भगवान से जुड़ने का सबसे अच्छा तरीका क्या है ?

भगवान से जुड़ने का सबसे अच्छा तरीका क्या है ?

भगवान से जुड़ने का सबसे अच्छा तरीका है- भगवान की शरण में हो जाना, अंदर से भगवान की शरण में हो जाना.

जब हम मूर्छित होते हैं, तब हम कुछ नहीं कर सकते, जब हमारी भारी विपत्ति में बुद्धि चकरा जाती है, तब कुछ नहीं कर सकते. कई ऐसी दुखी परिस्थितियों आती हैं जिसमें हम कुछ नहीं कर सकते उस समय आश्रय काम करता है. भगवत आश्रय काम करता है और भागवत आश्चर्य को तत्काल भगवान स्वीकार करते हैं.

जैसे सुग्रीव जी और बाली परस्पर वैर करते थे. बाली जी सुग्रीव जी को मारते थे और यहां तक कि बाली ने जान से मारने का उपाय किया तो सुग्रीव भाग के एकांत में ऐसी जगह रह रहे थे, जहां बाली शाप वश नहीं जा सकते थे.

बिल्कुल ध्यानपूर्वक सुनना.

सुग्रीव को दूर से दिखा, दो राजकुमार आ रहे हैं, उसने सोचा, बाली तो ऋषि के शाप की वजह से यहां नहीं आ सकते.

सुग्रीव ने सोचा- हो सकता है बाली ने इन राजकुमारों को भेजा हो. तो उसने हनुमान जी महाराज को भेजा. हनुमान जी महाराज ब्राह्मण के रूप में गए और जब भगवान से परिचय पूछा, आप कौन हैं तो उन्होंने कहा, हम दशरथ पुत्र राम- लक्ष्मण है. हमारी पत्नी को कोई अपहरण करके ले गया है. हम उसकी खोज कर रहे हैं. तो हनुमान जी महाराज चरणों में गिरे, अपने प्रभु को पहचान करके और अपने कंधे पर बैठा कर लेकर आए, तो सुग्रीव दूर से ही देखकर समझ गए कि मित्र पक्ष है क्योंकि कंधे पर बैठ कर ले आ रहे हैं. अ

अब सुग्रीव जी ने आज तक कोई भगवान की प्राप्ति का साधन नहीं किया था, भगवान और सुग्रीव को हनुमान जी मिला रहे हैं.

मतलब भक्त (हनुमान जी) के द्वारा भगवान की आश्रय वृद्धि प्राप्त होती है.

सुग्रीव जी को विश्वास दिलाने के लिए भगवान ने अग्नि को साक्षी किया और कहा हम आज से आपको शका भाव से स्वीकार करते हैं अर्थात आप हमारे मित्र हैं. किस भय से तुम यहां रह रहे हो तो सुग्रीव जी ने बताया, हमारा भाई हमारा दुश्मन है. वह हमें मारने के लिए तैयार है.

भगवान् ने कहा, मैं उसे एक बाण से मार दूंगा तुम चिंता ना करो. सुग्रीव जी ने भगवान के बाहुबल की रक्षा से किष्किंधा का राज्य प्राप्त किया. भगवान ने बाली को मारा तो उसके बाद भगवान् 4 महीने भगवान पर्वत पर रहे, सुग्रीव एक दिन भी नहीं गया. सुग्रीव खुद पर्वत पर प्राण छुपाए रहता था. भगवान केआश्रय से किष्किंधा का राजा बना लेकिन एक दिन भी दर्शन करने नहीं गया, ऐसा उनकी भक्ति थी, केवल आश्रय था.

जब बाली को भगवान ने मारा तो बाली ने पूछा- ‘मैं बैरी सुग्रीव प्यारा कारण कवन नाथ में मारा’

मैं आपका दुश्मन हो गया और सुग्रीव आपका प्रिय हो गया ऐसा क्यों? हम दोनों भाई हैं, हम जानते है कि हम कितने भजनानंदी है, हमने कोई साधन भजन नहीं किया, इसने (सुग्रीव जी) ने कोई साधन भजन bhajan नहीं किया, आपने मुझे क्यों मारा, इसका पक्ष क्यों लिया.

तो भगवान ने कहा यह मेरा शरणागत है, शरणागत का मित्र मेरा मित्र होता है, शरणागत काका शत्रु मेरा शत्रु होता है. यह मेरा प्रण है.

तो कहने के मतलब है कि आश्रय मात्र से भगवान की प्रियता प्राप्त होती है, हम अन्य साधन धीरे-धीरे करते रहे, लेकिन हृदय से जब हम भगवान को अपना मानने लगते हैं- हे भगवान मैं आपका और आप मेरे, भगवान मेरे, मैं भगवान का, मैं किसी का नहीं. सिर्फ इतनी बात हृदय में आ जाए तो सहज में भगवत प्राप्ति हो जाए. पर यह आना बड़ा कठिन है क्योंकि जब तक ”सबकी ममता ताक बटोरी मम पद मन ही बाँध पर डोरी” तब तक बात नहीं बनेगी जब तक सबसे प्यार समेटकर एकमात्र भगवान के चरणों में अर्पित नहीं किया जाता तब तक आश्चर्य पुष्ट नहीं होता.

भगवान कह रहे हैं- सबका प्यार सबकी ममता को समेट कर जो मेरे चरणों में समर्पित कर देता है वह मेरा आश्रित हो जाता है और मेरे आश्रित का त्रिभुवन में कभी कोई बाल बांका नहीं कर सकता, फिर उसके हृदय में भगवान की भक्ति के प्रभाव से शुद्ध ज्ञान प्रकट होता है, माया मल का नाश हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है, भगवान का प्रेम प्राप्त हो जाता है.

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