यदि युवा स्त्री विधवा हो जाय तो उसको क्या करना चाहिये ?

प्रश्न- यदि युवा स्त्री विधवा हो जाय तो उसको क्या करना चाहिये ?

उत्तर – जीवित अवस्था में पति जिन बातों को अच्छा मानते थे और जो बातें उनके अनुकूल थीं, उनकी मृत्युके बाद भी विधवा स्त्री को उन्हींके अनुसार आचरण करते रहना चाहिये। उसको ऐसा विचार करना चाहिये कि भगवान् ने जो प्रतिकूलता भेजी है, यह मेरी तपस्याके लिये है। जान-बूझकर की गयी तपस्या से यह तपस्या बहुत ऊँची है। भगवान् के विधान के अनुसार किये गये तप, सयंम की बहुत अधिक महिमा है। ऐसा विचार करके उसको मनमें हर समय उत्साह रखना चाहिये कि मैं कैसी भाग्यशालिनी हूँ कि भगवान् ने मेरे को ऐसा तप करने का सुन्दर अवसर दिया है! भागवत में आया है-

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।

हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥

(श्रीमद्भा० १०। १४।८)

‘जो मनुष्य क्षण-क्षणपर बड़ी उत्सुकतासे आपकी कृपा का ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्धानुसार जो कुछ सुख या दुःख प्राप्त होता है, उसे निर्विकार मन से भोग लेता है एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गदगद वाणी और पुलकित शरीर से अपने को आपके चरणोंमें समर्पित करता रहता है- इस प्रकार जीवन व्यतीत करने वाला मनुष्य ठीक वैसे ही आपके परम पद का अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिता की सम्पत्ति का पुत्र !’

विधवा स्त्रीको अपने चरित्र की विशेष रक्षा करनी चाहिये। अगर वह व्यभिचार करती है तो वह अपने दोनों कुलों को कलंकित करती है, मर्यादाका नाश करती है और मरने के बाद घोर नरकों में जाती है। अतः उसको मर्यादामें रहना चाहिये, धर्म- विरुद्ध काम नहीं करना चाहिये। माता कुन्ती की तरह उसको अपने वैधव्य-धर्मका पालन करना चाहिये। माता कुन्तीको याद करने से अपने धर्मके पालनका बल मिलता है।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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