चित्त में उठने वाली इच्छा ही बंधन है: श्रीहित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

भूमिका मनुष्य का जीवन इच्छाओं का ताना-बाना है। हर क्षण कोई न कोई चाह, आकांक्षा, या आकर्षण भीतर से उठता है, और वही व्यक्ति को किसी कर्म, परिणाम या स्थिति…

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