“नौकरी और शादी के बाद भगवान में आस्था क्यों घटती है? — श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अमृत वचन” (EN)

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नौकरी और शादी के बाद आस्था कम क्यों होती है?

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के उद्धरणों में उत्तर

“हमारी जब कामनाओं की पूर्ति होती है तो हम उसमें लिप्त हो जाते हैं, भजन को छोड़ देते हैं। जिनके कारण कामनाओं की पूर्ति हुई, उस कारण को छोड़ देते हैं और क्रिया पर आसक्त हो जाते हैं। पत्नी, पुत्र, परिवार, मनोनुकूल मिल गया, भूल गए भगवान को।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी कहते हैं कि जब तक हमारे जीवन में कोई अभिलाषा, कोई इच्छा अधूरी रहती है — जैसे नौकरी पाने की, विवाह करने की, संतान की — तब तक हम भगवान की शरण में जाते हैं, भजन करते हैं, प्रार्थना करते हैं। लेकिन जैसे ही ये इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, हमारा मन उन्हीं में लिप्त हो जाता है और हम भगवान को भूल जाते हैं।

आस्था क्यों घटती है?

“हमें चाहिए कि हम अपना भजन और बढ़ावे, क्योंकि यह चीजें स्थाई नहीं हैं। यह स्थाई नहीं हैं — नौकरी भी छूट सकती है, पत्नी भी पधार सकती है, पुत्र भी पधार सकता है, आप भी पधार सकते हैं। यह मृत्यु लोक है, नाशवान है।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि नौकरी, पत्नी, पुत्र, परिवार — ये सब अस्थायी हैं। मृत्यु लोक में कुछ भी स्थायी नहीं है। जब तक इच्छाएँ अधूरी थीं, तब तक भगवान की याद थी। इच्छाएँ पूरी होते ही मन उन्हीं में उलझ गया।

भजन क्यों छोड़ देते हैं?

“फिर क्या हाथ लगेगा? न पत्नी साथ जाएगी, न पुत्र साथ जाएगा, न शरीर साथ जाएगा, न बैंक बैलेंस साथ जाएगा, न नौकरी साथ जाएगी, साथ जाएगा तो भगवान का नाम जाएगा।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी कहते हैं कि अंत में केवल भगवान का नाम ही साथ जाएगा। बाकी सब यहीं छूट जाएगा। भजन करना बहुत भाग्य से मिलता है।

भजन में मन क्यों नहीं लगता?

“भजन हो या न हो, चलेगा ऐसा नहीं। ठीक है, भजन करो।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी बार-बार कहते हैं — भजन को कभी झूठ नहीं देना चाहिए। मन लगे या न लगे, भजन करते रहना चाहिए।

कामनाओं की पूर्ति के बाद भजन क्यों छूट जाता है?

“हमारी जब कामनाओं की पूर्ति होती है तो हम उसमें लिप्त हो जाते हैं, भजन को छोड़ देते हैं, जिनके कारण कामनाओं की पूर्ति हुई, उस कारण को छोड़ देते हैं और क्रिया पर आसक्त हो जाते हैं।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज 1

महाराज जी के अनुसार, जब तक जीवन में कोई कमी रहती है, तब तक भगवान की याद रहती है। जैसे ही मनचाही चीज मिलती है, मन उसी में लग जाता है।

महाराज जी के प्रमुख उद्धरण

  • “यह चीजें स्थाई नहीं हैं, नौकरी भी छूट सकती है, पत्नी भी पधार सकती है, पुत्र भी पधार सकता है, आप भी पधार सकते हैं।”

  • “यह मृत्यु लोक है, नाशवान है। फिर क्या हाथ लगेगा? न पत्नी साथ जाएगी, न पुत्र साथ जाएगा, न शरीर साथ जाएगा, न बैंक बैलेंस साथ जाएगा, न नौकरी साथ जाएगी, साथ जाएगा तो भगवान का नाम जाएगा।”

  • “भजन तो बहुत भाग्य से करने को मिलता है। यदि थोड़ा भी मन भजन में लग रहा है तो उसको और बढ़ाना चाहिए, उसको झूठ नहीं देनी चाहिए।”

  • “भजन हो या न हो, चलेगा ऐसा नहीं। ठीक है, भजन करो।”

  • “हमारी जब कामनाओं की पूर्ति होती है तो हम उसमें लिप्त हो जाते हैं, भजन को छोड़ देते हैं।”

  • “जिनके कारण कामनाओं की पूर्ति हुई, उस कारण को छोड़ देते हैं और क्रिया पर आसक्त हो जाते हैं।”

  • “पत्नी, पुत्र, परिवार, मनोनुकूल मिल गया, भूल गए भगवान को।”

  • “हमें चाहिए कि हम अपना भजन और बढ़ावे, क्योंकि यह चीजें स्थाई नहीं हैं।”

  • “भजन करना बहुत भाग्य से मिलता है।”

  • “भजन को कभी झूठ नहीं देना चाहिए।”

  • “मन लगे या न लगे, भजन करते रहना चाहिए।”

महाराज जी की सीख: भजन क्यों जरूरी है?

“भजन करना बहुत भाग्य से मिलता है। यदि थोड़ा भी मन भजन में लग रहा है तो उसको और बढ़ाना चाहिए, उसको झूठ नहीं देनी चाहिए।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी समझाते हैं कि भजन का अवसर मिलना बहुत सौभाग्य की बात है। इसलिए यदि थोड़ा भी मन भजन में लग रहा है, तो उसे और बढ़ाना चाहिए।

क्या भजन के बिना जीवन सफल है?

“न भजन होगा, न भगवान का नाम साथ जाएगा, तो अंत में क्या हाथ लगेगा?”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी का स्पष्ट संदेश है — भजन के बिना जीवन सफल नहीं हो सकता।

भजन में निरंतरता क्यों जरूरी है?

“भजन को कभी झूठ नहीं देना चाहिए। भजन हो या न हो, चलेगा ऐसा नहीं। ठीक है, भजन करो।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी बार-बार कहते हैं कि भजन में निरंतरता जरूरी है।

मूल कारण: मोह और आसक्ति

“पत्नी, पुत्र, परिवार, मनोनुकूल मिल गया, भूल गए भगवान को।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज 1

महाराज जी के अनुसार, जब तक जीवन में अभाव था, तब तक भगवान की याद थी। लेकिन जब इच्छाएँ पूरी हो गईं, तब मोह और आसक्ति ने मन को बांध लिया।

महाराज जी का समाधान

“हमें चाहिए कि हम अपना भजन और बढ़ावे, क्योंकि यह चीजें स्थाई नहीं हैं।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

महाराज जी का समाधान है — भजन को कभी न छोड़ो, चाहे जीवन में कोई भी स्थिति हो।

सारांश

  • नौकरी और शादी के बाद भगवान में आस्था कम होने का मुख्य कारण है — इच्छाओं की पूर्ति के बाद मन का उन्हीं में लिप्त हो जाना।

  • महाराज जी बार-बार समझाते हैं कि ये सब चीजें अस्थायी हैं, केवल भगवान का नाम ही अंतिम सत्य है।

  • भजन में निरंतरता, भक्ति में दृढ़ता और भगवान के नाम का स्मरण ही जीवन का परम लाभ है।

  • भजन को कभी झूठ नहीं देना चाहिए, चाहे मन लगे या न लगे, भजन करते रहना चाहिए।

निष्कर्ष

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अनुसार, जीवन में जब तक इच्छाएँ अधूरी रहती हैं, तब तक मन भगवान की ओर रहता है। लेकिन इच्छाओं की पूर्ति के बाद मन उन्हीं में उलझ जाता है और भजन छूट जाता है। महाराज जी का स्पष्ट संदेश है — भजन को कभी न छोड़ें, क्योंकि यही जीवन का अंतिम और शाश्वत सत्य है।

“भजन करना बहुत भाग्य से मिलता है। यदि थोड़ा भी मन भजन में लग रहा है तो उसको और बढ़ाना चाहिए, उसको झूठ नहीं देनी चाहिए।”— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज Sources:1 https://www.youtube.com/watch?v=97cAG3mG00g

  1. https://www.youtube.com/watch?v=97cAG3mG00g

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