“वर्तमान में नाम जप करो; भूत और भविष्य की चिंता मत करो”

वर्तमान में नाम-जप करो; भूत और भविष्य की चिंता मत करो – पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविन्द शरण जी महाराज का यह वचन केवल एक सुंदर वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण साधना‑मार्ग का सार है। जब साधक हर पल श्री राधा‑नाम में लीन हो जाता है, तब अतीत की ग्लानियाँ और भविष्य की आशंकाएँ स्वतः विलीन होने लगती हैं।

वर्तमान क्षण की महिमा

महाराज जी समझाते हैं कि हमारा मन हमेशा वहाँ भागता है जहाँ हमने अपनी प्रीति बाँध रखी है। यदि मन विषयों और भोगों में रमा है, तो वह बार‑बार उन्हीं की ओर जाएगा; यदि सुख-बुद्धि भगवान के चरणों में रखी जाएगी तो मन स्वतः वहीं टिकने लगेगा। इसलिए वे बार‑बार कहते हैं – “डरना मत, घबराना मत, मन जहाँ भी जाए, उसे बार‑बार लक्ष की ओर, नाम की ओर लौटा लाओ; अन्ततः विजय तुम्हारी ही होगी, क्योंकि तुम्हारा मार्ग सत्य है।”

वर्तमान क्षण ही साधना का वास्तविक मैदान है; न बीता हुआ कल आपके वश में है, न आने वाला कल निश्चित है। जो व्यक्ति अभी, इसी क्षण, हर श्वास के साथ “राधे‑राधे” का स्मरण करता है, वही वास्तव में समय का सदुपयोग कर रहा है।

नाम-जप से मन की शुद्धि

महाराज जी के सत्संगों में बार‑बार यह बात आती है कि नाम‑जप से मन निर्मल होता है, और भजन करते‑करते उसी निर्मल मन से नई प्रेरणा उत्पन्न होती है कि अब कोई नया पापकर्म न किया जाए। वे समझाते हैं कि यदि भीतर कोई खराब विचार उठ भी रहा हो तो साधक को धैर्यपूर्वक नाम जपते रहना चाहिए, उसे देखकर घबराना नहीं चाहिए। जिस प्रकार गन्दा जल निरन्तर स्वच्छ जल मिलाने से स्वतः साफ हो जाता है, उसी प्रकार मन में बैठे पुराने संस्कार सतत नाम‑रस से धीरे‑धीरे धुल जाते हैं।

नाम‑जप केवल जिह्वा का व्यायाम नहीं, हृदय की वृत्ति है। राधा‑नाम का कीर्तन करते हुए वृन्दावन में साधक लोग जिस प्रेम में डूब जाते हैं, वह दिखाता है कि जब नाम हृदय में उतर जाता है तो साधारण उच्चारण भी दिव्य अनुभव में बदल जाता है।

भूत और भविष्य की चिन्ता क्यों व्यर्थ है

महाराज जी कहते हैं कि मन वहाँ नहीं जाता जहाँ हमारा कोई भाव, कोई सम्बन्ध ही न हो; जैसे जिसे मदिरा का कोई भाव ही नहीं, उसका मन कभी शराब के घर की ओर नहीं जाएगा। इसी प्रकार, यदि हम बार‑बार बीते हुए दुखों, गलतियों और अपमानों को ही पकड़े बैठेंगे, तो मन हमेशा उन्हीं गलियों में घूमता रहेगा, और वर्तमान का अमूल्य समय हाथ से निकल जाएगा।

भविष्य की चिन्ता भी उतनी ही अनावश्यक है, क्योंकि वह केवल कल्पनाओं का जाल है। जब तक हम वर्तमान क्षण में नाम और सेवा से सम्बन्ध नहीं जोड़ते, तब तक भविष्य के सुख‑दुख की रचना भी हमारे ही विक्षिप्त मन से होती रहती है। महाराज जी समझाते हैं कि जिसने भगवान में सच्ची सुख‑बुद्धि रख ली, उसके लिए हर परिस्थिति ईश्वर की योजना बन जाती है; वह चिन्ता नहीं, केवल प्रभु की कृपा का भरोसा रखता है।​

अभ्यास से ही स्थिर होता मन

महाराज जी एक सुंदर उदाहरण देते हैं – “आँख बंद करके हम निशाना नहीं लगा सकते, क्यों? अभ्यास नहीं है।” जैसे तीरंदाजी, संगीत या लेखन में अभ्यास से ही कुशलता आती है, वैसे ही भजन में भी लगातार अभ्यास आवश्यक है। यदि हमने वर्षों तक विषय‑चिन्तन का अभ्यास किया है तो अचानक से भगवान‑चिन्तन स्थिर कैसे हो जाएगा?

इसलिए वे कहते हैं कि गलत अभ्यास को सही अभ्यास से मिटाना है – बार‑बार नाम‑स्मरण, कीर्तन, सत्संग और सेवा से। जागृत‑अवस्था में भी और स्वप्न में भी जिसका मन श्रीजी के स्वरूप में लगा रहता है, समझना चाहिए कि उसने अभ्यास से अपने चित्त को उसी ओर प्रशिक्षित कर लिया है।

हर साधक के लिए आश्वासन

पूज्य महाराज जी भक्तों को यह भी समझाते हैं कि कोई भी आकाश से सिद्ध योगी बनकर नहीं आता; सब उसी जीव‑स्वरूप से आते हैं, ईश्वर के अंश हैं, इसलिए सब कुछ कर सकते हैं। जब नारायण नर बन सकते हैं तो नर के लिए नारायण‑स्मरण में स्थिर होना असम्भव नहीं है। वे भक्तों को यह भरोसा देते हैं कि यदि तुम चलोगे, प्रयत्न करोगे, तो भगवान अवश्य कृपा करेंगे, और तुम सदैव सुखी रहोगे।

नाम‑जप का मार्ग अत्यन्त सरल है – न कोई बन्धन, न कोई दिखावा, न कोई खर्च। केवल प्रेम, विश्वास और निरन्तरता चाहिए। महाराज जी स्वयं राधा‑नाम के कीर्तन की ऐसी अलौकिक रसधारा बहाते हैं कि सामान्य साधक भी कुछ ही क्षणों में बाहरी चिन्ताओं को भूलकर केवल “राधे‑राधे” में डूब जाता है।

व्यावहारिक जीवन में इस उपदेश को कैसे अपनाएँ

  1. दिन की शुरुआत कुछ मिनटों के शांत नाम‑जप से करें – नेत्र बन्द करके केवल श्वास के साथ राधा‑नाम का स्मरण।
  2. मोबाइल, समाचार, काम की भागदौड़ से पहले यह निश्चित कर लें कि कम से कम थोड़ी देर मन को प्रभु के नाम में स्थिर कर लिया जाए।
  3. जब भी अतीत की कोई पीड़ा या भविष्य की कोई चिन्ता मन पर छाने लगे, तुरंत मन ही मन “राधे‑राधे” का स्मरण शुरू कर दें और ध्यान को धीरे‑धीरे उस विचार से हटाकर नाम की ओर लौटा लें।
  4. सप्ताह में कम से कम एक बार सत्संग या ऑनलाइन प्रवचन अवश्य सुनें, जिससे विचार‑धारा शुद्ध बनी रहे और प्रेरणा मिलती रहे।
  5. घर के वातावरण में भी नाम‑कीर्तन की सुगन्ध बनाए रखें – सुबह‑शाम धीमे स्वर में भजन लगाएँ, छोटा‑सा पारिवारिक कीर्तन करें, जिससे बच्चों के मन में भी नाम‑रस का संस्कार पड़े।

जब यह अभ्यास गहराता जाता है, तब जीवन की चुनौतियाँ भी भीतर की शान्ति को भंग नहीं कर पातीं। अतीत की गलतियाँ सीख बन जाती हैं, भविष्य की चिन्ताएँ ईश्वर‑विश्वास में घुल जाती हैं, और साधक केवल वर्तमान क्षण में, राधा‑नाम की धुन में, परम आनन्द का अनुभव करने लगता है। यही पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविन्द शरण जी महाराज के इस अमृत वचन का व्यावहारिक सार है – “वर्तमान में नाम जप करो; भूत और भविष्य की चिंता मत करो।”

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