पाप तो पिछले जन्म में किये थे तो इस जन्म में क्यों भोगने पड़ रहे हैं? श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के शब्दों में संपूर्ण वाणी (EN)

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पिछले जन्म के पाप, आत्मा और शरीर — श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज की वाणी

“पाप तो पिछले जन्म में किये थे, तो इस जन्म में क्यों भोगने पड़ रहे हैं?”

श्री महाराज जी कहते हैं:

“प्रश्न है कि पाप कर्मों का फल शरीर को ही भोगना पड़ता है, आत्मा को नहीं। लेकिन आत्मा आसक्त हो चुकी है शरीर पर। समस्या तो इसी बात की है कि आत्मा शरीर में आसक्त हो सकती है। जैसे तुम ईमानदारी से बताओ, तुम अपने को आत्मा मानते हो या शरीर? शरीर मानते हो ना! इसी वजह से बार-बार दुख भोगना पड़ रहा है, जन्म-मरण भोगना पड़ रहा है।”

महाराज जी समझाते हैं कि जब हम साधना द्वारा अपने को शरीर से अलग देख लेते हैं, तो जीवन मुक्त हो जाते हैं, विदेह मुक्त हो जाते हैं, मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। समस्या यही है कि निर्विकार आत्मा विकारी शरीर में फँस गई। शरीर ने नहीं फँसाया, आत्मा ने स्वयं इसको स्वीकार कर लिया।

“जैसे मैं पुरुष हूँ, अब वह ‘मैं’ है आत्मा, और पुरुष है माया। अब आत्मा ने माया को पकड़ लिया और कह रही है माया ने मुझे पकड़ लिया। उल्टा बोलेंगे ना आप! आप बोलेंगे उल्टा कि मैं तो छूटना चाहता हूँ, पर माया ने मुझे पकड़ लिया। ऐसे हम पकड़े हैं।”

महाराज जी उदाहरण देते हैं:”अब हम कहते हैं माइक ने मुझे पकड़ लिया, मैं तो छोड़ना चाहता हूँ, तो छोड़ दो! तुम्हें किसने पकड़ रखा है? तुम ही काम को भोगते हो, तुम ही क्रोध करते हो, तुम ही लोभ करते हो, तुम ही मोह करते हो। तुम्हें किसने पीड़ा दी? जब इच्छा करोगे, तब आएगा। ऐसे थोड़ी काम आ जाएगा। आप विषयों का ध्यान करोगे, विषयों का चिंतन करोगे, तो काम आ जाएगा। अगर भगवान का चिंतन करोगे, भगवान का ध्यान करोगे, तो भगवान आ जाएंगे।”

मानव देह का महत्व

महाराज जी कहते हैं:

“हमारी गलती हो गई है, इसी गलती को मिटाने के लिए हमें मानव देह मिला है। हम खूब नाम जप करें, शास्त्र स्वाध्याय करें, गंदे आचरणों का त्याग करें, पवित्र भोजन करें, समाज को सुख देने वाले कार्य करें, किसी को दुख न दें। अभी-अभी ज्ञान प्रकट होना शुरू हो जाएगा।”

जैसे-जैसे ज्ञान प्रकट होगा, वैसे-वैसे हम अपने शरीर को अलग देखेंगे। जितना दूर आप हैं, उतना दूर शरीर है। हम शरीर नहीं हैं, यह अनुभव शुद्ध ज्ञान से होता है। यह अंदर की अनुभूति होनी चाहिए, बातचीत की बात नहीं है।

“सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय, गर्मी-सर्दी, मान-अपमान — सब सह गए, क्योंकि वह शरीर में हो रहे हैं, अपने में नहीं। पाप और पुण्य, कर्ता और भोगता — ये सब हमारी गलती से हो गया। हमने गलती से अपने को शरीर मान लिया।”

तपस्या और साधना का महत्व

महाराज जी कहते हैं:

“यह गलती ऐसे मिटने वाली नहीं कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ’ — इतने से थोड़ी निपट जाएगा। इसके लिए तपस्या करनी पड़ेगी, साधना करनी पड़ेगी।”

तपस्या क्या है?”आए हुए काम के ताप को सह जाना, क्रोध को सह जाना, समाज के द्वारा दी हुई प्रतिकूलता को सह जाना, खूब नाम जप करना, भगवान से प्रार्थना करना कि हमें शुद्ध ज्ञान दो।”

“भगवान अनुभव करा देते हैं, वह भगवत स्वरूप हो जाता है, वह साक्षात भगवान का स्वरूप हो जाता है।”

पाप कर्म का फल — क्यों भोगना पड़ता है?

महाराज जी को प्रश्न –

“अभी नवीन शरीर में उसका भोग क्यों करना पड़ रहा है?”

महाराज जी उदाहरण देते हैं:

“क्योंकि आप ही हो ना! आत्मा तो पूर्व में भी वही थी। मान लो, जैसे आप पैजामा-कुर्ता पहन के हमें पीड़ा दें, और पट-शर्ट पहन के घूमे। जब हम रिपोर्ट करेंगे, तो पिटोगे तो तुम ही ना! तुम्हारा पट-शर्ट थोड़ी बचा लेगा? नहीं! आप कह दो — पैजामा-कुर्ता वाला तो और था। नहीं! तू ही पैजामा-कुर्ता पहने था, तो तू ही पूर्व जन्म में शरीर धारण करके पाप करके आया है, अब वह शरीर छूट गया, अब यह शरीर मिला है, तो तू ही ना! तो तुम्हें ही तो भोगना पड़ेगा।”

आत्मा और शरीर का संबंध

महाराज जी कहते हैं:

“यह शरीर क्या है? कपड़ा। वस्त्र जैसे जीर्ण होता है, वैसे ही शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए — यह आत्मा का कपड़ा है। आत्मा ने वह कपड़ा पहनकर पाप किया, लेकिन कपड़ा उतार कर आ गया, तो भोगता कौन बनेगा? वही आत्मा! शरीर बदलने से आत्मा नहीं बदलती।”

महाराज जी उदाहरण देते हैं:

“घाघरा-चुनरी पहनकर गलत काम करो और फिर पट-शर्ट पहन लो। जब पकड़े जाओगे, तो यह थोड़ी होगा कि ‘हमने घाघरा-चुनरी में किया था’, नहीं! डंडा चलेगा, डंडा चलेगा कि नहीं चलेगा!”

सजा उसी शरीर को क्यों नहीं मिलती?

महाराज जी कहते हैं:

“बहुत बड़ा हिसाब है। जैसे आप 5 मिनट पाप करो, इसके बाद पूरे जीवन भर सजा भोगनी पड़ेगी। तो अगर हम प्रश्न करें कि 5 मिनट पाप किया, तो 5 मिनट सजा दो, पूरे जीवन क्यों सजा भोगनी पड़ेगी? यही इसीलिए कि पाप कर्म का फल बहुत लंबा होता है।”

“अनेक जन्मों से हम पाप करते चले आ रहे हैं। अब मनुष्य जन्म मिला है, अब तुम्हें छूट है। आज तुम कोई पाप कर डालो, तुम्हें अभी दंड नहीं मिलेगा। तुम्हें पीछे का भी दंड भोगना पड़ेगा, जो पीछे करके आए पाप-पुण्य, उसको भोगना पड़ेगा।”

“अभी पाप कर रहे हो, आपका पुण्य का नंबर लगा हो, तो आप बहुत सफल होते चले जाओगे। तो आपको लगेगा कि पाप कर्म कर रहा हूँ, बड़े मौज से रह रहा हूँ। मौज से नहीं रह रहे तुम्हारे पुण्य कर्म इस समय लागू हो गए, इसलिए मौज है। और जिस समय पुण्य कर्म खत्म हुए, यह वर्तमान का पाप और पूर्व का पाप — कनेक्शन तो ब्लास्ट हो जाएगा, फिर रहा न को कुल रोवन हारा, मिट्टी में मिल जाओगे।”

कर्म का जाल और मृत्यु

महाराज जी से पूछा गया — दुर्घटना में सभी एक साथ क्यों मरते हैं?

“कर्म का संयोग मिल जाता है। जैसे हमने पूर्व जन्म में 50 लोग मिलकर एक ही पाप कर्म किए, जैसे तुम दोनों का प्रश्न एक साथ हुआ ना, क्यों हुआ? क्योंकि प्रश्न मिल गया, तुम दोनों का प्रश्न एक हुआ, तो तुम दोनों के नाम एक साथ गए ना। तुम दोनों अलग-अलग हो, तो तुम दोनों का जैसे प्रश्न मिल गया, ऐसे पूरी सृष्टि में 240 लोगों का कर्म मिल गया, अब वही 240 उसमें बैठा ले जाएंगे, जो एक साथ भस्म होंगे, उनका कर्म मिल गया।”

“पूरी सृष्टि के कर्म संयोग जब मिलते हैं, तो जो जहाँ का होता है, वह आकर के वहीं में आकर के संपन्न हो जाता है। बड़ा सिस्टम विचित्र है, सरकारी सिस्टम है, क्योंकि भगवान त्रिकालदर्शी हैं, वह सब देख रहे हैं। इसलिए बहुत होश से कर्म करो, बहुत संभल-संभल कर कर्म करो, पाप कर्म न बनने पाए।”

“मान लो 50 आदमी को एक ही जगह मरना है, अब कोई दिल्ली से आ रहा है, कोई मुंबई से आ रहा है, कोई और, वही 50 आकर मिलेंगे, वही मरेंगे। यह है कर्मों का बड़ा जाल बिछा हुआ है।”

श्री महाराज जी की वाणी से मुख्य बिंदु

  • आत्मा और शरीर का संबंध: आत्मा शुद्ध है, लेकिन शरीर में आसक्त होने से जन्म-मरण और दुख भोगती है।

  • कर्म का फल: जो पाप कर्म पूर्व जन्म में किए, उनका फल इस जन्म में भोगना पड़ता है, क्योंकि आत्मा वही है, शरीर बदलता रहता है।

  • मानव जन्म का उद्देश्य: गलती को सुधारने के लिए, साधना, नाम जप, शास्त्र स्वाध्याय, पवित्र आचरण और सेवा।

  • तपस्या और साधना: काम, क्रोध, लोभ, मोह पर नियंत्रण, नाम जप, और भगवान से शुद्ध ज्ञान की प्रार्थना।

  • कर्मों का जाल: पाप-पुण्य का फल तुरंत नहीं, बल्कि संचित होकर कई जन्मों में भोगना पड़ता है।

  • मृत्यु और संयोग: एक साथ मृत्यु भी कर्म संयोग का परिणाम है, भगवान की व्यवस्था में सब कुछ न्यायपूर्ण है।

निष्कर्ष

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज की वाणी में स्पष्ट है कि आत्मा अपने कर्मों का फल अवश्य भोगती है, चाहे शरीर बदल जाए। मानव जीवन का उद्देश्य अपने कर्मों को सुधारना, शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना और मोक्ष की ओर बढ़ना है। साधना, तपस्या, नाम जप, सेवा और शुद्ध आचरण ही इस जाल से मुक्ति का मार्ग है। महाराज जी की यह वाणी आज के जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक है, जो हमें अपने कर्मों के प्रति जागरूक करती है और मोक्ष की ओर प्रेरित करती है1.

  1. https://www.youtube.com/watch?v=_WZYXJhiH-E

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