ऐसा देखने में आता है कि जिन्होंने गर्भपात किया है, वे स्त्रियां भी पुनः गर्भवर्ती होती हैं और उनकी सन्तान भी होती है। अतः यह कैसे मानें कि गर्भपात करने वाले की फिर सन्तान नहीं होगी ?

ऐसा देखने में आता है कि जिन्होंने गर्भपात किया है, वे स्त्रियां भी पुनः गर्भवर्ती होती हैं और उनकी सन्तान भी होती है। अतः यह कैसे मानें कि गर्भपात करने वाले की फिर सन्तान नहीं होगी ?

उत्तर- इस जन्म का तो पहले ही प्रारब्ध बन चुका है-अंतः उस प्रारब्ध के अनुसार उसकी सन्तान हो सकती है। परंतु अगले जन्म में (नया प्रारब्ध बनने पर) उनकी सन्तान नहीं होगी। इस जन्म में किये गर्भपात रूप महापाप का फल उनको अगले जन्मों में भोगना पड़ेगा।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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