जानिये आख़िर क्यों बहुत सारे स्टूडेंट्स के आ रहे हैं 90% से ज़्यादा नम्बर?

पिछले कुछ वर्षों में बोर्ड रिज़ल्ट देखते‑देखते एक बात सबकी नज़र में ज़रूर आई होगी – अब 10वीं–12वीं कक्षा में 90% से ज़्यादा नम्बर लाने वाले बच्चों की संख्या बहुत बढ़ गई है। पहले जहाँ 90%+ लाने वाला बच्चा पूरे स्कूल में गिने‑चुने स्टूडेंट्स में होता था, वहीं आज कई स्कूलों में एक‑एक क्लास से दर्जनों बच्चे 90% के ऊपर स्कोर कर रहे हैं। अभिभावक, टीचर, यहां तक कि बच्चे खुद भी ये सवाल पूछ रहे हैं – क्या आज की पीढ़ी अचानक से ज़्यादा तेज हो गई है, या फिर सिस्टम में कुछ ऐसा बदला है, जिसकी वजह से मार्क्स ऊपर की तरफ़ “खींचे” जा रहे हैं?

इस लेख में हम इसी सवाल को समझेंगे: आख़िर क्यों आज इतने ज़्यादा स्टूडेंट्स के 90% से अधिक नम्बर आ रहे हैं? यहाँ हम मार्किंग सिस्टम, मॉडरेशन पॉलिसी, इंटरनल असेसमेंट, इंटरनल चॉइस, स्टेप‑मार्किंग और “मार्क्स इंफ्लेशन” जैसे कॉन्सेप्ट को सरल भाषा में समझेंगे।


1. मॉडरेशन पॉलिसी और ग्रेस मार्क्स – “ऊपर से नम्बर जोड़ने” की प्रक्रिया

सबसे पहले समझते हैं मॉडरेशन पॉलिसी क्या होती है।

किसी भी बोर्ड में हर साल क़रीब‑क़रीब इतने ही बच्चे परीक्षा देते हैं, लेकिन पेपर की कठिनाई, सेटों में फर्क, और चेकिंग की सख़्ती हर साल थोड़ी बहुत बदलती रहती है। यदि किसी साल पेपर ज़्यादा कठिन बन गया, या किसी सेट में बहुत मुश्किल सवाल आ गए, तो उस साल बच्चों के नम्बर सामान्य से काफी कम हो सकते हैं। इससे अचानक पास प्रतिशत गिर सकता है, और रिज़ल्ट “बहुत खराब” दिखने लगता है।

इसी जोखिम से बचने के लिए बोर्ड एक सिस्टम अपनाते हैं, जिसे आम भाषा में मॉडरेशन या ग्रेस मार्क्स कह सकते हैं। इसके तहत:

  • जो सवाल बहुत मुश्किल थे, उन पर एक्स्ट्रा मार्क्स दिए जाते हैं।
  • अगर किसी प्रश्न में ग़लती थी (प्रिंटिंग मिस्टेक, गलत डेटा, अस्पष्टता आदि), तो उस सवाल के मार्क्स सभी या प्रयास करने वाले बच्चों को दे दिए जाते हैं।
  • अलग‑अलग सेट के पेपर अगर समान स्तर के न हों, तो पीछे से मार्क्स “स्केल” कर के ऐसे एडजस्ट किए जाते हैं कि किसी सेट के बच्चों के साथ नाइंसाफी न हो।
  • कभी‑कभी बोर्ड यह भी देखता है कि पिछले साल के मुकाबले पास प्रतिशत बहुत ज़्यादा नीचे जा रहा हो, तो समग्र रूप से कुछ नम्बर ऊपर “मॉडरेट” कर दिए जाते हैं, ताकि रिज़ल्ट बैलेंस में रहे।

ये सब कुछ सीधे बच्चे की answer sheet पर नहीं दिखता, बल्कि result processing के समय “बैकएंड” में होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि बहुत सारे स्टूडेंट्स के नम्बर 2–3–5, कई बार किसी सब्जेक्ट में 8–10 तक भी ऊपर खिसक जाते हैं। इसका फायदा सबसे ज़्यादा औसत और बॉर्डरलाइन स्टूडेंट्स को मिलता है – जो 55–58% पर थे, वे 60–65% तक पहुँच जाते हैं; जो 68–70% पर थे, वे 75–80% पर आ खड़े होते हैं।

जब यह प्रक्रिया लाखों answer sheets पर लागू होती है, तो पूरा रिज़ल्ट ग्राफ़ थोड़ा‑सा ऊपर उठ जाता है। यहीं से high scorers की संख्या (80+, 90+, 95+) में अचानक उछाल दिखाई देने लगता है।


2. स्टेप‑मार्किंग – “आधा सही किया, तो आधे से ज़्यादा नम्बर मिलेंगे”

दूसरा बड़ा बदलाव है स्टेप‑मार्किंग सिस्टम। पुरानी व्यवस्था में कई बार ऐसा होता था कि बच्चे ने सवाल का कुछ हिस्सा सही किया, लेकिन आख़िरी answer गलत हो गया, तो उसे बहुत कम नम्बर या कभी‑कभी शून्य मिल जाता था।

अब बोर्डों ने विस्तृत marking scheme बनाकर यह तय कर दिया है कि हर सवाल को कई छोटे‑छोटे स्टेप में बाँटा जाएगा, और हर स्टेप के लिए अलग नम्बर दिए जाएंगे।

मान लीजिए 5 नम्बर का एक मैथमेटिक्स सवाल है। उसे बोर्ड इस तरह बाँट सकता है:

  • सही फॉर्मूला लिखना – 1 नम्बर
  • सही values डालना – 1 नम्बर
  • बीच के steps सही करना – 2 नम्बर
  • final answer लिखना – 1 नम्बर

अब अगर बच्चा फॉर्मूला सही लिखता है, डेटा सही रखता है, और दो‑तीन intermediate steps भी ठीक करता है, लेकिन final answer में छोटी‑सी calculation mistake हो जाती है, तो उसे फिर भी 3–4 नम्बर मिल सकते हैं।

इसका परिणाम क्या होता है?

  • पहले जो सवाल बच्चे “लगभग सही” करते थे लेकिन अंत में फंस जाते थे, उन पर अब उन्हें अच्छा‑खासा स्कोर मिल रहा है।
  • जिन बच्चों की conceptual understanding ठीक है पर calculation में अक्सर गलती हो जाती है, उनके मार्क्स पहले के मुकाबले काफी बेहतर दिखने लगते हैं।
  • बहुत सारे average या थोड़ा कमजोर बच्चे, जो पहले 30–40 की रेंज में होते थे, step‑marking की वजह से 40–50 या 50–60 की रेंज में पहुँच जाते हैं।

स्टेप‑मार्किंग की वजह से fail होने वाले और बहुत कम नम्बर पाने वाले बच्चों की संख्या घटती है, और कुल पास प्रतिशत और औसत स्कोर ऊपर चला जाता है।

कुछ बोर्डों ने तो खुलकर कहा है कि step‑marking से फ़ेल होने का खतरा कम होगा और pass percentage बढ़ेगा। जब ऐसा बड़े पैमाने पर लागू होता है, तो पूरे सिस्टम में नम्बर “ऊपर की तरफ़” शिफ्ट हो जाते हैं।


3. इंटरनल चॉइस – पेपर का “स्कोरिंग” हो जाना

तीसरा बड़ा कारण है पेपर में इंटरनल चॉइस का बढ़ जाना

आजकल लगभग हर सेक्शन में बच्चों को चॉइस दी जाती है – जैसे:

  • Question 5: (a) या (b) में से कोई एक हल करें।
  • Long answer में 3 में से 2 करने हों, short answer में 6 में से 4, वगैरह।

इसका practical असर क्या होता है?

  • बच्चा उन सवालों को attempt कर सकता है जिनके टॉपिक उसने बेहतर पढ़े हैं या जिन्हें वह आसान समझता है।
  • जो चैप्टर या टॉपिक कमजोर हैं, उनसे जुड़े सवालों को वो चॉइस का फायदा लेकर छोड़ सकता है।
  • कोचिंग और ऑनलाइन गाइडेंस में बच्चों को पहले से “टारगेटेड प्रिपरेशन” सिखाई जाती है – कौन‑कौन से टॉपिक scoring हैं, जिनसे सवाल ज़रूर आएंगे, और जिनके लिए पेपर में choice भी रहेगी।

जब पेपर pattern predictable हो जाए, sample paper पहले से available हों, और हर सेक्शन में अच्छी‑खासी चॉइस मिल जाए, तो naturally बच्चों के लिए अपनी strengths से maximum marks निकालना आसान हो जाता है।

ये सब मिलकर पेपर को “स्कोरिंग” बना देते हैं – यानी यह टेस्ट सिर्फ knowledge का नहीं, बल्कि smart selection और strategy का भी हो जाता है। इसके नतीजे में average से ऊपर के बच्चे आराम से high 80s और 90s तक पहुँचने लगते हैं।


4. इंटरनल असेसमेंट और स्कूल की generous marking

एक और बड़ा फैक्टर है इंटरनल असेसमेंट का वज़न बढ़ जाना। आज कई बोर्डों में कुल नम्बर का 20–30% हिस्सा स्कूल‑लेवल असेसमेंट से आता है, जैसे:

  • प्रैक्टिकल
  • प्रोजेक्ट वर्क
  • असाइनमेंट
  • periodic tests
  • attendance, behaviour, etc.

स्कूलों पर भी अपना रिज़ल्ट “बेहतरीन” दिखाने का दबाव होता है – parents भी compare करते हैं कि किस स्कूल के कितने बच्चों ने 90%+ लाई, कितने स्टूडेंट्स distinction में हैं आदि। इस दबाव में बहुत से स्कूल इंटरनल असेसमेंट में काफी generously मार्क्स दे देते हैं।

मान लीजिए किसी बच्चे ने बोर्ड की main written exam में 72–73% के आसपास स्कोर किया। इंटरनल में अगर उसे 18/20 या 28/30 जैसी high marking मिलती है, तो कुल percentage आसानी से 78–80% से ऊपर निकल जाती है। इसी तरह जो बच्चे 80–85 पर हैं, वो इंटरनल की वजह से 88–92 तक पहुँच सकते हैं।

इस तरह इंटरनल असेसमेंट सिस्टम, जो theoretically holistic evaluation के लिए लाया गया था, practically कई जगह overall percentage बढ़ाने के टूल की तरह इस्तेमाल होने लगा है।


5. competitive culture, coaching और online content का असर

आपने देखा होगा कि आजकल parents और students दोनों के लिए “90%+” एक तरह का cut‑off word बन गया है – चाहे वह अच्छे स्कूल की admission हो, prestige हो, या आगे चलकर top colleges के लिए eligibility।

इसको achieve करने के लिए:

  • 9th–10th से ही बच्चे regular coaching, tuition और online classes ले रहे हैं।
  • YouTube, Telegram, apps पर “90% कैसे लाएं”, “टॉपर strategy”, “एक महीना बचा है – 95% लाकर दिखाओ” जैसे content की बाढ़ है।
  • sample papers, previous year papers, chapter‑wise important questions सब कुछ आसानी से उपलब्ध है।

इसका effect यह है कि preparation बहुत ज़्यादा strategy‑driven और exam‑oriented हो गई है। अब बच्चों के पास वह information है जो पहले केवल कुछ चुनिंदा स्कूलों या कोचिंग क्लासेस तक सीमित होती थी। जब लाखों बच्चों को एक साथ यह “formula” मिल जाता है कि कैसे high score निकालना है, तो high scorers की संख्या बढ़ना स्वाभाविक है।


6. “मार्क्स इंफ्लेशन” – नंबर वही, value कम

अब इन सब factors को एक साथ जोड़कर देखें:

  • मॉडरेशन पॉलिसी और ग्रेस मार्क्स से marks ऊपर खींचे जा रहे हैं।
  • स्टेप‑मार्किंग से आधा‑अधूरा सही करने पर भी अच्छे नम्बर मिल रहे हैं।
  • इंटरनल चॉइस और predictable paper pattern से बच्चे अपनी strength से maximum उठा रहे हैं।
  • इंटरनल असेसमेंट में स्कूलों की generous marking से percentage और inflate हो रही है।
  • coaching और online ecosystem ने हर बच्चे को high scoring strategy दे दी है।

इन सबका combined effect यह है कि औसत परफॉर्मेंस में उतनी बड़ी छलांग न लगने के बावजूद, report card पर दिखने वाले नम्बर बहुत ऊपर चले गए हैं। यही phenomenon education में “marks inflation” के नाम से जाना जाने लगा है।

जैसे अर्थव्यवस्था में inflation का मतलब होता है कि पैसे की value घट जाती है – पहले 100 रुपये में जो मिलता था, आज उसके लिए 150–200 रुपये लगते हैं – वैसे ही marks inflation में एक ही percentage की value समय के साथ बदल जाती है

  • पहले 80–85% वाला बच्चा “बहुत brilliant” माना जाता था।
  • आज, उसी बोर्ड में हजारों–लाखों बच्चे 90–95% लेकर आ रहे हैं, तो 90% भी उतना “rare” नहीं रहा जितना पहले था।

इसका practical नतीजा ये है कि कॉलेज admission, competitive exams, scholarships आदि में केवल board percentage से merit तय करना मुश्किल हो गया है। इसलिए आज हर जगह entrance test, aptitude exam, interview, skill‑based assessment वगैरह का महत्व बढ़ रहा है।


7. क्या बच्चे सचमुच ज़्यादा होशियार हो गए हैं?

यहां एक संतुलित बात समझना ज़रूरी है।

  • हाँ, आज की पीढ़ी के पास ज्यादा resources हैं – internet, online lectures, coaching, study material – इसलिए उनकी तैयारी पहले से बेहतर, structured और objective हो गई है।
  • parents की awareness, competition और career‑consciousness भी बढ़ी है, जिसका positive impact बच्चों की seriousness पर दिखता है।

लेकिन साथ ही:

  • exam system ऐसा बनता जा रहा है जिसमें conceptual depth से ज्यादा importance exam strategy और pattern familiarity को मिलती है
  • कई बच्चे board exams में 90%+ लेते हैं, लेकिन जब वही बच्चा tough competitive exam में बैठता है, तो वहां की negative marking, high difficulty और deep concept‑testing की वजह से उसका score उतना impressive नहीं रह जाता।

इसलिए यह कहना ज़्यादा सही होगा कि आज के बच्चे “कमज़ोर” नहीं हैं, लेकिन board marks उनकी actual understanding या capability की पूरी तस्वीर भी नहीं दिखाते। marks inflation की वजह से percentage का scale ही बदल गया है।


8. अभिभावकों और छात्रों के लिए संदेश

इतने सारे 90%+ रिज़ल्ट देखकर अक्सर दो extreme reactions आते हैं –
एक तरफ़ कुछ लोग कहते हैं, “अरे, अब तो 90% का कोई value ही नहीं रहा,” और दूसरी तरफ़ कुछ parents बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालते हैं कि “सबके 90+ हैं, तुम्हारे क्यों नहीं?”

दोनों से बचना ज़रूरी है।

  • अगर आपके बच्चे के नम्बर 90% से कम हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह कमजोर है; जरूरी है कि उसकी strengths, interests और long‑term skills पर ध्यान दिया जाए।
  • अगर आपके बच्चे ने 90%+ ला भी दिए हैं, तो केवल percentage के भरोसे future planning न करें; उसकी real understanding, aptitude और interest को भी evaluate करें।

बोर्ड exam में high marks अच्छा signal हो सकता है, लेकिन यह अकेला और अंतिम मापदंड नहीं है। असली फोकस बच्चे की सीखने की क्षमता, problem solving, communication, character और consistency पर होना चाहिए – क्योंकि career और life में ultimately वही काम आते हैं।


आज इतने सारे स्टूडेंट्स के 90% से ज़्यादा नम्बर आ रहे हैं, तो इसके पीछे सिर्फ़ बच्चों की मेहनत और बुद्धि ही नहीं, बल्कि पूरा exam‑system, marking‑policy और preparation‑ecosystem भी काम कर रहा है। इस picture को पूरा समझकर ही हमें marks को interpret करना चाहिए – न तो उन्हें भगवान बना देना है, न ही बिल्कुल बेकार समझ लेना है।

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