नोएडा के मज़दूर, महंगा गैस सिलेंडर और फ्री अनाज योजना की सच्चाई

भूमिका: नोएडा के मज़दूर और रसोई का संकट

दिल्ली से सटे नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे औद्योगिक इलाकों में लाखों मज़दूर 10–15 हज़ार रुपये महीने की कमाई पर अपना घर परिवार चला रहे हैं।
तेज़ी से बढ़ती महंगाई, खासकर गैस सिलेंडर, कमरे का किराया और रोज़मर्रा के राशन ने उनकी रसोई का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

एक ओर केंद्र सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाओं के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त अनाज दे रही है, वहीं ज़मीनी स्तर पर ऐसे मज़दूर दिखते हैं जो गैस के खर्च से परेशान होकर सड़क पर उतर रहे हैं, लेकिन मुफ्त अनाज की सुविधा या तो ले नहीं रहे, या ठीक से ले नहीं पा रहे।
यह विरोधाभास हमें कई महत्वपूर्ण सवालों की तरफ ले जाता है – योजना है तो लाभ क्यों नहीं पहुँच रहा, क्या दिक्कतें हैं, और समाधान क्या हो सकते हैं?


नोएडा–ग्रेटर नोएडा के मज़दूरों की वास्तविक स्थिति

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के इंडस्ट्रियल एरिया में बड़ी संख्या में गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, होजरी, ऑटो पार्ट्स और अन्य फैक्ट्रियों में बाहर से आए मज़दूर काम करते हैं।

  • बहुत से मज़दूरों की महीने की सैलरी 10,000 से 13,500 रुपये के बीच है।aajtak+2
  • वहीं, आज के समय में कमरे का किराया 3,500–4,500 रुपये या उससे ज़्यादा हो चुका है, खासकर सेक्टर 62, फेज‑2 जैसे इलाकों में।
  • गैस सिलेंडर या बल्क LPG की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि कुछ जगहों पर 4 किलो गैस के लिए भी 1,800 रुपये तक मज़दूरों को जेब से देने पड़ रहे हैं।
  • कुछ मजदूर बताते हैं कि सिलेंडर भरवाने पर ही लगभग 3,000–4,000 रुपये का खर्च आ जाता है, जो उनकी कुल कमाई का बड़ा हिस्सा है।

इन हालात में जब महीने की आमदनी 10–12 हज़ार और खर्च सिर्फ कमरे और गैस पर 7–8 हज़ार हो जाए, तो बच्चों की पढ़ाई, इलाज, कपड़े, गांव में भेजने वाले पैसे के लिए कुछ बच ही नहीं पाता।
यही वजह है कि हाल के महीनों में नोएडा के कई सेक्टरों और इंडस्ट्रियल एरिया में मजदूरों ने वेतन बढ़ाने, ओवरटाइम का पैसा देने और महंगी गैस के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं।


गैस सिलेंडर की महंगाई और उज्ज्वला/सब्सिडी की हकीकत

रसोई गैस महंगाई का असर सबसे ज़्यादा उसी वर्ग पर पड़ता है, जो महीने का राशन खुद उठाकर भी लाना चाहता है और गैस सिलेंडर से ही खाना बनाना चाहता है।

उज्ज्वला योजना और सब्सिडी

  • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत BPL (गरीबी रेखा से नीचे) परिवारों को फ्री LPG कनेक्शन दिया गया था।
  • उज्ज्वला लाभार्थियों को प्रति सिलेंडर 200 रुपये तक की सब्सिडी दी जाती है, साल में अधिकतम 12 सिलेंडर तक।
  • कई राज्यों और ज़िलों में उज्ज्वला लाभार्थियों को अलग‑अलग समय पर अतिरिक्त सब्सिडी या फ्री सिलेंडर भी मिले हैं।

ग्रेटर नोएडा में ही 2024–25 के दौरान उज्ज्वला योजना के 47,000 से अधिक लाभार्थियों को फ्री गैस सिलेंडर वितरण की जानकारी सामने आई है, जिसमें केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार मिलकर पूरे सिलेंडर का पैसा सब्सिडी के रूप में वहन कर रही हैं।

लेकिन ground reality यह है कि:

  • सभी मजदूर उज्ज्वला लाभार्थी नहीं हैं।
  • बहुत से मजदूरों का गैस कनेक्शन उनके गांव के पते पर है, पर वे नोएडा में किराये के कमरे में रहते हैं, जहां सिलेंडर या तो शेयर पर चलता है या अनऑथराइज्ड रीफिल से।
  • कुछ लोगों का बैंक खाता, आधार, गैस कनेक्शन लिंक न होने से सब्सिडी समय पर नहीं पहुंचती।

इसलिए, भले ही नीति स्तर पर सब्सिडी और फ्री सिलेंडर की व्यवस्था हो, रोज़मर्रा के जीवन में मज़दूर वर्ग को इसका पूरा लाभ मिल पाना चुनौती बना हुआ है।


प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना: क्या मिलता है?

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत गरीब परिवारों के लिए रियायती अनाज की व्यवस्था पहले से कर रखी थी।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) शुरू की गई, जो अब 1 जनवरी 2024 से अगले 5 साल तक के लिए बढ़ा दी गई है।

किसे लाभ मिलता है?

दो मुख्य कैटेगरी के लाभार्थी हैं:

  • अंत्योदय अन्न योजना (AAY) परिवार – सबसे गरीब, बेहद कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार।
  • प्राथमिकता प्राप्त परिवार (PHH) – वे परिवार जो गरीबी की रेखा के आसपास या नीचे हैं और NFSA के तहत चुने गए हैं।

इन दोनों कैटेगरी के कार्डधारकों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त अनाज दिया जाता है।pib

कितना और कौन‑सा अनाज मिलता है?

राज्य‑दर‑राज्य मात्रा में हल्का अंतर हो सकता है, लेकिन broadly:

  • प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलो फ्री अनाज (आमतौर पर गेहूं या चावल, या दोनों का मिश्रण) NFSA कार्डधारकों को मिलता है।
  • अंत्योदय परिवारों को सामान्यतः 35 किलो तक अनाज प्रति राशन कार्ड प्रति माह मिलता है; अब यह भी फ्री कर दिया गया है।

कुल मिलाकर, करोड़ों लाभार्थियों के लिए NFSA के तहत मिलने वाला रियायती अनाज अब PMGKAY के रूप में पूरी तरह फ्री कर दिया गया है, जिससे गरीब परिवारों के खाद्य खर्च में बड़ी राहत देने का लक्ष्य है।pib


गरीब परिवार को राशन में क्या‑क्या मिल सकता है? (सैद्धांतिक रूप से)

राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य तौर पर दो अनाज मुफ्त या सस्ती दर पर दिए जाते हैं:

  • गेहूं
  • चावल

कई राज्यों में इसके साथ‑साथ या समय‑समय पर निम्न चीजें भी या तो मुफ्त या बहुत कम कीमत पर दी जाती रही हैं (राज्य नीति पर निर्भर):

  • मोटा अनाज (जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का) – कुछ राज्यों में पोषण बढ़ाने के लिए।
  • दाल – कई बार विशेष योजना या अतिरिक्त पैकेज के रूप में।
  • नमक – कुछ योजनाओं के तहत सस्ता या फ्री।

उदाहरण के लिए, झारखंड में मुख्यमंत्री दीदी किचन योजना के तहत NFSA कार्ड धारकों को हर महीने 5 किलो अनाज के साथ नमक की अतिरिक्त मात्रा भी दी गई, और जरूरतमंदों के लिए पके भोजन की व्यवस्था भी की गई
ऐसी राज्य आधारित योजनाएँ कई जगह चलती हैं, लेकिन उनकी उपलब्धता और मात्रा स्थानीय सरकारों पर निर्भर है।


फिर भी मज़दूर मुफ्त अनाज की सुविधा क्यों नहीं ले रहे?

यह सवाल इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कागज़ पर तो योजना साफ है – राशन कार्ड हो, NFSA में नाम हो, तो 5 किलो प्रति व्यक्ति मुफ्त अनाज मिलना चाहिए।pib
फिर भी नोएडा‑ग्रेटर नोएडा के लाखों मज़दूर गैस और राशन की महंगाई से जूझ रहे हैं और फ्री अनाज का लाभ सीमित स्तर पर ही दिखाई देता है। इसके कई कारण हैं:

1. दस्तावेज़ और राशन कार्ड से जुड़ी दिक्कतें

  • बहुत से मजदूरों के राशन कार्ड उनके गांव में बने हैं, जहां उनके नाम AAY या PHH सूची में दर्ज हैं।
  • वे नोएडा में किराये पर रहते हैं, परंतु पोर्टेबिलिटी व्यवस्था को लेकर जागरूकता कम है या तकनीकी दिक्कतों के कारण वे दूसरे राज्य/ज़िले से अनाज नहीं उठा पाते।
  • कुछ मजदूर प्रवासी हैं जिनके पास न तो लोकल राशन कार्ड है, न ही यहां का स्थायी पता, इसलिए वे स्थानीय PDS दुकान से अनाज लेने के पात्र ही नहीं बन पाते।

2. जागरूकता की कमी

केंद्र सरकार के ‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ जैसे अभियान का मुख्य उद्देश्य ही यही था कि कोई भी हकदार व्यक्ति सरकारी योजना से वंचित न रहे, क्योंकि कई बार जानकारी के अभाव में लोग योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते।

  • कई लोग जानते ही नहीं कि NFSA–PMGKAY के तहत अब अनाज मुफ्त हो चुका है।
  • बहुत से मजदूर यह नहीं समझते कि अलग‑अलग राज्यों में बने राशन कार्ड को “वन नेशन वन राशन कार्ड” के तहत कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।

3. काम के घंटे और समय की समस्या

  • नोएडा की फैक्ट्रियों में 8 घंटे की ड्यूटी के नाम पर अक्सर 10–12 घंटे तक काम करवाए जाने की शिकायत आती रही है।
  • मजदूरों के पास राशन की लाइन में लगने, दस्तावेज़ अपडेट कराने, या सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने का समय ही नहीं बचता।

जब दिन‑भर की मज़दूरी से ही थकावट हद से ज़्यादा हो, तो लोग अक्सर “आज जाने देते हैं, कल देखेंगे” की सोच में फंस जाते हैं और योजना का लाभ लेने में टालमटोल हो जाती है।

4. शर्तें और प्रक्रियात्मक जटिलताएँ

दिल्ली की मुफ्त योजनाओं के संदर्भ में यह तथ्य सामने आया है कि कई योजनाओं का लाभ लेने के लिए 5 साल पुराने पते का आधार या वोटर कार्ड जैसे दस्तावेज़ ज़रूरी किए गए, जो बहुत से लोगों के पास नहीं हैं।
इसी तरह, उपचार योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत का लाभ भी तभी मिलता है जब स्थानीय पते वाले दस्तावेज़ हों।abplive

  • जब मज़दूर एक जगह स्थायी रूप से नहीं रहते, किराये का कमरा भी बहुत बार बदलते हैं, तो स्थायी पते वाले दस्तावेज़ बनवाना मुश्किल हो जाता है।
  • नतीजा यह कि कागज़ पर “हकदार” होने के बावजूद व्यावहारिक रूप से वे लाभ से बाहर रह जाते हैं।

5. सामाजिक‑मानसिक कारण

  • कुछ लोग “मुफ्तखोरी” के टैग से बचना चाहते हैं, उन्हें लगता है कि मुफ्त अनाज लेने से समाज में उनकी इमेज पर फर्क पड़ेगा, या स्वयं‑सम्मान को चोट लगेगी।
  • कई लोग सिर्फ प्राइवेट दुकानों से ही सामान लेने के आदी हैं, PDS दुकान पर जाने में झिझक या संकोच महसूस करते हैं।
  • कुछ जगहों पर PDS दुकान पर भीड़, भेदभाव और बदसलूकी की शिकायतें आती हैं, जिससे लोग जाने से कतराते हैं।

6. रसोई की वास्तविक ज़रूरतें और गैस का रोल

भले ही अनाज फ्री मिल जाए, लेकिन रसोई गैस, तेल, सब्जी, मसाले, दाल, दूध, बच्चों के लिए खास चीजें – ये सब मार्केट रेट पर ही खरीदने पड़ते हैं।

  • गैस महंगी हो तो लोग अक्सर लकड़ी, कोयला, केरोसिन या शेयर गैस जैसे विकल्प अपनाते हैं, जो शहरों में महंगे और असुविधाजनक हैं।facebook+1
  • कुछ परिवारों के लिए PDS से मिले गेहूं/चावल को पीसवाना, पकाना, स्टोर करना, भी उनके समय और पैसे पर अतिरिक्त बोझ बन जाता है।

इसलिए, सिर्फ फ्री अनाज उपलब्ध कर देने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होता, जब तक कि खाना पकाने की लागत और अन्य ज़रूरी सामान की कीमतें मज़दूरों की आमदनी के हिसाब से संतुलित न हों।


तालिका: योजनाएँ और मिलने वाला लाभ (संक्षेप में)

योजना / व्यवस्थाकिसे मिलती हैक्या मिलता हैमुख्य चुनौतियाँ
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY)NFSA के अंतर्गत AAY और PHH कार्डधारक परिवारप्रति व्यक्ति 5 किलो तक फ्री अनाज (गेहूं/चावल), AAY पर सामान्यतः 35 किलो फ्रीराशन कार्ड गाँव में, पोर्टेबिलिटी की जानकारी कम, दस्तावेज़ की दिक्कतें
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) PDSगरीब और प्राथमिकता श्रेणी परिवारसस्ता अनाज (अब अधिकांश के लिए फ्री में कनवर्ट)नाम लिस्ट में न होना, लोकल कार्ड न होना, PDS दुकान की दूरी/भीड़
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजनाBPL/गरीब परिवार, विशेष रूप से महिलाओं के नाम परफ्री LPG कनेक्शन, सब्सिडी 200 रुपये प्रति सिलेंडर तक, साल में 12 तककनेक्शन गाँव में, शहर में अनऑथराइज्ड सिलेंडर, आधार‑बैंक लिंकिंग की समस्याbajajfinserv+1
फ्री सिलेंडर वितरण (UP/Noida उदाहरण)उज्ज्वला लाभार्थीचयनित अवधि में पूरी तरह निशुल्क सिलेंडर, कीमत की भरपाई सरकार करती हैसबको जानकारी न होना, रजिस्ट्रेशन/क्लेम की प्रक्रिया, समय पर सिलेंडर न मिलना
राज्य स्तर की राशन योजनाएँ (जैसे नमक, दाल, मोटा अनाज)संबंधित राज्य के कार्डधारकअतिरिक्त अनाज, नमक, पोषक आहार, कभी‑कभी पका भोजनराज्य‑विशेष, हर जगह लागू नहीं, जानकारी की कमी, स्थानीय राजनीति

क्या केवल मुफ्त अनाज से समस्या हल होगी?

सरकार के नजरिये से देखें तो PMGKAY जैसी योजना ने गरीबों के खाने का बेसिक सुरक्षा कवच मजबूत किया है, क्योंकि पेट भरने लायक अनाज मुफ्त मिलना बड़ी राहत है।
लेकिन मज़दूर की पूरी “रसोई इकॉनॉमी” सिर्फ गेहूं‑चावल पर नहीं टिकी होती।

मज़दूर की रसोई के मुख्य खर्च:

  • गैस सिलेंडर या कुकिंग फ्यूल
  • खाने का तेल
  • दाल
  • सब्ज़ी, मसाले
  • दूध, चाय, बच्चों के लिए एक्स्ट्रा चीजें

फ्री अनाज होने के बावजूद:

  • अगर LPG सिलेंडर 1,000–1,200 रुपये या उससे ऊपर में पड़ रहा हो, और ब्लैक में या छोटे सिलेंडर में और भी ज्यादा;bajajfinserv+2
  • किराया 4,000–5,000 रुपये हो;
  • दाल–तेल–सब्जी पर 2,500–3,000 रुपये प्रति माह या ज्यादा खर्च हो;

तो 10–12 हज़ार की तनख्वाह में परिवार का गुजारा करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

यानी, मुफ्त अनाज जरुरी है लेकिन पर्याप्त नहीं। जब तक आय बढ़े (वेतन वृद्धि), गैस और जरूरी सामान की कीमतें नियंत्रित रहें, और शहर में रहने वाले प्रवासी मजदूरों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए खास व्यवस्था न हो, तब तक उनकी रसोई का संकट बना रहेगा।


समाधान की दिशा: क्या किया जा सकता है?

इस पूरे मुद्दे को समझते हुए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव निकलते हैं जिन्हें नीति‑निर्माताओं, समाज और स्वयं मजदूरों के स्तर पर अपनाया जा सकता है।

1. “वन नेशन वन राशन कार्ड” और पोर्टेबिलिटी की सही लागू व्यवस्था

  • यदि किसी मजदूर का राशन कार्ड UP, बिहार, झारखंड या किसी अन्य राज्य में बना है, तो वह नोएडा–दिल्ली–गुरुग्राम जैसे शहरों में भी उसी कार्ड से PDS राशन उठा सके – इसे पूरी तरह सरल और व्यवहारिक बनाना होगा।
  • इसके लिए PDS दुकानों, फैक्ट्री मैनेजमेंट, और सिविल सोसाइटी के बीच जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है, ताकि हर मजदूर को पता हो कि उसे कहाँ, कैसे, क्या मिलेगा।

2. मजदूरों के लिए स्पेशल कैंप और हेल्पडेस्क

  • औद्योगिक क्षेत्रों के पास स्पेशल कैंप लगाकर मजदूरों के कार्ड अपडेट, आधार लिंकिंग, उज्ज्वला अपडेट, और PMGKAY पोर्टेबिलिटी से संबंधित सारी औपचारिकताएँ एक जगह की जा सकती हैं।
  • इससे “समय नहीं है” वाली समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है।

3. गैस सिलेंडर पर targeted राहत

  • उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए फ्री या उच्च सब्सिडी वाले सिलेंडर की योजना को उन इलाकों में प्राथमिकता देनी चाहिए, जहां औद्योगिक मजदूरों का घनत्व बहुत ज्यादा है, जैसे नोएडा–ग्रेटर नोएडा।livehindustan+1
  • वैकल्पिक ईंधन (जैसे पाइप्ड गैस, कम कीमत वाले सामुदायिक किचन) का विस्तारीकरण किया जा सकता है।

4. मजदूरी और वेतन में बढ़ोतरी

ताज़ा रिपोर्टों में मजदूर यह साफ़ कह रहे हैं कि आज की महंगाई के हिसाब से कम से कम 18–20 हज़ार रुपये की सैलरी होनी चाहिए, जबकि उन्हें 11–13.5 हज़ार के आसपास मिल रहा है।instagram+2

  • यदि वेतन बढ़ेगा तो मुफ्त अनाज के साथ‑साथ बाक़ी ज़रूरतें भी बेहतर तरीके से पूरी हो पाएंगी।
  • इसके लिए लेबर डिपार्टमेंट, इंडस्ट्रियल एसोसिएशन और मजदूर संगठनों के बीच संतुलित समझौते की जरूरत है।dailyhunt+1

5. सामाजिक जागरूकता और मानसिकता में बदलाव

  • “मुफ्त योजना लेने में शर्म” वाली मानसिकता के बजाय यह समझ बनानी होगी कि जब तक आय पर्याप्त न हो, तब तक सरकारी योजनाओं का लाभ लेना कोई गलत बात नहीं है, बल्कि यह हमारा अधिकार है।
  • धार्मिक‑सामाजिक संस्थाएँ, NGOs, और स्वयंसेवक समूह मजदूरों को योजनाओं की जानकारी देने में नेतृत्व कर सकते हैं।

निष्कर्ष: अनाज, गैस और सम्मानजनक जीवन

नोएडा–ग्रेटर नोएडा के मज़दूर वर्ग की कहानी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नीतिगत कहानी भी है।facebook+2
एक तरफ देश में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है, उज्ज्वला के तहत गैस कनेक्शन और सब्सिडी दी जा रही है, तो दूसरी तरफ इन्हीं योजनाओं के लाभार्थी माने जाने वाले मजदूर गैस सिलेंडर की महंगाई से टूटकर सड़क पर उतर रहे हैं।

इस विरोधाभास का समाधान सिर्फ़ एक तरफ से नहीं होगा।

  • सरकार को योजनाओं की लास्ट‑माइल डिलीवरी और डॉक्यूमेंटेशन की बाधाओं को दूर करना होगा।
  • इंडस्ट्री को मजदूरों की मेहनत का उचित वेतन देना होगा, जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
  • समाज और नागरिक संगठनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी हकदार व्यक्ति सिर्फ जानकारी की कमी या कागज़ी झंझटों की वजह से भूखा न रहे।

जब मुफ्त अनाज, सस्ती गैस, पर्याप्त वेतन और जागरूकता – ये चारों एक साथ काम करेंगे, तभी नोएडा और पूरे देश के मेहनतकश मजदूरों की रसोई सच में सुरक्षित और मुस्कुराती हुई दिखेगी।


Related Posts

“NAMASTE योजना: आंकड़ों की चमक बनाम सफाई कर्मियों की हकीकत”

1. प्रस्तावना: आंकड़ों की चमक और ज़मीन की हक़ीक़त पीआईबी के ताज़ा प्रेस नोट में दावा किया गया है कि NAMASTE (National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem) योजना के तहत…

Continue reading
एफ़टीआईआई–एनएफ़एआई समर फ़िल्म अप्रिसिएशन कोर्स: सिनेमा को समझने का बेहतरीन मौका

अगर आप फिल्मों को सिर्फ टाइमपास या मनोरंजन का साधन मानते हैं, तो FTII–NFAI का Summer Film Appreciation Course आपके लिए सचमुच एक नई दुनिया खोल सकता है। यह ऐसा…

Continue reading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

“NAMASTE योजना: आंकड़ों की चमक बनाम सफाई कर्मियों की हकीकत”

“NAMASTE योजना: आंकड़ों की चमक बनाम सफाई कर्मियों की हकीकत”

एफ़टीआईआई–एनएफ़एआई समर फ़िल्म अप्रिसिएशन कोर्स: सिनेमा को समझने का बेहतरीन मौका

एफ़टीआईआई–एनएफ़एआई समर फ़िल्म अप्रिसिएशन कोर्स: सिनेमा को समझने का बेहतरीन मौका

RBI के नए Auto-Debit नियम: फायदे कम, नुकसान ज़्यादा?

RBI के नए Auto-Debit नियम: फायदे कम, नुकसान ज़्यादा?

इंजीनियरिंग–मेडिकल की JEE–NEET रेस: प्रेशर, महंगी फीस, बेरोजगारी और उम्मीद की सच्ची कहानी

इंजीनियरिंग–मेडिकल की JEE–NEET रेस: प्रेशर, महंगी फीस, बेरोजगारी और उम्मीद की सच्ची कहानी

नोएडा के मज़दूर, महंगा गैस सिलेंडर और फ्री अनाज योजना की सच्चाई

नोएडा के मज़दूर, महंगा गैस सिलेंडर और फ्री अनाज योजना की सच्चाई

म्यूचुअल फंड से जेनरेशनल वेल्थ: क्या वाकई अगली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है?

म्यूचुअल फंड से जेनरेशनल वेल्थ: क्या वाकई अगली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है?