सतीप्रथा उचित है या अनुचित ?

प्रश्न- सतीप्रथा उचित है या अनुचित ?

उत्तर-सती होना ‘प्रथा’ है ही नहीं। पतिके साथ जल जाना सती होना नहीं है। जिसके मनमें सत् आ जाता है, उत्साह आ जाता है, वह आगके बिना भी जल जाती है और उसको जलनेका कोई कष्ट भी नहीं होता। यह कोई प्रथा नहीं है कि वह ऐसा ही करे प्रत्युत यह तो उसका सत्य है, धर्म है, शास्त्र मर्यादापर विश्वास है।

हरदोई जिलेमें इकनोरा नामका गाँव है। वहाँ एक लड़की अपनी ननिहालमें थी। पति बीमार था, वह मर गया। उसको पतिके मरनेका समाचार मिला। उसने मामासे पूछा कि सती सुलोचनाको पतिका सिर नहीं मिलता तो वह क्या करती ? मामाने कहा कि मुझे क्या पता ? उसने कहा कि मामाजी ! मैं सती होऊँगी। मामाने कहा कि ऐसा नहीं करना बेटी ! उसने कहा कि मैं करती नहीं हूँ, होता है। उसने दीपक जलाया और उसपर अपनी अँगुली रखी तो उसकी अँगुली मोमबत्तीकी तरह जलने लगी। उसने मामासे कहा कि आप मुझे सती होनेकी आज्ञा देते हैं या नहीं। नहीं तो आपका यह साथ घर भस्म हो जायगा। मामाने कहा कि अच्छा तेरी जैसी मरजी हो, वैसा कर। उसने जलती हुई अँगुलीको एक दीवारपर बुझाया और घरसे बाहर जाकर पीपलवृक्षके नीचे खड़ी हो गयी तथा मामासे कहा कि मुझे लकड़ी दो। मामाने कहा कि हम न लकड़ी देंगे, न आग। गाँवके लोग वहाँ इकट्ठे हो गये थे। उसने हाथ जोड़कर सूर्यभगवान्से प्रार्थना की कि हे नाथ! आप आग दो। ऐसा कहते ही वह वहाँ खड़ी-खड़ी अपने-आप जल गयी! उस आगसे पीपलके पत्ते जल गये। यह सब गाँवके लोगोंने अपनी आँखोंसे देखा। वहाँके मुसलमानोंसे पूछा गया तो उन्होंने भी कहा कि यह सब घटना हमारे सामने घटी है। करपात्रीजी महाराज भी वहाँ गये थे और उन्होंने दीवारपर काली लकीर देखी, जहाँ उसने अपनी जलती हुई अँगुली बुझायी थी और पीपलके जले हुए पत्ते भी देखे ।

तात्पर्य है कि यह सतीप्रथा नहीं है। यह तो उसका खुदका धार्मिक उत्साह है। इस विषयमें प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीने ‘सतीधर्म हिन्दूधर्मकी रीढ़ है’ नामक पुस्तक लिखी है, उसको पढ़ना चाहिये।

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