारे मित्र हैं; यह जाननेपर कितनी शान्ति होगी।

१७-भय इसीलिये है कि भगवान्पर विश्वास नहीं है। एक मामूली सिपाही साथ हो जानेपर हमारा भय जाता रहता है; फिर जिस क्षण यह विश्वास हो जाय कि सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् नित्य-निरन्तर हमारे साथ हैं, उसके बाद क्या भय रह सकता है!

१८-बहुत सहज बात हमारे विश्वास-अभावके कारण कठिन हो रही है। भगवान्की पूर्ण कृपा है; उस कृपापर विश्वास होते ही सब काम बन जाय; बहुत सहजमें बन जाय। कृपापर विश्वास होते ही कृपा फूलने-फलने लग जाती है, सन्त एवं भगवान्‌को मिला देना ही कृपाका फूलना-फलना है।

१९-सन्त सभी समय रहते हैं, उनका अभाव नहीं होता। सन्तका अभाव हो तो भगवान्‌का भी अभाव हो जाय, जो कि असम्भव है। हाँ, सन्तोंकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। इस कलियुगमें भी सन्त हैं। भगवान्से प्रार्थना करनेपर उनके दर्शन हो सकते हैं।

२०-डर है, वह तो असन्तोंसे ही है। सन्तोंसे डर किस बातका माँकी गोदमें बच्चा चाहे जैसा व्यवहार करे। माँसे क्या बच्चेको हानि होगी ?

२१-सन्तोंका शाप भी परम कल्याणके लिये ही होता है। बस, किसी प्रकार उनसे मिलना हो जाय फिर तो काम अपने-आप हो जायगा; क्योंकि उनका मिलना अमोघ है।

२२-सन्तकी पूरी-पूरी महिमा कोई कह नहीं सकता। सन्तका ध्यान भगवान् करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण एक बार ध्यानमें बैठे थे, धर्मराजने पीछे पूछा- ‘प्रभो! आप उस समय क्या कर रहे थे?’ श्रीकृष्णने कहा- ‘ध्यान कर रहा था।’ धर्मराज- ‘किसका ध्यान कर रहे थे ?’ श्रीकृष्ण – ‘भीष्म मेरा ध्यान कर रहे थे, इसलिये मैं भीष्मका ध्यान कर रहा था, उनके पास चला गया था।’

२३-जिन सन्तोंकी महिमा स्वयं भगवान् गाते हैं, उन सन्तोंकी महिमा कौन कह सकता है।

२४-‘ भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही ॥’

भरद्वाजजीने कहा, ‘भरत ! रामके दर्शनका फल है तुम्हारा दर्शन।’ ‘तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा।’ भला, ऐसे सन्तोंकी महिमा कौन कह सकता है।

२५-सन्तोंकी चरणरजकी महिमा ऐसी है कि तीर्थ भी उस रजसे पवित्र होते हैं।

२६-सन्त तीर्थोंको भी तीर्थ बनाते हैं-

‘तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि’

(नारदभक्तिसूत्र ६९) २७-तीर्थ क्या चीज है, सन्तोंके रहनेका स्थान; जिस स्थानपर सन्त रहें, वही तीर्थ बन जाता है।

२८-सन्तोंके मुखसे जो निकल गया, वही सार्थक शास्त्र बन गया। २९-सन्तोंने जो लिख दिया वही नियम-विधान हो जाता है, उस विधानको भगवान् मानते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि सन्त भगवान्के सन्देशवाहक होते हैं।

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