भारत का healthcare सेक्टर अगले कई दशकों तक तेज़ और स्थिर ग्रोथ दे सकता है, लेकिन सीधे शेयर खरीदकर नहीं, बल्कि अच्छे healthcare म्यूचुअल फंड्स के ज़रिये, किसी सेबी-रजिस्टर्ड फाइनेंशियल प्लानर की मदद से निवेश करना ज़्यादा सुरक्षित और समझदारी भरा तरीका है।
1. कौन‑सा सेक्टर जीत रहा है?
- पिछले 10–12 साल में अगर 100 रुपये Nifty 50 में लगाए होते तो आज लगभग 420–430 रुपये बनते, पर वही 100 रुपये इंडिया‑फोकस्ड healthcare कंपनियों में होते तो करीब 1,300 रुपये बन जाते – यानी लगभग 3 गुना ज़्यादा रिटर्न।
- फिर भी Nifty में healthcare का वज़न सिर्फ़ लगभग 3% है, और वो भी ज़्यादातर ऐसी फार्मा कंपनियों में जो भारत नहीं बल्कि US/Europe को एक्सपोर्ट पर ज़्यादा निर्भर हैं, जहाँ ग्रोथ 1–2% जैसी कम है।
- Chief Investment Officer of InCred Asset Management, Aditya Khemka बताते हैं कि असली दम उन कंपनियों में है जो भारत के अंदर अस्पताल, diagnostics, ब्रांडेड जेनेरिक दवाएँ, API/CDMO वगैरह में काम कर रही हैं, क्योंकि इंडिया की healthcare ज़रूरतें अभी बहुत कम पूरी हुई हैं और आगे कई दशक तक तेज़ी से बढ़ेंगी।
2. भारत में हेल्थकेयर इतना तेज़ क्यों बढ़ेगा?
- भारत की per‑capita आय लगभग 2,400–2,500 डॉलर के आसपास है और इस स्तर के बाद दुनिया भर में पैटर्न यह है कि लोग अपनी अतिरिक्त कमाई का बड़ा हिस्सा अपनी सेहत, लुक्स और लाइफ़‑स्टाइल पर खर्च करना शुरू कर देते हैं – कपड़े और खाने पर खर्च एक सीमा के बाद ज़्यादा नहीं बढ़ता, लेकिन स्वास्थ्य पर खर्च की कोई ऊपरी सीमा नहीं होती।
- भारत आज अपने GDP का लगभग 3.4% हेल्थकेयर पर खर्च करता है, जो एक दशक पहले 2.7% था – यानी हिस्सा लगातार ऊपर जा रहा है और आगे भी बढ़ने की संभावना है।
- अस्पतालों की बात करें तो भारत में लगभग 0.8 बेड प्रति 1,000 लोग (यानी लगभग 8 बेड प्रति 10,000) हैं, जबकि दुनिया का औसत लगभग 27 बेड और अच्छे विकसित देशों में 50–120 बेड प्रति 10,000 आबादी तक है; यानी अगर भारत में सभी अस्पतालों की क्षमता 5 गुना भी बढ़ जाए, तब भी हम global level से नीचे ही रहेंगे।
3. हेल्थकेयर के अलग‑अलग उप‑सेक्टर
वीडियो में हेल्थकेयर को कई हिस्सों में बाँटा गया है ताकि आम निवेशक समझ सके कि कहाँ‑कहाँ ग्रोथ के मौके हैं।
- Unbranded Generics
- इनमें Sun Pharma, Cipla, Lupin जैसी कंपनियाँ आती हैं जो ज़्यादातर generic दवाएँ बनाकर US/Europe जैसे mature markets में बेचती हैं, जहाँ ग्रोथ 1–2% है।
- इन पोस्टर‑बॉय कंपनियों ने पिछले 10 साल में बहुत शानदार रिटर्न नहीं दिए, इसलिए लोगों को लगता है कि पूरा healthcare सेक्टर dull है।
- Branded Generics
- Torrent Pharma, Mankind, Macleods जैसी कंपनियाँ भारत और दूसरे उभरते बाज़ारों में ब्रांडेड दवाएँ बेचती हैं; यहाँ प्राइसिंग पावर और ग्रोथ ज़्यादा है।
- उदाहरण के लिए, Torrent Pharma का शेयर लगभग 10 साल में 7–8 गुना तक बढ़ा, जबकि Sun Pharma लगभग वहीं का वहीं रहा, जिससे साफ दिखता है कि सही पॉकेट चुनने पर रिटर्न बहुत अलग हो सकते हैं।
- Hospitals
- यह आज का सबसे तेज़ बढ़ने वाला subsector बताया गया है, क्योंकि beds की भारी कमी है और demand लगातार बढ़ रही है।
- बड़े chains जैसे Apollo आदि कहते हैं कि उनके पास capital और demand की कमी नहीं, असली समस्या doctors और nurses की है, यानी talent constraint की वजह से capacity धीरे‑धीरे बढ़ रही है – यह लंबी अवधि के लिए मज़बूत pricing power और stable occupancy का संकेत है।
- Diagnostics
- कोविड के बाद बड़े diagnostic chains ने footprint, technology और quality में भारी निवेश किया है; अब इन पर return मिलने का समय शुरू हो रहा है।
- सरकारी अस्पतालों के पास लगभग 50–60% infrastructure होने के बावजूद वे सिर्फ़ 20% paying patients serve कर पाते हैं, बाकी लोगों को private hospitals और labs की तरफ़ जाना पड़ता है, जिससे organized diagnostics को tailwind मिलती है।
- API/CDMO और बाकी
- कई भारतीय कंपनियाँ दवाओं के कच्चे माल और contract manufacturing (CDMO) में global सप्लाई‑चेन का हिस्सा बन रही हैं, लेकिन China पर raw material की dependency risk भी है, इसलिए चुनिंदा अच्छे players में ही मज़बूत मौका है।
4. सीधे शेयर क्यों ख़तरनाक हैं?
वीडियो सुनकर लग सकता है कि बस healthcare शेयर खरीदने शुरू कर दें, लेकिन आम निवेशक के लिए यह सीधा रास्ता काफी जोखिम भरा है।
- 390 से ज़्यादा listed healthcare कंपनियाँ
- सिर्फ़ इस सेक्टर में ही लगभग 390–395 listed कंपनियाँ हैं; उनमें से सही 15–20 चुनकर पोर्टफोलियो बनाना full‑time research का काम है।[youtubesummary]
- गलत पॉकेट चुनने का बड़ा जोखिम
- अगर आप Sun/Cipla जैसे poster‑boy exporters ही खरीद लें और भारत‑फोकस्ड hospitals या branded generics miss कर दें, तो आपके returns पूरे सेक्टर की असली growth को reflect ही नहीं करेंगे।[youtubesummary]
- Valuation और cycle समझना मुश्किल
- कुछ consumer companies 100 गुना cash earnings पर trade कर रही हैं, जबकि Apollo जैसे बड़े hospital chains 50 गुना से भी नीचे हैं; आम निवेशक के लिए यह समझना आसान नहीं कि कौन सस्ता है और कौन महँगा।[youtubesummary]
- Talent, regulation और policy risk
- doctors‑nurses की कमी, price caps, insurance नियम, China‑dependency जैसे मुद्दे हर subsector पर अलग असर डालते हैं; इन सबको track करना अकेले investor के लिए practically बहुत मुश्किल है।[youtube]
इसीलिए वीडियो में जो macro कहानी दिखती है, उसे practically लागू करने का सुरक्षित तरीका सीधे 2–4 स्टॉक उठाना नहीं, बल्कि planning के साथ diversified healthcare exposure लेना है।[youtubesummary]
5. आम लोगों के लिए सही तरीका: प्लानर के साथ healthcare म्यूचुअल फंड
आप जैसे retail investor के लिए सबसे practical रास्ता यह है कि:
- पहले अपना financial plan बनवाएँ
- किसी SEBI‑registered financial planner या fee‑only advisor से बात करके ये तय करें:
- आपके goals क्या हैं (बच्चों की पढ़ाई, रिटायरमेंट, घर आदि)
- उन goals तक कितना समय है (5 साल, 10 साल, 20 साल)
- आपकी जोखिम उठाने की क्षमता कितनी है (moderate, high, low)
- प्लानर यह भी देखेगा कि आपके पूरे पोर्टफोलियो में equity, debt, gold, real estate और cash का allocation कैसा होना चाहिए; वीडियो में Aditya खुद अपनी wealth को gold/silver, healthcare fund, real assets और liquidity में बाँटकर risk manage करने की बात करते हैं।[youtube][youtubesummary]
- किसी SEBI‑registered financial planner या fee‑only advisor से बात करके ये तय करें:
- Healthcare exposure म्यूचुअल फंड्स के ज़रिये लें
- भारत में sectoral/thematic healthcare और pharma म्यूचुअल फंड्स मौजूद हैं, जो hospitals, diagnostics, branded generics, devices आदि में diversified portfolio बनाकर निवेश करते हैं।[incredassetmanagement][youtube]
- इन फंड्स के fund manager रोज़‑रोज़ companies की balance sheet, valuations, regulation और global trends track करते हैं; आम आदमी के लिए यह research खुद करना practically असंभव है।[incredassetmanagement]
- लंबी अवधि (5–10 साल या उससे ज़्यादा) तक SIP के ज़रिये धीरे‑धीरे निवेश करने से आप healthcare की secular growth में हिस्सा ले सकते हैं और short‑term ups and downs का असर कम हो जाता है।[youtube]
- “सिर्फ़ healthcare” में all‑in मत होइए
- healthcare secular है, पर फिर भी यह equity ही है – इसमें भी गिरावटें आएँगी, sector rotation होगा, कुछ सालों में रिटर्न कम भी हो सकते हैं।[youtube]
- प्लानर आमतौर पर suggest करेगा कि आपका core पोर्टफोलियो broad market index या diversified funds में रहे, और healthcare जैसे sectors में बस सीमित हिस्सा (जैसे कुल equity का कुछ प्रतिशत) thematic allocation के रूप में रखें।[youtube]
- Mutual fund के फ़ायदे आम निवेशक के लिए
- Diversification: एक fund के ज़रिये hospitals, diagnostics, pharma, devices आदि में फैलाव मिल जाता है; किसी एक stock में ग़लती का नुकसान सीमित हो जाता है।
- Professional management: Aditya Khemka जैसे experienced professionals sector की गहराई समझकर stock‑picking करते हैं; आप indirect तौर पर उनकी research का फायदा mutual fund या PMS के ज़रिये लेते हैं।
- Consistent, relatively smoother growth: individual stock का chart बहुत उछल‑कूद दिखा सकता है, लेकिन diversified portfolio से time के साथ compounding relatively smooth दिखती है, जो आम retail investor के लिए emotionally भी manageable रहती है।[youtube]
निष्कर्ष (संक्षेप में विचार)
लेकिन इस कहानी को पकड़ने का सुरक्षित तरीका सीधे 2–3 स्टॉक उठाना नहीं, बल्कि किसी भरोसेमंद financial planner के साथ मिलकर अपनी ज़रूरतों के हिसाब से asset allocation सेट करना और फिर अच्छे healthcare‑focused म्यूचुअल फंड्स के ज़रिये धीरे‑धीरे, disciplined तरीके से निवेश करना है, ताकि आपको अच्छे healthcare शेयरों की ताक़त भी मिले और पोर्टफोलियो की risk भी control में रहे।
भारत का healthcare सेक्टर लंबे समय के लिए तेज़, secular और कम‑penetrated growth story है – अस्पताल, diagnostics, branded pharma आदि सब मिलकर आने वाले दशकों में अर्थव्यवस्था से तेज़ बढ़ सकते हैं।







