करवाचौथ से एक दिन पहले अपने पसंद की सरगी, फीकी, मट्ठी आदि खरीदने की टें’शन। टें’शन इसलिए कहा, क्योंकि मिठाई की दुकानों पर बहुत भीड़भाड़ मिली और ऑफिस से सीधा रिक्शे से मिठाई दुकान पहुंचना। वर्किंग के लिए चुनौती है। घर पर आकर चाय पीने के बाद थोड़ा आराम किया और उसके बाद खाना बनाया। खाना खाने के बाद फिर मेहंदी लगाने के लिए भी पास के बाजार में भीड़ का सामना करना। मेहंदी वाले से भाव तोल करना। फिर मेहंदी की क्यू में लगना। जल्दी नंबर आ जाए तो बहुत भाग्यशाली महसूस करना।
फिर घर आकर मेहंदी के सूखने का इंतजार करना। फिर 11 बजे तक सोना। फिर अगले दिन तड़के चार बजे उठना। नहाना, पुजा करना। अपने लिए पराठे आदि बनाना और खाना, क्यांेकि पूरे दिन कुछ खाना पीना नहीं होता। फिर बच्चे के लिए नाष्ता, लंच तैयार करना। बच्चे के स्कूल की बस पकड़ने तक उसको बालकानी से देखते रहना। फिर परिवार के लिए नाष्ता तैयार करना। फिर ऑफिस के लिए तैयार होना। इतना काम करने के बाद ऑफिस के लिए करवाचौथ स्पेषल ड्रेस पहनने का दबाव होना। फिर ऑटो पकड़के ऑफिस जाना। ऑफिस से हाफ डे लेने के लिए गुजारिष करना। पुरूष बॉस हो तो और दिक्कत। जो आमतौर पर कह ही देते है- वर्त तो षाम का होता है। दोपहर में जाने का क्या मतलब। फिर गुहार लगाना-नहीं सर दोपहर तीन चार बजे से मंदिर में कथा सुननी पड़ती है और भी तैयारी करनी पड़ती है। कुछ भूमिका बनाने के बाद सुनने को मिलता है- अच्छा ठीक है।
दो ढाई दोपरह बजे घर पहुंचना। फिर कुछ बैठने के बाद व्रत की तैयारी करना। थाली तैयार करना। मंदिर जाना। कथा सुनना। फिर कुछ फोटो खिंचाना। व्हाट््सअप आदि पर डालना। फिर थोड़ी देर में षाम हो जाती है और फिर रात के खाने की तैयारी करना। फिर चंदा मामा जी का इंतजार करना। कभी इस बॉलकॉनी से देखना कभी दूसरी बालकॉनी से देखना। फिर 9 बजे या कभी कभी देर में चांद दिख ही जाना। फिर वर्त समापन के रीति रिवाज निभाना। फिर खाना पीना लेना और दूसरे दिन की तैयारी करना। और अगली सुबह फिर बच्चे के स्कूल, खुद का ऑफिस, नाष्ता आदि की तैयारी करना और ऑफिस चले जाना।








