शौच, स्नान, भोजन करते समय रखें इन बातों का विशेष ध्यान Take special care of these things while defecating, bathing and eating

महाराज जी के शब्दों में.

कलियुग में मलिनता की प्रधानता रहेगी।

हमें शरीर को सजाने में प्रियता है। लेकिन पवित्रता क्या है? यह ज्ञान नहीं है।

शौचाचार की पवित्रता का बिल्कुल ज्ञान नहीं है.

बस सजाने की प्रियता है।

हमें बाहर से चिकना दिखना चाहिए। लेकिन वो पवित्र है कि नहीं। इसका हमें ज्ञान नहीं है, बिल्कुल पता ही नहीं।

हमें शौचाचार का पशुवत आचरण देखने को मिलता हैं।

खड़े खड़े लघुशंका कर रहे हैं। मुंह में बीड़ी, जनेंद्र को छुआ।

ना हाथ धोना। ना आचमन करना। ना पैर धोना। बिल्कुल। पशुता का आचरण है।

अब भला शरीर पवित्र कैसे रहे?

तो मन तुम्हारा पवित्र कैसे हो सकता है?

तुम्हारे आचरण कैसे पवित्र रहेंगे?

शौच गए. थोड़ा हाथ धोया बस निकल पड़े.

कपड़ा सब अपवित्र। पूरे घर को अपवित्र कर दिया.

अब समझते हैं कि हम बहुत स्वच्छ और बहुत वी आई पी हैं। यह है वी आई पी का मतलब।

इस नए जमाने में एक और नया रंग चढ़ा है।

जूता मोजा पहनकर भोजन पा रहे है। देखो

कैसी बुद्धि है? अरे साधारण गाँव का किसान आदमी जिसको कोई शास्त्र से मतलब नहीं है. वो हाथ पैर धो कर के पीड़ा पर बैठ करके भोजन खाता है।

इतनी पवित्रता तो हमने गाँव में देखी थी.

गाँव में बिल्कुल शास्त्र नहीं जानते। पर हाथ पैर धोकर और भगवान को हाथ जोड़ करके जमीन पर बैठ कर भोजन पाते थे.

चमड़े का जूता पहन कर भोजन करते है.

ध्यान रखना चमड़े की बेल्ट पहनने वाला और चमड़े के जूते पहनने वाले को गऊ हत्या का पाप लगता है।

जो ग्रहस्थ जन चमड़े से बनी चीजों का प्रयोग करते हैं। तो उसे गो हत्या का दंड मिलता है। क्योंकि आप पहनते है. आप भी गऊ हत्या में सहयोगी है. आप प्रोत्साहन दे रहे है.

यदि लघुशंका करने के बादआपने जनेंद्र शालन नहीं किया। हाथ नहीं धोया। चरण नहीं धोये। आचमन नहीं किया तो आप अपवित्र हैं।

अरे लघुशंका क्या शौच होने के बाद भी ऐसा नहीं करते है.

विचार बिल्कुल शून्य हो गया है. बस शरीर को आराम चाहिए । पशु की तरह शरीर आराम।

क्या शरीर आराम रहेगा, जब तुम्हारा शरीर पवित्र नहीं है तो पाप बनेगा।

पाप से तुम्हें शरीर को दुख भोगना पड़ेगा।

हमारी पापाचरणों की जो प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। उसका कारण है- खान पान अपवित्र। शरीर अपवित्र।

हमने पहले देखा है वो अब आपको मजाक सा लगेगा।

भोजन पाने के समय घर के जितने भी व्यस्क जन होते थे। जब कच्चा भोजन पाया जाता था। तो ऊपर के वस्त्र उतार देते थे। नीचे धोती पहने हुए। क्योंकि कपड़े पहनकर बाहर कार्यो में रहते थे.

जल को हाथ पर लेकर हाथ जोड़ कर थोड़ी देर भगवान का स्मरण करते थे. वो कोई साधु महात्मा नहीं। कोई वैष्णव नहीं थे.

किसान आदमी की बात कर रहे हैं.

पहले परोसने के वक्त अगर कहीं रोटी छू गई परोसने वाले को तो डाँट लगती थी। उसको कहा जाता था, पूरी रसोई झूठी करोगे. रख थाल। हाथ धोकर दूसरी थाली ले.

आज उसी से अमुक ले रहा है। उसी से अमुख ले रहा है। उसी से अमुख ले रहा है। वो शराब पीने वाला है। मांस खाने वाला है। गन्दे तरीके से उसी से आप ले रहे हैं।

बोलते है कि आज समाज में चलता है.

समाज में तो समाज को लेकर चलना ही पड़ेगा।

भाई समझो।

पवित्रता अति अनिवार्य है। इसे आप समझो। अगर आप अपवित्र पशुओं जैसे व्यवहार करेंगे तो आपकी बुद्धि भी पशुता आचरण करेगी। आसुरी भाव को प्राप्त हो जाएगी।

पवित्रता शरीर आप को फल देगा .

आपका मन पवित्र होने लगेगा। क्यूंकि शरीर से आसक्त मन है और मन से आसक्त आप हो.

जहाँ आपका मन पवित्र है, अच्छे विचार, अच्छा, मार्ग, अच्छा निर्णय बुद्धि करेगी। आपको आनंद मिलने लगेगा।

बड़ी अपवित्रता बढ़ रही है?

अपवित्रता को तो कोई समझ ही नहीं रहा है.

हमको तो ऐसा भी बताया है कि कहीं कहीं ऐसा भी है कि शौच में पानी का ही प्रयोग नहीं होता?

टिश्यू पेपर का प्रयोग होता है.

विचार करो यार. मतलब हम कहाँ पहुँच रहे है.

कहते है वी आई पी लोग हैं.

जैसे मछली जल में ही खेल करती है ऐसे कलियुगी प्राणी का मन पाप में ही खेल करना चाहता है.

रसोई अभी बनकर तैयार नहीं हुई है. वही खड़े खड़े खाना झूठा कर रहे है.

एक बार बन जाए उसे थाल में लगाओ। फिर खाओ.

हम नहीं कहते तुम भगवान का भोग लगाओ

लेकिन अन्न को प्रणाम करो। अन्न ब्रह्म है. उपनिषद में कहा गया है, अन्न ब्रह्म है। उसे प्रणाम करो। वो हमारे जीवन को पुष्ट करता है। हमें भगवत भाव देता है.

पहले शादी ब्याह में पट्टियाँ बिछाई जाती थी गोबर से। जमीन लिपी होती थी। दो आदमी पात्र ले खड़े सबके हाथ पैर धुलाए थे.

सब बैठ गए। फिर सबको परोसा जाता था. माताएँ मंगल गीत गाती थी.

आज कोई ऐसा शायद ही मिलेगा जो शराब न पिए हो। कोई ऐसा कम मिलेगा जो उद्दंडता न कर रहा हो। पशुता बढ़ रही है. कल्याण की कोई नहीं सोच रहा बस उनका यही कल्याण है। बस जनेंद्र रसेंद्र की तृप्ति होती रहे.

गोस्वामी जी कह रहे हैं, नाम काल का भी काल है. लेकिन आपने शौचाचार का पालन नहीं किया तो आपको नाम में रुचि नहीं होगी.

जब मन आया खाने लगे. चिड़िया की तरह चुगते रहते है. एक बार दो बार तीन बार खाने का निश्चित समय बनाओ. वैसा ही आपका जैसे भोजन आपका है. लोग चिंतित रहते है, क्योंकि खाने के समय चिंतित थे. भोजन का रस अब केवल परेशानी पैदा करेगा. भोजन के वक्त सारी चिंताओं को छोड़ो.

आनंद में होकर, भोजन करो. प्रसाद समझकर भगवत भाव से खाओ. वो भोजन ऐसी बुद्धि पैदा करेगा। आप आनंदित रहोगे।

महाराज जी के प्रवचन पढ़ने में आपको अगर कोई दिक्कत हो रही है, तो आप वीडियो क्लिक करके उनके प्रवचन को सुन कर लाभ ले सकते है.

https://youtu.be/rufQmH3u2U0?si=exhzjmDBIU76Zw5q

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