आत्मज्ञान का दिव्य रहस्य: “मैं कौन हूँ?” — श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अमृत वचन

श्री महाराज जी की वाणी में आत्मा का स्वरूप

“भगवान का स्वरूप अंश का तात्पर्य होता है — पूर्ण का अंश भी पूर्ण ही होता है।”
“पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।”
“वह परमात्मा पूर्ण है, उस पूर्ण परमात्मा का अंश भी पूर्ण परमात्मा स्वरूप है।””भगवान ने गीता में कहा — ‘मम वंशो जीव लोके जीव भूतः सनातनः’।””जो सनातन मेरा अंश जीव है, वह मेरा अंश है। जैसे गंगा जी से एक चम्मच गंगाजल निकालो या एक टैंकर निकालो — गंगाजल तो गंगाजल ही है। ऐसे ही परमात्मा का अंश परमात्म स्वरूप ही है।”

“परंतु जब तक देह-भाव है, तब तक जाना नहीं जा सकता। देह-भाव — मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ, जड़-चैतन्य, अच्छा-बुरा — जब तक द्वंद्वों में हमारी मति भ्रमित होती है, तब तक हम परमात्म स्वरूप को नहीं जान सकते।”

“जो द्वंद्वातीत हो गया है, वह सब में अपने भगवान को देखता है और अपने में भी भगवान को देखता है।”

“जो परमात्मा को जान लेता है, तो वह परमात्म स्वरूप ही हो जाता है। क्योंकि परमात्मा स्वरूप ही है।”

“तत् त्वम् असि — मैं कौन हूँ? — तो ‘तत्’ तुम परमात्म स्वरूप ही हो। ‘तम् असि’ — तुम वही हो जिसकी खोज कर रहे हो। और कोई नहीं है। जब खोजने वाले को मिला, तो खोजने वाला खो गया। जब तक मिला नहीं, तब तक खोजने वाला रहा। और जब मिला, तब खोजने वाला नहीं। जब मैं था, तब हरी नहीं। अब हरी है, मैं नहीं। खोजने वाला गायब हो गया।”1

माया में फंसा जीव

“हम सब परमात्म स्वरूप ही हैं, लेकिन अपने स्वरूप को भूलकर माया में ग्रसित होने के कारण काम, क्रोध, लोभ आदि के चक्कर में फंसकर हम पुनरपि जन्म, पुनरपि मरण, पुनरपि जननी जठरे शयनम् — इसमें फंस गए।”

“नाम जप करो, शास्त्र स्वाध्याय करो, सत्संग सुनो, पवित्र आचरण से रहो — तो जान जाओगे। भगवान कृपा करेंगे, तो आप अपने स्वरूप को जान जाओगे।”

“अपना स्वरूप ब्रह्म स्वरूप है, परमात्म स्वरूप है — जिसमें अग्नि अस्त्र का भी प्रवेश नहीं है, वायव अस्त्र, वरुण अस्त्र, इन दिव्य अस्त्रों का भी प्रभाव जिसके ऊपर नहीं — वो मैं हूँ।”

“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः, न चैनं क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः।””वो हमारा दिव्य स्वरूप है। पर हम जन्म-मरण वाले इस शरीर में आसक्त हो गए, इसलिए बार-बार हमें दुर्गति भोगनी पड़ती है।”

“एक बार हमें चांस मिला है — ये मनुष्य शरीर देकर भगवान ने कि हम अपना कल्याण कर लें, अपना उद्धार कर लें।”1

जीवन की भूल-भुलैया

“जैसे ऊपर से स्वच्छ जल गिरा, नीचे आकर गंदा हो गया — ऐसे जन्म लेते ही यह माता, यह पिता, यह भाई, यह बंधु, फिर जवानी, फिर पत्नी, फिर पुत्र, फिर पौत्र — बस इसी में पूरा जीवन निपट गया।”

“वो कभी एक मिनट भी बैठकर सोच नहीं पाया कि मैं कौन था, किस लिए आया हूँ, क्या करना है। वह इसी में भूलकर अपने पूरे जीवन को नष्ट कर दिया।”1

आत्मा और अहंकार का भेद

“हम तीनों शरीर — स्थूल, सूक्ष्म, कारण — को चलाने वाले हैं और हमारा जो स्वरूप है, वह भगवान से मिलता-जुलता है। जैसे भगवान अमल हैं, तो हम अमल हैं। भगवान चैतन्य हैं, तो हम चैतन्य हैं। भगवान अविनाशी हैं, तो हम अविनाशी हैं। भगवान सुखराशि हैं, तो हम सुखराशि हैं।”

“ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशि।हमारा स्वरूप भगवत स्वरूप है। जब हम जान जाएंगे, तो कर्ता भाव हट जाएगा।”2

“जैसे पंखा चल रहा है, इसमें कर् तत्व का अभिमान नहीं, क्योंकि जड़ है। ये तो बिजली से चल रहा है। ऐसे ही आप ईश्वर से चल रहे हैं। कठपुतली को देखा नाचते हुए — वह गर्व कर सकती है कि मैं बढ़िया डांस कर रही हूँ? पीछे जो अंगुलियों का चमत्कार है, वही असली है।”

“ऐसे ही सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के इशारे से हर जीव से क्रिया होती है, पर वह क्रिया को स्वयं कर तत्व भाव में लेता है कि मैंने किया — इसलिए उसे भोगना पड़ता है।”2

भजन, सत्संग और शरणागति

“यह आध्यात्मिक रहस्य है — ये बिना भजन के थोड़ी समझ में आएगा। खूब नाम जप करो, सत्संग सुनो, शास्त्रों का स्वाध्याय करो, पवित्र आचरण रखो, पवित्र भोजन करो। तब बुद्धि शुद्ध होगी, तब जान पाओगे।”

“हमें भी ऐसा ही आभास होगा कि हमें चलाया जा रहा है, बिल्कुल ऐसे ही आभास होगा जैसे इस समय जगत दिखाई दे रहा है सत्य — ऐसे उस समय भगवान दिखाई देंगे, सब में भगवान दिखाई देंगे।”

“अभी भगवान नहीं है, अभी अहंकार है। इसी अहंकार को मिटाया जाता है साधना से। तब देखा जाता है कि अब सब कुछ भगवान ही कर रहे हैं। तब कोई चाह नहीं रहती, तब कोई अनुकूलता-प्रतिकूलता द्वंद्व का प्रभाव नहीं रहता।”2

मानव जीवन का उद्देश्य

“भगवान ने हमें चांस दिया है — 84 लाख योनियों से मुक्त होने का। मानो दे दिया — बड़े भाग मानुष तन पावा। अब खूब अच्छे कर्म करें, भजन करें, शास्त्र स्वाध्याय करें, संत संग करें, परोपकार करें — तो हमारे जीवन सार्थक हो जाएगा।”

“गंदे आचरण करेंगे, तो फिर क्योंकि अगर भगवान ही हमारे जीवन में, तो भगवान गंदे आचरण क्यों करवाएंगे? भला कोई भला आदमी भी अपने आदमी से गंदा काम नहीं करवाएगा, फिर भगवान क्यों करवाएंगे?”

“आपका अहंकार, आपकी बुद्धि, आपका गलत निर्णय, आपका सही निर्णय — ये आपको भोगना पड़ेगा। और इसीलिए सबको भोगना पड़ता है। और जो भगवान की शरण में हो गए, तो फिर कहते हैं — ‘मैं तुम्हारे समस्त पापों से मुक्त करके परम पवित्र कर दूंगा।’ अब शरणागति का मतलब — भगवान का आश्रय लेकर खूब नाम जप करो।”2

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निष्कर्ष — श्री महाराज जी के वचन

“मैं कौन हूँ?” — इसका उत्तर श्री महाराज जी के वचनों में स्पष्ट है:
“हम सब परमात्मा के अंश हैं, परमात्म स्वरूप हैं। जब तक देह-भाव और द्वंद्व में फंसे हैं, तब तक अपने असली स्वरूप को नहीं जान सकते। भजन, सत्संग, शास्त्र स्वाध्याय और पवित्र आचरण से ही आत्मा का सच्चा ज्ञान मिलता है।”
“जब अहंकार मिटता है, तब अनुभव होता है — मैं नहीं, केवल हरि हैं।”

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