भूमिका
भारत में “किंनर”, “हिजड़ा”, “ट्रांसजेंडर”, “थर्ड जेंडर” और “इंटरसेक्स” जैसे शब्द अक्सर एक-दूसरे की जगह बोल दिए जाते हैं, लेकिन इनका अर्थ पूरी तरह समान नहीं है। किसी व्यक्ति की पहचान को समझने के लिए तीन बातों को अलग-अलग देखना जरूरी है: जन्म के समय दिया गया लिंग, शरीर की जैविक विशेषताएं, और व्यक्ति की अपनी लैंगिक पहचान। भारत के 2019 के ट्रांसजेंडर कानून में “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसकी लैंगिक पहचान जन्म के समय दिए गए लिंग से मेल नहीं खाती, और इसमें ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला, इंटरसेक्स विविधता वाले लोग, जेंडरक्वीर, तथा किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानें शामिल हैं (India Code).
आम भाषा में “किंनर” शब्द भारत के हिजड़ा/किन्नर समुदाय के लिए इस्तेमाल होता है। यह केवल शरीर की बनावट का नाम नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक पहचान, गुरु-चेला परंपरा, धार्मिक-सांस्कृतिक भूमिका, रोज़गार की कठिनाइयां और समाज से अलग किए जाने का अनुभव भी जुड़ा होता है। इसलिए यह पूछना कि “किंनर कैसे बनते हैं” केवल जैविक सवाल नहीं है; यह पहचान, परिवार, समाज, संस्कृति और कानून का मिला-जुला प्रश्न है।
किन्नर जन्म से होते हैं, बाद में बनते हैं या बनाए जाते हैं?
इस प्रश्न का छोटा उत्तर है: कुछ लोग जन्म से शरीर की ऐसी विविधता के साथ पैदा होते हैं जिसे इंटरसेक्स कहा जाता है, कुछ लोग जन्म के समय पुरुष या महिला घोषित किए जाते हैं लेकिन बड़े होकर अपनी लैंगिक पहचान अलग महसूस करते हैं, और कुछ लोग सामाजिक परिस्थितियों के कारण किन्नर/हिजड़ा समुदाय में शामिल हो जाते हैं। किसी को “बनाया” जाना सामान्य और सही व्याख्या नहीं है, क्योंकि लैंगिक पहचान व्यक्ति के भीतर की गहरी अनुभूति होती है, कोई साधारण आदत या बाहरी नकल नहीं।
इंटरसेक्स व्यक्ति वे होते हैं जिनके जननांग, गुणसूत्र, हार्मोन या प्रजनन अंग पारंपरिक पुरुष/महिला श्रेणी में साफ फिट नहीं बैठते। Cleveland Clinic के अनुसार इंटरसेक्स होना बीमारी नहीं है; अधिकतर इंटरसेक्स लोग स्वस्थ होते हैं, और कई बार यह स्थिति जन्म पर दिखती है, कभी युवावस्था में पता चलती है, और कभी जीवन भर पता नहीं चलती (Cleveland Clinic).
दूसरी तरफ, ट्रांसजेंडर व्यक्ति का शरीर जन्म के समय पुरुष या महिला के रूप में दर्ज हो सकता है, लेकिन उसकी लैंगिक पहचान उस दर्ज लिंग से अलग हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ICD-11 में लैंगिक असंगति को मानसिक रोगों के अध्याय से हटाकर यौन स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में रखा है, ताकि यह स्पष्ट हो कि ट्रांसजेंडर या जेंडर-डाइवर्स पहचान अपने-आप में मानसिक बीमारी नहीं है (WHO).
तीसरा पहलू सामाजिक है। भारत में कुछ बच्चे या युवा अपने परिवार से अस्वीकृति, हिंसा, गरीबी या पहचान की स्वीकृति न मिलने के कारण हिजड़ा/किन्नर समुदाय में शरण लेते हैं। Harvard Divinity School के अध्ययन के अनुसार दक्षिण एशिया में हिजड़ा समुदाय में गुरु-चेला प्रणाली है, जहां नया सदस्य एक गुरु के संरक्षण में समुदाय की परंपराएं, आजीविका के तरीके और रस्में सीखता है (Harvard Religion and Public Life).
क्या किन्नर के माता-पिता भी किन्नर होना जरूरी है?
नहीं, ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है। किन्नर या ट्रांसजेंडर होने के लिए माता-पिता का किन्नर होना कोई शर्त नहीं है। अधिकांश ट्रांसजेंडर या किन्नर व्यक्ति सामान्य पुरुष-महिला माता-पिता से जन्म लेते हैं। इंटरसेक्स विविधताओं में कुछ स्थितियां आनुवंशिक कारणों से जुड़ सकती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि माता-पिता स्वयं किन्नर या इंटरसेक्स हों। Cleveland Clinic इंटरसेक्स विविधताओं के संभावित कारणों में आनुवंशिक बदलाव, हार्मोनल प्रभाव, SRY जीन से जुड़े बदलाव और अन्य जैविक कारणों का उल्लेख करता है (Cleveland Clinic).
इसलिए “किन्नर के माता-पिता भी किन्नर होंगे” एक मिथक है। समाज में कई बार किसी बच्चे के शरीर, व्यवहार या रुचियों को देखकर जल्दबाजी में निष्कर्ष निकाल लिया जाता है, लेकिन किसी व्यक्ति की पहचान का निर्णय बाहरी अनुमान से नहीं किया जा सकता। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने NALSA मामले में लैंगिक पहचान को व्यक्ति की आंतरिक अनुभूति और गरिमा से जोड़ा, और कहा कि पहचान के लिए जैविक परीक्षण थोपना व्यक्ति की निजता और गरिमा के खिलाफ हो सकता है (CLPR Trans Law).
किन्नर होने का सबसे बड़ा लक्षण क्या है?
सबसे बड़ा “लक्षण” शरीर का कोई एक अंग नहीं, बल्कि व्यक्ति की अपनी लैंगिक पहचान है। यदि कोई व्यक्ति जन्म के समय दिए गए लिंग से अलग अपनी पहचान महसूस करता है और उसी पहचान के साथ जीना चाहता है, तो वह ट्रांसजेंडर पहचान के दायरे में आ सकता है। WHO के अनुसार लैंगिक असंगति में व्यक्ति के अनुभव किए गए जेंडर और जन्म के समय दिए गए सेक्स के बीच स्पष्ट और लगातार अंतर हो सकता है, लेकिन केवल कपड़ों, खिलौनों या रुचियों की पसंद से किसी को ट्रांसजेंडर घोषित नहीं किया जा सकता (WHO).
इंटरसेक्स व्यक्ति में शरीर संबंधी संकेत अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए बाहरी जननांग पारंपरिक पुरुष या महिला जैसे स्पष्ट न दिखें, युवावस्था में अपेक्षित परिवर्तन न हों, मासिक धर्म शुरू न हो, शरीर में हार्मोनल बदलाव अलग हों, या प्रजनन से जुड़ी कठिनाइयां हों। Cleveland Clinic के अनुसार इंटरसेक्स लक्षण जन्म, युवावस्था, वयस्क अवस्था या जांच के दौरान पता चल सकते हैं (Cleveland Clinic).
किन्नर/हिजड़ा समुदाय की सामाजिक पहचान में अलग लक्षण हो सकते हैं, जैसे स्त्रीलिंग या तीसरे जेंडर की अभिव्यक्ति, गुरु-चेला समुदाय में रहना, पारंपरिक बधाई कार्य करना, या समुदाय की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ना। लेकिन केवल चाल-ढाल, आवाज़, कपड़े या नृत्य देखकर किसी को किन्नर कहना गलत और अपमानजनक हो सकता है। सम्मानजनक तरीका यही है कि व्यक्ति अपनी पहचान स्वयं बताए।
बाकी संकेत या पहचान के पहलू
किन्नर या ट्रांसजेंडर पहचान को समझते समय कुछ पहलुओं को अलग-अलग देखना चाहिए। पहला है जैविक सेक्स, जिसमें गुणसूत्र, हार्मोन, जननांग और प्रजनन अंग आते हैं। दूसरा है जेंडर आइडेंटिटी, यानी व्यक्ति अपने भीतर स्वयं को पुरुष, महिला, दोनों, कोई नहीं, या तीसरे जेंडर के रूप में कैसे पहचानता है। तीसरा है जेंडर एक्सप्रेशन, यानी कपड़े, बोली, चाल-ढाल, नाम, बाल, मेकअप या सामाजिक प्रस्तुति। चौथा है समुदाय से जुड़ाव, जो खासकर भारत के हिजड़ा/किन्नर समाज में महत्वपूर्ण होता है।
भारत के कानून में यह बात साफ है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति में केवल वे लोग शामिल नहीं हैं जिन्होंने सर्जरी कराई हो। 2019 अधिनियम स्पष्ट कहता है कि ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला होना सर्जरी, हार्मोन थेरेपी या अन्य चिकित्सा प्रक्रिया पर निर्भर नहीं है (India Code). इसका अर्थ है कि पहचान पहले आती है, चिकित्सा प्रक्रिया बाद की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है।
किन्नर पेशाब और शौच कैसे करते हैं?
यह प्रश्न कई लोगों के मन में होता है, लेकिन इसे सम्मानजनक और वैज्ञानिक तरीके से समझना चाहिए। किन्नर/ट्रांसजेंडर लोग भी मनुष्यों की तरह ही पेशाब और शौच करते हैं; तरीका उनके शरीर की वास्तविक शारीरिक बनावट, जन्मजात अंगों, किसी सर्जरी या स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। यदि किसी व्यक्ति के पास पुरुष जननांग हैं तो वह उसी शारीरिक व्यवस्था से पेशाब करेगा; यदि महिला जननांग हैं तो उसी अनुसार; यदि इंटरसेक्स विविधता है तो तरीका व्यक्ति-विशेष की शरीर रचना पर निर्भर करेगा।
सभी किन्नर एक जैसे शरीर वाले नहीं होते। कुछ लोग जन्म से पुरुष शरीर वाले होते हैं और महिला या तीसरे जेंडर के रूप में पहचान रखते हैं। कुछ लोग इंटरसेक्स होते हैं। कुछ लोग जीवन में आगे चलकर हार्मोन थेरेपी या सर्जरी चुनते हैं, और कुछ नहीं चुनते। भारत का कानून भी यह मानता है कि ट्रांसजेंडर पहचान सर्जरी या हार्मोन थेरेपी पर निर्भर नहीं है (India Code).
शौच की प्रक्रिया लगभग सभी मनुष्यों में समान होती है, क्योंकि मलत्याग पाचन तंत्र से जुड़ा है, जेंडर पहचान से नहीं। पेशाब की प्रक्रिया मूत्रमार्ग और जननांग संरचना से जुड़ी होती है, इसलिए इसमें शरीर की बनावट के अनुसार अंतर हो सकता है। यदि किसी इंटरसेक्स व्यक्ति में मूत्रमार्ग की बनावट अलग हो या कोई चिकित्सा स्थिति हो, तो उसे डॉक्टर की सलाह की जरूरत हो सकती है; Cleveland Clinic इंटरसेक्स विविधताओं में hypospadias, urethral opening की विविधता और कुछ मामलों में urinary समस्याओं का उल्लेख करता है (Cleveland Clinic).
किन्नर पुरुष और महिलाओं से कितने अलग होते हैं?
किन्नर पुरुष और महिलाओं से “पूरी तरह अलग प्रजाति” नहीं हैं; वे भी इंसान हैं, जिनकी मानव गरिमा, भावनाएं, बुद्धि, स्वास्थ्य आवश्यकताएं और अधिकार दूसरों जैसे ही हैं। अंतर मुख्यतः लैंगिक पहचान, शरीर की विविधता, सामाजिक अनुभव और समुदायिक जीवन में हो सकता है। कोई किन्नर व्यक्ति जैविक रूप से पुरुष शरीर के साथ जन्मा हो सकता है, कोई इंटरसेक्स हो सकता है, और कोई कानूनी/सामाजिक रूप से तीसरे जेंडर की पहचान चुन सकता है।
स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी, परिवार और सम्मान की जरूरतें किन्नर व्यक्तियों की भी बाकी लोगों जैसी हैं। लेकिन भेदभाव, हिंसा, परिवार से निकाला जाना, शिक्षा से वंचित होना और रोजगार की कमी उनके जीवन को कठिन बना देते हैं। संयुक्त राष्ट्र का मत है कि LGBTIQ+ व्यक्तियों को हिंसा, उत्पीड़न, भेदभाव, उत्पीड़न और कलंक से मुक्त जीवन का समान अधिकार है (United Nations).
भारत के कानून ने भी इसी कारण शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक सुविधाओं, आवास, आवागमन और सरकारी/निजी संस्थानों में भेदभाव को प्रतिबंधित किया है (India Code). यह व्यवस्था बताती है कि समस्या किन्नर व्यक्ति की मानवता में नहीं, बल्कि समाज की असमानता और संस्थागत भेदभाव में है।
किन्नरों में ज्यादा पुरुष होते हैं या महिलाएं?
यह प्रश्न शब्दों की परिभाषा पर निर्भर करता है। यदि हम पारंपरिक भारतीय हिजड़ा/किन्नर समुदाय की बात करें, तो इसमें ऐतिहासिक रूप से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की रही है जिन्हें जन्म के समय पुरुष माना गया था, लेकिन वे महिला या तीसरे जेंडर की पहचान के साथ जीते हैं। Harvard के अध्ययन में भी हिजड़ा समुदाय को अक्सर जन्म से पुरुष या इंटरसेक्स पृष्ठभूमि वाले, और न पूरी तरह पुरुष न महिला के रूप में वर्णित किया गया है (Harvard Religion and Public Life).
लेकिन आधुनिक कानूनी अर्थ में “ट्रांसजेंडर” में ट्रांस-पुरुष भी आते हैं, यानी वे लोग जिन्हें जन्म के समय महिला माना गया था लेकिन वे पुरुष के रूप में पहचान रखते हैं। भारत का 2019 अधिनियम ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला, इंटरसेक्स विविधता, जेंडरक्वीर और किन्नर/हिजड़ा/अरावनी/जोगता जैसी पहचान को शामिल करता है (India Code).
भारत की 2011 जनगणना में “Others/TG” श्रेणी के अंतर्गत 4,87,803 लोगों की गणना बताई गई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 1,37,465 लोग दर्ज थे (Ministry of Social Justice and Empowerment). यह संख्या वास्तविक आबादी से कम भी हो सकती है, क्योंकि कई लोग सामाजिक डर, परिवार के दबाव या दस्तावेजों की कमी के कारण अपनी पहचान दर्ज नहीं कराते।
स्वास्थ्य: क्या किन्नरों की सेहत अलग होती है?
किन्नर या ट्रांसजेंडर होना अपने-आप में बीमारी नहीं है। WHO ने स्पष्ट किया है कि ट्रांस-संबंधित और जेंडर-डाइवर्स पहचान मानसिक बीमारी नहीं हैं, और इन्हें मानसिक रोगों की श्रेणी में रखना कलंक को बढ़ा सकता है (WHO). इसी तरह, इंटरसेक्स होना भी बीमारी नहीं है; अधिकतर इंटरसेक्स लोग स्वस्थ होते हैं (Cleveland Clinic).
फिर भी किन्नर/ट्रांसजेंडर समुदाय को कुछ स्वास्थ्य चुनौतियां अधिक झेलनी पड़ती हैं। इनमें HIV और STI का अधिक जोखिम, मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता, हिंसा, नशे का जोखिम, असुरक्षित सर्जरी या हार्मोन का गलत उपयोग, और डॉक्टरों के भेदभाव के कारण इलाज से दूरी शामिल हो सकते हैं। WHO के अनुसार ट्रांसजेंडर लोगों में HIV-पॉजिटिव होने की संभावना प्रजनन आयु के अन्य वयस्कों की तुलना में लगभग 13 गुना अधिक बताई गई है (WHO).
भारत के संदर्भ में UNAIDS ने 2018 में बताया कि भारत में ट्रांसजेंडर लोगों में HIV prevalence 3.1% थी, जबकि सभी वयस्कों में राष्ट्रीय HIV prevalence 0.26% थी (UNAIDS). इसका कारण “किन्नर शरीर” नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार, गरीबी, सुरक्षित रोजगार की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव, हिंसा और सुरक्षित यौन स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुंच है।
कई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को gender-affirming care की जरूरत हो सकती है, जैसे मनोवैज्ञानिक सहयोग, हार्मोन थेरेपी, सर्जरी, आवाज़ प्रशिक्षण, बाल हटाना या दस्तावेज़ बदलना। WHO के अनुसार ICD-11 में gender incongruence को शामिल रखने का एक उद्देश्य यह भी है कि ट्रांसजेंडर लोगों को gender-affirming health care और बीमा कवरेज मिल सके (WHO).
शादी, जन्म और शुभ कार्यों में बधाई मांगने की परंपरा
भारत में किन्नर/हिजड़ा समुदाय का “बधाई” कार्य बहुत पुराना है। जन्म, विवाह और घर के शुभ अवसरों पर किन्नर गाना, नृत्य और आशीर्वाद देकर दक्षिणा या पैसा लेते हैं। Harvard Divinity School के अनुसार हिजड़ा समुदाय हिंदू घरों में जन्म और विवाह के अवसरों पर नृत्य, गीत और आशीर्वाद देता है, और यह आशीर्वाद उर्वरता, समृद्धि और दीर्घायु से जोड़ा जाता है (Harvard Religion and Public Life).
यह परंपरा केवल “पैसा मांगने” की आदत नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से यह एक सामाजिक-धार्मिक भूमिका रही है। कई परिवारों में यह विश्वास रहा है कि तीसरे जेंडर की उपस्थिति और आशीर्वाद संतान, सुख-समृद्धि और शुभता लाता है। हिजड़ा समुदाय स्वयं भी इसे धार्मिक कर्तव्य और पारंपरिक अधिकार के रूप में देखता है, हालांकि आज के शहरी समाज में यह कई जगह तनाव, भय, मजाक या विवाद का कारण भी बनता है।
इस परंपरा की एक कठिन सच्चाई यह भी है कि शिक्षा और रोजगार से बाहर किए जाने के कारण कई किन्नर व्यक्तियों के पास जीविका के सीमित साधन रह गए। जब समाज ने सम्मानजनक नौकरी, परिवार और संपत्ति के अधिकार नहीं दिए, तो बधाई, भीख और कुछ मामलों में सेक्स वर्क जैसे विकल्प मजबूरी बन गए। इसलिए समाधान परंपरा को गाली देना नहीं, बल्कि शिक्षा, कौशल, नौकरी, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक व्यवहार देना है।
शास्त्रों और इतिहास में किन्नर/थर्ड जेंडर का उल्लेख
भारतीय परंपरा में लिंग और जेंडर की विविधता के अनेक उल्लेख मिलते हैं। रामायण और महाभारत में तीसरे जेंडर या लैंगिक परिवर्तन के प्रसंगों का उल्लेख कई अध्ययनों में किया गया है। Harvard Religion and Public Life के अनुसार हिंदू समाज में तीसरे जेंडर के अस्तित्व के प्रमाण रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलते हैं, और अर्जुन के बृहन्नला रूप को अक्सर तीसरे जेंडर से जोड़ा जाता है (Harvard Religion and Public Life).
महाभारत में शिखंडी का प्रसंग भी लैंगिक जटिलता और सामाजिक पहचान से जुड़ा माना जाता है। कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याओं में शिखंडी को ऐसे पात्र के रूप में देखा गया है जिसकी जन्म पहचान और सामाजिक/युद्ध पहचान में बदलाव था। इसी तरह अर्जुन का बृहन्नला रूप, विष्णु का मोहिनी रूप और अर्धनारीश्वर की अवधारणा भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में स्त्री-पुरुष ऊर्जा के मिश्रण या लैंगिक विविधता की प्रतीकात्मक स्वीकृति दिखाते हैं।
मुगल काल में हिजड़ा/ख्वाजासरा समुदाय के लोग दरबार, हरम की सुरक्षा, प्रशासन और राजनीतिक विश्वासपात्र पदों में भी शामिल रहे। Harvard के अनुसार 15वीं से 19वीं सदी तक मुगल शासकों ने तीसरे जेंडर के लोगों को संरक्षण दिया और कई लोग महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे (Harvard Religion and Public Life).
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने इस स्थिति को बहुत नुकसान पहुंचाया। 1871 के Criminal Tribes Act में हिजड़ा समुदाय को अपराध और निगरानी की दृष्टि से देखा गया, जिससे सामाजिक कलंक और राज्यीय दमन बढ़ा। Harvard के अध्ययन के अनुसार ब्रिटिश काल में हिजड़ों को अपराधी घोषित कर गिरफ्तार करने जैसी नीतियां अपनाई गईं, और स्वतंत्रता के बाद कानून हटने के बावजूद लगभग दो शताब्दियों के कलंक का असर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान पर बना रहा (Harvard Religion and Public Life).
भारत में किन्नरों के प्रमुख अधिकार और कानून
भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों का सबसे बड़ा न्यायिक मोड़ 2014 का NALSA बनाम Union of India फैसला था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को “थर्ड जेंडर” के रूप में मान्यता दी, आत्म-पहचान के अधिकार को स्वीकार किया, और Articles 14, 15, 16, 19 और 21 के तहत समानता, गरिमा और स्वतंत्र अभिव्यक्ति जैसे अधिकारों को लागू माना (CLPR Trans Law).
इसके बाद Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 लागू हुआ। इस कानून ने शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक सुविधाओं, आवास, आवागमन, संपत्ति किराए पर लेने/खरीदने, सरकारी या निजी कार्यालयों में अवसर, और देखभाल संस्थानों में भेदभाव को प्रतिबंधित किया (India Code).
कानून के अनुसार प्रत्येक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपने परिवार के साथ रहने का अधिकार है, और केवल ट्रांसजेंडर होने के कारण बच्चे को माता-पिता से अलग नहीं किया जा सकता, जब तक सक्षम अदालत बच्चे के हित में ऐसा आदेश न दे (India Code). रोजगार में सरकारी या निजी संस्थान ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ भर्ती, पदोन्नति या अन्य नौकरी मामलों में भेदभाव नहीं कर सकते, और संस्थानों को शिकायत अधिकारी नामित करना होता है (India Code).
पहचान प्रमाणपत्र के लिए व्यक्ति जिला मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन कर सकता है, और प्रमाणपत्र के आधार पर आधिकारिक दस्तावेजों में जेंडर दर्ज कराया जा सकता है (India Code). भारत सरकार का National Portal for Transgender Persons और SMILE योजना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के पुनर्वास, स्वास्थ्य, परामर्श, शिक्षा, कौशल विकास और आर्थिक लिंकages जैसे उद्देश्यों से जुड़ी है (National Portal for Transgender Persons).
कानून जबरन श्रम, सार्वजनिक स्थानों से रोकना, घर/गांव से निकालना, शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक या आर्थिक अत्याचार को दंडनीय बनाता है। ऐसे अपराधों के लिए छह महीने से दो साल तक कारावास और जुर्माने का प्रावधान है (India Code).
विदेशों में किन्नर/ट्रांसजेंडर लोग क्या काम करते हैं?
विदेशों में ट्रांसजेंडर लोग हर तरह के पेशों में काम करते हैं: शिक्षक, डॉक्टर, वकील, कलाकार, मॉडल, राजनेता, लेखक, इंजीनियर, उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता, सैनिक, सरकारी कर्मचारी और कॉर्पोरेट प्रोफेशनल। फर्क यह है कि जिन देशों में शिक्षा, कानूनी सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार में गैर-भेदभाव मजबूत है, वहां ट्रांसजेंडर लोग मुख्यधारा के पेशों में अधिक दिखाई देते हैं। जहां भेदभाव और हिंसा अधिक है, वहां उन्हें असुरक्षित या अनौपचारिक कामों में धकेला जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र का सामान्य सिद्धांत है कि सभी LGBTIQ+ व्यक्तियों को हिंसा, भेदभाव और कलंक से मुक्त जीवन का अधिकार है, और राज्यों का दायित्व है कि वे मानवाधिकारों की रक्षा करें (United Nations). यूरोप में कई देशों ने legal gender recognition की प्रक्रिया बनाई है, और European Commission ने ट्रांस लोगों के लिए समानता और भेदभाव-विरोध को नीति का हिस्सा माना है (European Commission).
अमेरिका में अधिकार राज्य-दर-राज्य अलग हैं। कुछ राज्य ट्रांसजेंडर लोगों की पहचान, स्वास्थ्य सेवा, स्कूल और कार्यस्थल अधिकारों की रक्षा करते हैं, जबकि कुछ राज्यों में खेल, स्कूल सुविधाओं, पहचान-पत्रों और gender-affirming care पर पाबंदियां या विवाद हैं। ACLU के अनुसार अमेरिकी राज्यों में LGBTQ अधिकारों, विशेषकर ट्रांसजेंडर युवाओं के अधिकारों पर कानूनों के माध्यम से बढ़ते हमले देखे गए हैं (ACLU).
विदेशों में अधिकार और कानून कैसे अलग हैं?
दुनिया में कोई एक समान व्यवस्था नहीं है। कुछ देशों में व्यक्ति अपनी लैंगिक पहचान के आधार पर दस्तावेज बदल सकता है, कुछ देशों में चिकित्सा प्रमाण, अदालत या लंबी प्रक्रिया चाहिए, और कुछ जगह ट्रांसजेंडर पहचान को पर्याप्त कानूनी संरक्षण नहीं मिलता। यूरोपीय संदर्भ में legal gender recognition का उद्देश्य यह है कि व्यक्ति के आधिकारिक दस्तावेज उसकी लैंगिक पहचान से मेल खाएं, ताकि उसे नौकरी, यात्रा, शिक्षा और सेवाओं में जबरन “outing” या अपमान न झेलना पड़े (European Commission).
मानवाधिकार के स्तर पर संयुक्त राष्ट्र यह मानता है कि यौन अभिविन्यास, लैंगिक पहचान, लैंगिक अभिव्यक्ति या सेक्स कैरेक्टरिस्टिक्स के आधार पर हिंसा और भेदभाव रोकना सरकारों की जिम्मेदारी है (United Nations). लेकिन व्यवहार में कानून, समाज और राजनीति के कारण देशों में बड़ा अंतर दिखता है। इसलिए किसी एक देश का उदाहरण पूरी दुनिया पर लागू नहीं किया जा सकता।
आम गलतफहमियां और सही समझ
पहली गलतफहमी यह है कि किन्नर होना “नाटक” या “शौक” है। सही बात यह है कि लैंगिक पहचान व्यक्ति के आत्मबोध, शरीर और सामाजिक अनुभव से जुड़ी गहरी चीज है; WHO ने भी ट्रांस पहचान को मानसिक बीमारी नहीं माना है (WHO).
दूसरी गलतफहमी यह है कि हर किन्नर इंटरसेक्स होता है। सही बात यह है कि कुछ किन्नर इंटरसेक्स हो सकते हैं, कुछ जन्म से पुरुष शरीर वाले ट्रांस-स्त्री या तीसरे जेंडर की पहचान रखते हैं, और कुछ अन्य जेंडर पहचान वाले हो सकते हैं। भारत का कानून इसी विविधता को मान्यता देता है (India Code).
तीसरी गलतफहमी यह है कि सर्जरी के बिना कोई ट्रांसजेंडर नहीं हो सकता। भारत का कानून स्पष्ट करता है कि ट्रांस पहचान सर्जरी, हार्मोन थेरेपी या laser therapy पर निर्भर नहीं है (India Code).
चौथी गलतफहमी यह है कि किन्नर लोग समाज के लिए अशुभ हैं या केवल डराने के लिए आते हैं। इतिहास बताता है कि दक्षिण एशिया में हिजड़ा समुदाय जन्म और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर आशीर्वाद देने की धार्मिक-सांस्कृतिक भूमिका निभाता रहा है (Harvard Religion and Public Life).
निष्कर्ष
किंनर या ट्रांसजेंडर पहचान को समझने के लिए जिज्ञासा के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। कुछ लोग जन्म से इंटरसेक्स विविधता के साथ पैदा होते हैं, कुछ लोग अपने जन्म के समय दिए गए लिंग से अलग लैंगिक पहचान रखते हैं, और कुछ लोग सामाजिक स्वीकृति पाने के लिए किन्नर/हिजड़ा समुदाय से जुड़ते हैं। माता-पिता का किन्नर होना जरूरी नहीं है, और किन्नर होने का कोई एक बाहरी “लक्षण” नहीं है; व्यक्ति की आत्म-पहचान सबसे महत्वपूर्ण है।
किन्नर लोग पुरुषों और महिलाओं से अलग कोई अलग जाति या प्रजाति नहीं, बल्कि हमारे समाज का हिस्सा हैं। उनका शरीर, पेशाब-शौच, स्वास्थ्य और जीवन भी व्यक्ति-विशेष की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। उनका सबसे बड़ा संघर्ष शरीर से कम और समाज से अधिक जुड़ा है: परिवार से अस्वीकृति, शिक्षा और नौकरी से दूरी, स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव, और कानून के बावजूद अधिकारों का कमजोर पालन।
भारत में सुप्रीम कोर्ट और 2019 के कानून ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान, गरिमा, गैर-भेदभाव, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा के अधिकार दिए हैं। अब जरूरत है कि परिवार, स्कूल, अस्पताल, मीडिया, धार्मिक संस्थाएं और रोजगार देने वाले लोग इन अधिकारों को व्यवहार में लागू करें। जब समाज किसी व्यक्ति को सम्मान से जीने देता है, तभी कानून का असली उद्देश्य पूरा होता है।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी व्यक्ति की चिकित्सा स्थिति, लैंगिक पहचान, हार्मोन थेरेपी, सर्जरी, दस्तावेज़ परिवर्तन या कानूनी अधिकारों के मामले में योग्य डॉक्टर, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, कानूनी विशेषज्ञ या संबंधित सरकारी पोर्टल से व्यक्तिगत सलाह लेना उचित है।






