मेरा ऐसा पुत्र हो जाय, उसका कल्याण हो जाय-इस उद्देश्यसे माँ-बापने थोड़े ही संग किया ! उन्होंने तो अपने सुखके लिये संग किया। हम पैदा हो गये तो हमारेपर उनका ऋण कैसे? (EN)

प्रश्न- मेरा ऐसा पुत्र हो जाय, उसका कल्याण हो जाय-इस उद्देश्यसे माँ-बापने थोड़े ही संग किया ! उन्होंने तो अपने सुखके लिये संग किया। हम पैदा हो गये तो हमारेपर उनका ऋण कैसे?

उत्तर- केवल सुखासक्तिसे संग करनेवाले स्त्री-पुरुषके प्रायः श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न नहीं होते। जो स्त्री-पुरुष शास्त्रके आज्ञानुसार केवल पितृ ऋणसे मुक्त होनेके लिये ही सन्तान उत्पन्न करते हैं, अपने सुखका उद्देश्य नहीं रखते, वे ही असली माता-पिता हैं। परन्तु पुत्रके लिये तो कैसे हों, किसी भी तरहके माता-पिता हों, वे पूज्य ही हैं; क्योंकि उन्होंने मानव-शरीर देकर पुत्रको

परमात्म प्राप्तिका अधिकारी बना दिया ! उपनिषदोंमें आता है कि विद्यार्थी जब विद्या पढ़कर, स्नातक होकर गृहस्थमें प्रवेश करनेके लिये गुरुजीसे आज्ञा लेता, तब गुरुजी उसको आज्ञा देते कि ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ अर्थात् तुम माता-पिताको साक्षात् ईश्वररूप मानकर उनकी आज्ञाका पालन करो; उनकी सेवा करो। यह ऋषियोंकी दीक्षान्त शिक्षा है और इसके पालनमें ही हमारा कल्याण है। अतः पुत्रको जिनसे शरीर मिला है, उनका कृतज्ञ होना ही चाहिये।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुख जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

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