नोएडा का मज़दूर 11–14 हज़ार की तनख्वाह में क्या सच में बचत और SIP कर सकता है?


नोएडा की चमकती इमारतों, ग्लास की दीवारों वाले ऑफिस और ब्रांडेड शो–रूम के पीछे एक और दुनिया बसती है – फैक्ट्री से निकलते थके हुए मजदूरों की दुनिया। यही वे लोग हैं जो कपड़े, जूते, मोबाइल पार्ट्स, केबल, कार के पुर्जे बनाकर हमारे बाज़ारों और दुनिया भर की कंपनियों के लिए “वैल्यू” तैयार करते हैं, लेकिन जब शाम को अपनी झुग्गी या तंग कमरे में लौटते हैं तो हाथ में रहता है बस 11–14 हज़ार की सैलरी, जो महीने खतम होने से पहले ही ख़त्म हो जाती है।

आज सवाल यह है कि नोएडा की इस मजदूर बस्ती में रहने वाला परिवार – जिसमें पति फैक्ट्री में काम करता है, पत्नी शायद घरों में काम पर जाती हो या घर संभालती हो, और दो छोटे बच्चे स्कूल जाने की उम्र के हों – क्या वह बचत कर सकता है? क्या वह भी कभी SIP में निवेश करके भविष्य सुरक्षित कर सकता है, जैसे मिडिल क्लास को सलाह दी जाती है? या फिर उनके लिए “निवेश” शब्द भी किसी सपने से कम नहीं है?

इस लेख में हम इसी सवाल का ज़मीन से जुड़ा, कड़वा लेकिन सच के करीब जवाब खोजेंगे – डेटा के साथ, बजट के साथ और एक काल्पनिक पर यथार्थवादी परिवार की कहानी के ज़रिए।


1. नोएडा के मजदूर की ज़मीन हकीकत: कितनी कमाई, कितनी महंगाई?

1.1 सैलरी कितनी मिलती है?

अप्रैल 2026 में यूपी सरकार ने नोएडा और गाज़ियाबाद जैसे इंडस्ट्रियल इलाकों के लिए न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का ऐलान किया। संशोधित रेट के अनुसार:

  • अकुशल (Unskilled) मजदूर: 11,313 रुपये से बढ़ाकर 13,690 रुपये महीना।
  • अर्ध–कुशल (Semi-skilled): 12,445 से बढ़ाकर 15,059 रुपये महीना।
  • कुशल (Skilled): 13,940 से बढ़ाकर 16,868 रुपये महीना।

कागज़ पर ये आंकड़े अच्छे लगते हैं, लेकिन ज़मीनी रिपोर्टें कुछ और कहानी सुनाती हैं। इंडस्ट्रियल एरिया की रिपोर्टिंग और ग्राउंड इंटरव्यू बताते हैं कि हज़ारों फैक्ट्री मजदूर आज भी 11,000–14,000 रुपये महीने की ही सैलरी पर अटके हैं। ज्यादातर:

  • 8–10 घंटे की शिफ़्ट,
  • ओवरटाइम,
  • और फिर भी 13–14 हज़ार से ऊपर नहीं।

कई मजदूर बताते हैं कि कंपनी की सैलरी स्लिप में जो लिखा होता है, उससे कम पैसा हाथ में मिलता है; कटौती, ठेकेदार का कमीशन, बिना ओवरटाइम का फ्री काम – ये सब मिलाकर उनकी असली नेट कमाई अक्सर 12–13 हज़ार के आसपास फँसी रहती है।

1.2 महंगाई किस लेवल पर है?

दूसरी तरफ, महंगाई की आग लगातार तेज़ हो रही है:

  • इंडस्ट्रियल बेल्ट में 10×8 फीट के छोटे कमरे के लिए भी 3,000–6,000 रुपये तक किराया देना पड़ रहा है।economictimes+1
  • कुछ मजदूर बताते हैं कि पहले जो सिलेंडर 900 रुपये का था, वह ग्रे मार्केट में 3,000–4,000 रुपये में मिल रहा है; वे कहते हैं – “11 हजार की सैलरी में तो 4 हजार का सिलेंडर ही…”।
  • रिपोर्टें कहती हैं कि सिलेंडर, किराया और फीस पिछले सालों में 4–5 गुना तक बढ़ गई, जबकि मजदूरी सालों तक लगभग रुकी रही; कई मजदूरों की तनख्वाह एक साल में सिर्फ 39–200 रुपये बढ़ी।

यानी, एक तरफ सरकार कह रही है कि 13–16 हजार न्यूनतम मजदूरी है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी सच्चाई है कि 11–14 हजार की सैलरी में 15–18 हजार का खर्च झेलना पड़ रहा है।


2. एक मजदूर परिवार का महीना: आय बनाम खर्च का पूरा हिसाब

अब एक काल्पनिक लेकिन वास्तविकता के करीब परिवार बनाते हैं – नाम मान लेते हैं रामलाल

  • रामलाल: 30 साल, फैक्ट्री में हेल्पर; एक साल से काम पर है।
  • पत्नी: सीता, 27 साल, दो–तीन घरों में झाड़ू–पोछा का काम करके कुछ अतिरिक्त कमा लेती है, कुछ दिन काम, कुछ दिन नहीं।
  • बच्चे: दो – 7 साल की बेटी (क्लास 2), 4 साल का बेटा (नर्सरी या घर पर)।
  • लोकेशन: नोएडा के इंडस्ट्रियल एरिया के पास की बस्ती, दो कमरे, किचन टाइप सेटअप, साझा शौचालय या बहुत बेसिक सुविधा।

2.1 आय (Income)

  • रामलाल की सैलरी: 13,500 रुपये (कागज़ पर 13,690; हाथ में थोड़ा कम–ज्यादा)।timesofindia.indiatimes+3
  • सीता की कमाई: महीने में औसतन 3,000 रुपये (कभी 2,000, कभी 4,000 – काम और छुट्टी पर निर्भर)।यह स्तर घरेलू कामगारों की हाल की रिपोर्ट की सामान्य रेंज पर आधारित है।

कुल मासिक आय (औसतन) ≈ 16,500 रुपये।

किसी महीने सीता बीमार पड़ जाए या उसके घर छुट्टी दे दें, तो यह आय तुरंत 13–14 हज़ार पर गिर जाती है – यानी सिस्टम इतना नाज़ुक कि कोई भी झटका पूरा बजट बिगाड़ देता है।economictimes+1

2.2 किराया: दो कमरों की कीमत

नोएडा और आस–पास के इंडस्ट्रियल इलाकों में मजदूरों के लिए दो कमरों का छोटा–सा भी सेट 5,000–7,000 रुपये महीने के बीच पड़ता है, अगर वह प्रॉपर फ्लैट न होकर बस्ती या छोटी बिल्डिंग में हो। रामलाल ने एक पुरानी बिल्डिंग में दो कमरों का सेट ले रखा है:economictimes+1

  • मासिक किराया: 5,500 रुपये।economictimes+1
  • हर साल मकान मालिक 300–500 रुपये बढ़ा देता है – यह शिकायत मजदूर अक्सर करते हैं कि उनकी तनख्वाह 200–300 रुपये बढ़ती है और किराया 500 रुपये।jagran+2

2.3 बिजली–पानी–गैस

  • बिजली: पंखा, 2–3 बल्ब, मोबाइल चार्जिंग, कभी–कभी TV या कूलर; गर्मी में बिल 800–1,200 रुपये, सर्दी में शायद 500–700 रुपये। औसत मान लें 800 रुपये।यह सामान्य घरेलू खपत और मजदूरों के बिल की शिकायतों के अनुरूप है।economictimes+1
  • पानी: कुछ जगह किराये में शामिल, कुछ जगह अलग; अगर अलग हो तो 100–200 रुपये महीना अतिरिक्त। मान लें 150 रुपये।यह स्लम/लो-कॉस्ट कॉलोनी की प्रैक्टिस पर आधारित अनुमान है।
  • LPG सिलेंडर: रिपोर्ट्स हैं कि 900 रुपये का सिलेंडर ग्रे मार्केट में 3,000–4,000 में बिक रहा है; कई मजदूर कह रहे हैं कि वे पूरा सिलेंडर लेना ही छोड़ रहे हैं और साझा चूल्हे या लकड़ी/कोयले पर खाना बना रहे हैं। अगर सिलेंडर लें तो औसतन 1,200–1,500 रुपये मानना पड़ता है; कुछ महीनों में गैस बच जाए तो अगला सिलेंडर आगे खिसक जाता है, पर महंगाई के डर से यह खर्च बहुत भारी लगता है।aajtak+2

तो:

  • बिजली + पानी ≈ 950 रुपये
  • गैस ≈ 1,300 रुपये (औसत)

कुल: 2,250 रुपये (लगभग)

2.4 खाना–पीना और रोज़मर्रा का खर्च

चार सदस्य वाला परिवार अगर बेहद सादा जीवन जीए – दाल, चावल, सब्जी, थोड़ा दूध, कभी अंडा, कभी चिकन (वो भी महीने में एक–दो बार) – तो भी महीने का राशन कुछ इस तरह बैठेगा:

  • अनाज, दालें, तेल, मसाले: 2,000–2,500 रुपये
  • सब्ज़ी, आलू–प्याज, फल कभी–कभार: 1,000–1,200 रुपये
  • दूध, दही, बच्चों के लिए कभी–कभार बिस्कुट: 800–1,000 रुपये
  • चाय–चीनी और छोटी–मोटी चीजें: 400–500 रुपये

कुल राशन/फूड: लगभग 4,200–5,000 रुपये। यह आंकड़ा उन मजदूरों की शिकायतों से मेल खाता है जो कहते हैं कि महंगाई ने रसोई का पूरा बजट बिगाड़ दिया है।aajtak+2

इसके अलावा:

  • साबुन, डिटर्जेंट, शैम्पू, टॉयलेटरीज़: 300–500 रुपये
  • छोटी–मोटी दवाई (ज़ुखाम, बुखार, सिरदर्द, पेट की दवा): 200–300 रुपये
  • मोबाइल रिचार्ज (दो सिम): 300–400 रुपये
  • लोकल बस/ऑटो/ई–रिक्शा: 300–500 रुपये

रोज़मर्रा और हेल्थ + मोबाइल + ट्रैवल ≈ 1,100–1,700 रुपये।

खाने–पीने और इन सबको जोड़ें तो:

खाना + रोजमर्रा खर्च ≈ 5,500–6,700 रुपये (औसत 6,000 मान सकते हैं)।economictimes+1

2.5 दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च

रामलाल और सीता चाहते हैं कि उनकी बेटी सरकारी स्कूल के बजाय किसी सस्ते प्राइवेट स्कूल या NGO–सपोर्टेड स्कूल में पढ़े, ताकि थोड़ा अच्छा माहौल और पढ़ाई मिल सके।

  • बेटी (क्लास 2) – फीस: 700 रुपये/माह
  • बेटा (नर्सरी/प्री–स्कूल या लोकल ट्यूशन) – फीस: 500 रुपये/माह

दोनों की फीस मिलाकर ≈ 1,200 रुपये।

सालाना खर्च:

  • किताब–कॉपी–यूनिफॉर्म: साल में 3,000–4,000 रुपये, यानी महीने का औसत 250–300 रुपये।jagran+1
  • कभी–कभार स्कूल फंड, परीक्षा फीस, प्रोजेक्ट के लिए पैसा: मान लें साल में अतिरिक्त 1,200 रुपये (100 रुपये/माह औसत)

तो:

  • फीस: 1,200 रुपये
  • बाकी शिक्षा खर्च (औसत): 350–400 रुपये

कुल शिक्षा खर्च ≈ 1,550–1,600 रुपये/माह।

अगर वे स्कूल वैन या रिक्शा इस्तेमाल करें तो 300–500 रुपये प्रति बच्चा और जुड़ जाएगा, इसलिए बहुत से मजदूर बच्चे को पैदल भेजते हैं या खुद छोड़ते–लाते हैं।jagran+1


3. पूरा मासिक बजट – हिसाब साफ

अब सारे आंकड़े जोड़ते हैं:

  • कुल आय (रामलाल + सीता) ≈ 16,500 रुपये
  • किराया: 5,500 रुपये
  • बिजली–पानी–गैस: 2,250 रुपये
  • खाना + रोजमर्रा: 6,000 रुपये
  • बच्चों की पढ़ाई: 1,600 रुपये

कुल खर्च ≈ 15,350 रुपये

कागज़ पर देखें तो यहाँ लगभग 1,150 रुपये “बचते” दिख रहे हैं। लेकिन यह बहुत आदर्श और “कोई इमरजेंसी नहीं” वाला महीना है। ज़िन्दगी में हक़ीक़त कुछ और होती है:

  • अगर किसी महीने गैस जल्दी ख़त्म हो जाए और दूसरा सिलेंडर लेना पड़े – 1,300 रुपये अतिरिक्त।aajtak+2
  • कोई बीमार पड़ जाए और सरकारी अस्पताल में दवा न मिले, तो 500–1,000 रुपया प्राइवेट पर खर्च।यह पैटर्न शहरों में गरीब परिवारों की स्वास्थ्य खर्च प्रोफाइल से मेल खाता है।
  • गाँव जाना पड़े, किसी रिश्तेदारी में शादी/मौत हो, तो बस का किराया, गिफ्ट, वहाँ का खर्च – 2,000–3,000 रुपये तक भी लग सकता है।

इसका मतलब यह है कि:

  • अच्छे महीने: 500–1,000 रुपये बच भी सकते हैं।
  • सामान्य महीने: कुछ नहीं बचता या 200–300 रुपये बचते हैं।
  • बुरे महीने: 1,000–2,000 रुपये उधार लेने पड़ते हैं।

इसीलिए नोएडा की रिपोर्टों में मजदूर साफ कहते दिखते हैं कि “10,000 की सैलरी, 15,000 का खर्च – बचत का सवाल ही नहीं उठता।”facebook+2


4. SIP और सेविंग: थ्योरी बनाम हकीकत

अब असली सवाल आया: इस तरह के बजट में सेविंग और SIP में निवेश सम्भव है या नहीं?

4.1 क्लासिक सलाह क्या कहती है?

मिडिल क्लास के लिए अक्सर सलाह दी जाती है:

  • “आय का 20–30% बचत करो।”
  • “हर महीने कम से कम 1,000–2,000 रुपये SIP में डालो।”
  • “इमरजेंसी फंड बनाओ, इंश्योरेंस लो, फिर दीर्घकालीन निवेश करो।”

ये सलाह उस व्यक्ति के लिए हैं जिसकी सैलरी 30,000–50,000 या उससे ऊपर हो। 10–15 हजार की तनख्वाह वाले के लिए ये फार्मूला सीधे–सीधे फिट नहीं बैठता।

अगर रामलाल के केस में हम कहें कि:

  • “आप अपनी आय का 10% यानी 1,600 रुपये SIP में डालो” – तो इसका मतलब होगा कि उसका पूरा “बफर” खत्म, इमरजेंसी या बीमारी के लिए कोई पैसा नहीं।
  • जब कोई इमरजेंसी आएगी, वो म्यूचुअल फंड से पैसा निकाल देगा या कर्ज लेगा, और फिर SIP टूट जाएगा।

यानी क्लासिक पर्सनल फाइनेंस की किताबों वाली SIP प्लानिंग, इस कमाई स्तर पर जैसी की तैसी लागू करना, व्यावहारिक नहीं है।

4.2 क्या छोटे स्तर पर SIP सम्भव है?

फिर भी क्या कुछ किया जा सकता है?

अगर हम रामलाल के उदाहरण को ही लें:

  • ऐसे महीने जब ओवरटाइम अच्छा मिल जाए या सीता को पूरा काम मिले और आय 18,000 के आसपास चली जाए,
  • और अगर किसी महीने बड़ी इमरजेंसी न आए,

तो उनके पास 1,500–2,000 रुपये तक का मार्जिन बन सकता है।

उस केस में ये एक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है:

  1. सबसे पहले 5,000–10,000 का इमरजेंसी फंड:
    • 6–12 महीने तक हर महीने 500–800 रुपये जन–धन अकाउंट या पोस्ट ऑफिस RD में डालना,
    • जब 8–10,000 रुपये जमा हो जाएँ, तब ही SIP शुरू करना।
  2. बहुत छोटे अमाउंट की SIP:
    • महीने की 300–500 रुपये की SIP किसी कम–कॉस्ट म्यूचुअल फंड में;
    • अगर 10–12 महीने तक बिना ब्रेक चल जाए, तभी आगे बढ़ाना।
  3. लक्ष्य बच्चों की शिक्षा या शादी पर नहीं, बल्कि “भविष्य का रिज़र्व”:
    • मजदूर के लिए SIP को भी किसी एक फैंसी बड़े लक्ष्य से नहीं जोड़ना चाहिए, बल्कि यह सोचना चाहिए कि “अगर फैक्ट्री बंद हो गई या बीमारी लंबी चली तो यह मदद करेगा।”

लेकिन दिक्कत यह है कि:

  • नोएडा की रिपोर्टें बताती हैं कि मजदूरों का जीवन इतना अनिश्चित है कि उन्हें एक दिन की छुट्टी भी भारी पड़ती है; ओवरटाइम बंद हो जाए, फैक्ट्री में झगड़ा हो जाए या प्रोटेस्ट के कारण काम कुछ दिन रुके, तो दो–तीन महीने की SIP की सारी योजना हवा हो जाती है।

इसलिए तकनीकी रूप से देखें तो 300–500 रुपये की छोटी SIP सम्भव है, लेकिन प्रैक्टिकली यह सिर्फ कुछ ही मामलों में चल पाएगी – जहाँ:

  • डबल इनकम हो,
  • किराया थोड़ा कम हो,
  • और परिवार बहुत अनुशासित हो।

बाकी बड़े हिस्से के लिए SIP एक लग्ज़री जैसा कॉन्सेप्ट बनकर रह जाता है।


5. क्या ये कभी अपना जीवन सुधार सकते हैं?

आपका सबसे भावुक सवाल यही है – “क्या ये अपना जीवन सुधार सकते हैं, या हमेशा ऐसे ही जीना होगा?”

5.1 व्यक्तिगत स्तर पर सम्भव रास्ते

  1. कौशल–वृद्धि (Skill Upgradation)
    जो मजदूर आज अकुशल काम करते हैं – जैसे हेल्पर, सफाई, सामान उठाना–ढोना – अगर वे धीरे–धीरे कोई स्किल सीख लें:
    • वेल्डिंग, मशीन ऑपरेशन, इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बिंग, ड्राइविंग, कारपेंट्री, टेलरिंग आदि,
    • तो वे “कुशल” कैटेगरी में आ सकते हैं, जहाँ 2–4 हज़ार ज्यादा कमाई की संभावना रहती है।peoplematters+2
    यह आसान नहीं है; इसके लिए समय, ट्रेनिंग और कुछ महीनों की अनिश्चितता झेलनी पड़ती है, लेकिन लॉन्ग टर्म में यही सबसे बड़ा ब्रेक–थ्रू हो सकता है।
  2. बच्चों की शिक्षा पर फोकस
    कई मजदूर परिवार अपने लिए नहीं, पर अगली पीढ़ी के लिए सपना देखते हैं:
    • बच्चों को किसी तरह 10वीं–12वीं पास कराना,
    • फिर ITI, पॉलिटेक्निक, नर्सिंग, ड्राइविंग–लाइसेंस, कोई टेक्निकल डिप्लोमा दिलाना,
    ताकि वे 8–10 हज़ार की जगह 20–25 हज़ार की नौकरी तक पहुँच सकें। यह भारतीय लेबर मार्केट का आम पैटर्न है कि स्किल और शिक्षा से आय–स्तर में छलांग लगती है। मजदूर के लिए सबसे महत्वपूर्ण निवेश वास्तव में SIP नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा और स्किल है।
  3. कर्ज–जाल से बचना
    मजदूर जब साहूकार, मंडी वाले या कंपनी के अंदरूनी उधार में फँस जाते हैं, तो उनका पूरा महीना ईएमआई या कटौती में चला जाता है। इसलिए:
    • पहले कोशिश हो कि कर्ज जितना कम हो सके उतना बेहतर,
    • ज़रूरत हो भी तो महँगे ब्याज से बचें,
    • इमरजेंसी फंड बनाने की कोशिश SIP से भी पहले हो।
    वित्तीय सलाह के लिहाज़ से यह सबसे ज़्यादा व्यावहारिक है – क्योंकि बचत तभी meaningful होती है जब कर्ज का बोझ कंट्रोल में हो।

5.2 सिस्टम और नीतिगत स्तर पर ज़रूरी बदलाव

व्यक्ति कितना भी मेहनत करे, अगर सिस्टम उसके खिलाफ हो तो उसकी प्रगति बहुत धीमी होगी। नोएडा का मजदूर आंदोलन इसी बात की तरफ इशारा कर रहा है।

  • मजदूर संगठन 26,000 रुपये न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं, क्योंकि 13–14 हजार में नोएडा की जीवन लागत के साथ गुज़ारा करना प्रैक्टिकली संभव नहीं है।
  • जब तक सिलेंडर, किराया और फीस पर कोई नियंत्रण या सब्सिडी की व्यवस्था नहीं होगी, मजदूर के पास बचत की गुंजाइश नहीं बनेगी।
  • बेहतर सरकारी स्कूल, सस्ती किराये की कॉलोनियां, और पब्लिक हेल्थ सिस्टम मजबूत होने पर मजदूर का खर्च काफी कम हो सकता है, जिससे थोड़ी–बहुत बचत और निवेश की जमीन तैयार होगी।यह सामाजिक नीति के सामान्य प्रभावों पर आधारित निष्कर्ष है।

संक्षेप में कहें तो, मजदूर की स्टक लाइफ सिर्फ उसकी “बजटिंग की गलती” का नतीजा नहीं है; यह वेतन–संरचना, महंगाई और नीति की खामियों का परिणाम है।


6. क्या SIP असंभव है? – एक संतुलित निष्कर्ष

अगर हम पूरे लेख की बात को एक व्यावहारिक निष्कर्ष में समेटें:

  1. सिंगल इनकम, 11–14 हजार की सैलरी, दो बच्चों के साथ नोएडा में दो कमरे – इस सेटअप में नियमित सेविंग और SIP लगभग असंभव है।facebook+2
  2. डबल इनकम, किराया थोड़ा कम, और कुछ अनुशासन – इस स्थिति में 300–500 रुपये की छोटी SIP या RD संभव है, पर वह भी हर महीने नहीं, और अक्सर इमरजेंसी में टूट जाने का जोखिम रहेगा।
  3. मजदूर की असल उम्मीद SIP से ज़्यादा, इन चीजों में है:
    • बेहतर स्किल,
    • बच्चों की अच्छी शिक्षा,
    • कर्ज से बचाव,
    • और सिस्टम स्तर पर वेतन व महंगाई में संतुलन।

तो, हाँ – आज की हकीकत यह है कि नोएडा के मजदूर के लिए म्यूचुअल फंड SIP कोई आसान या नॉर्मल रास्ता नहीं है। यह कुछ गिने–चुने अनुशासित और थोड़ी बेहतर स्थिति वाले परिवारों के लिए ही “प्रैक्टिकल” हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे कभी अपना जीवन सुधार ही नहीं सकते। रास्ता है – बस वह SIP की सीधी लाइन नहीं, बल्कि संघर्ष, स्किल, शिक्षा और सामूहिक अधिकार–लड़ाई से होकर गुज़रता है।


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