शहरों में रहने वालों को बरसाने से सीखने की जरूरत

शहरों में रहने वालों को बरसाने से सीखने की जरूरत

होली के मौके पर एक चीज जो की जानी चाहिए

बोलो राधा रानी की जय, बरसाने वाली की जय, नन्द के लाल की जय

आज बृज में होली रे रसिया। आज बृज में होली रे रसिया

इस गीत को यूट्यूब में सुने और देखे। गीत में बरसाने की विश्व प्रसिद्ध होली दिखाई गई है। होली के रंगों से सराबोर। वहीं ‘वृंदावन मार्ग’ नाम के एक यूट्यूब चैनल में 19 मार्च को मनी बरसाने की लट्ठमार होली देखो। बहुत भीड़, ढेर सारा टेसू का रंग, पिचकारियों की फुहारें देखने को मिलेगी। पुरूष और महिलाएं दोनों मिलकर ठाकुर जी के समय से मनती रही होली को परपंरागत तरीके से मनाते हैं। कोई बदतमीजी नहीं और ना किसी को परेशान करने की कोशिश, बस सिर्फ आनंद ही आनंद। खूब लट्ठ चलते हैं और खूब परपंरागत तरीके से गालियों का रंग घुलता है लेकिन बदतमीजी, बलसलूकी, झगड़ा आदि जैसे शब्दों का कोई नामोनिशान नहीं।

ना बदतमीजी ना झगड़ा

मैं 19 मार्च को लट्ठमार होली के दिन तो बरसाने में नहीं था लेकिन एक हफ्ते पहले 12 को वहां जरूर था। उस समय भी रंग का माहौल था, लट्ठमार होली जैसा परमानंद तो नहीं था लेकिन एक दूसरे को रंग लगाने, उड़ाने और बरसाने में श्री लाडली जी महाराज मंदिर में गोस्वाजी (पुजारी जी) लाडली जी महाराज के चरणों में पड़े रंग को भक्तों पर उढ़ेल कर अद्भुत आनंद दे रहे थे। भीड़ भी काफी थी। मुझे किसी तरह का बुरा अनुभव नहीं हुआ। मेरे साथ पूरा परिवार था।

कोई किसी को परेशान नहीं कर रहा था, ना जबरदस्ती रंग लगा रहा था। ना कोई बदतमीजी कर रहा था। महिलाएं श्री राधा रानी की भक्ति में मग्न होकर नृत्य कर रही थी।

दिल्ली एनसीआर

अब बात करें जहां मैं रहता हूं। दिल्ली एनसीआर की। यहां भी बरसाने की तरह एक हफ्ते 10 दिन पहले होली शुरू हो जाती है लेकिन जहां बरसाने में प्रभू को याद करके भक्ति में बेसुध होकर शुद्ध रूप से आनंदमय होली खेली जाती है। वहीं दिल्ली आदि कई इलाकों के मोहल्लों में छतों और बालकोनियों से सड़कों पर चलते राहगीरों पर गुब्बारे मारने को होली समझते है। बसों, ऑटो, टू व्हीलर और गाड़ियों पर गुब्बारे मारने को होली कहते है। खासकर लड़कियों पर गलत तरीके से गुब्बारे मारने को होली कहते है। पिछली बार दिल्ली के किसी इलाके में कुछ गंदे लड़कों द्वारा एक विदेशी महिला के साथ जबरदस्ती और मारपीटकर होली खेलने का एक गंदा वीडियो भी सामने आया था।

यहां तो शराब पीकर पड़ोसी से झगड़ने और तेज गाड़ी चलाकर ठोकने और रौंदने की घटनाएं सामने आती है।

मुर्गों और बकरों को काटने का महापाप

दूसरा सबसे गंदी बात तो लगती है, होली के त्योहार के नाम पर बेचारे बकरे और मुर्गों को जमकर काटा जाता है और अपने जीभ के स्वाद के चक्कर में यह महापाप किया जाता है।

बरसाने में तो मीट मांस क्या लस्सन प्याज भी बहुत लोग सेवन नहीं करते। ज्यादातर होटल रेस्तरां में लस्सन प्याज का इस्तेमाल नहीं होता।

मैं यहां नहीं कहता कि वहां सबकुछ ठीक होता होगा लेकिन दुनिया की इस प्रसिद्ध होली के उत्सव में बरसाने वाले एक सुंदर दृश्य पेश करते हैं, जबकि हम हर बार यह गलतियां करते हैं। सुधरते नहीं है।

मैंने अपने सोसाइटी के व्हाट्सअप ग्रुप में लिखा था कि पेरेंट्स अपने बच्चों को गुब्बारे खरीद कर नहीं दें। वे ऊपर की मंजिलों से नीचे फेंक रहे हैं। किसी को दर्द देकर त्योहार मनाने का कोई अर्थ नहीं है। मेरे इस मैसेज पर 507 सदस्यों वाले ग्रुप में सिर्फ दो लोगों ने ही मेरी बात का समर्थन किया। बाकी चुप्पी मारके बैठ गए, क्योंकि वह त्योहार की गंदी मौज मस्ती में डायरेक्ट इनडायरेक्ट जुड़े हुए हैं।

निष्कर्ष

तो साथियों अब जान तो गए हो कि यह सब बातें लिखने का मेरा क्या उद्देश्य हैं। प्लीज आओ बरसाने की होली यहां भी उसी जोश के साथ खेलते हैं।

बोलो राधा रानी की जय, बरसाने वाली की जय, नन्द के लाल की जय

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