भगवान के भजन को कल के लिए टालना, प्रमाद की स्थिति है

मनुष्य जीवन अनमोल है, लेकिन हममें से अधिकांश इसे यूँ ही रोज़मर्रा की भागदौड़, चिंताओं और व्यर्थ के मनोरंजनों में गँवा देते हैं। जब बात भगवान के भजन, नाम-स्मरण और साधना की आती है, तो हमारे होंठों पर अनजाने में एक ही वाक्य आ जाता है – “कल से पक्का शुरू करूँगा।” परम पूज्य वृन्दावन रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविन्द शरण जी महाराज इसी मनोवृत्ति को संबोधित करते हुए स्पष्ट चेतावनी देते हैं – “भगवान के भजन को कल के लिए टालना, प्रमाद की स्थिति है।” यह कथन केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक स्थिति का आईना है, जो बताता है कि हम ईश्वर के प्रेम से कितने दूर हैं और संसार के मोह में कितने उलझे हुए हैं। इस लेख में हम समझने का प्रयास करेंगे कि भजन को टालना प्रमाद क्यों है, प्रमाद वास्तव में क्या होता है, इसके हमारे जीवन पर क्या दुष्परिणाम पड़ते हैं और श्री महाराज जी की शिक्षाओं के आलोक में हम आज से ही भजन को अपने जीवन का अपरिहार्य हिस्सा कैसे बना सकते हैं।


1. कथन का अर्थ और भाव

  • “भजन को कल के लिए टालना प्रमाद की स्थिति है” का सीधा अर्थ है कि ईश्वर-स्मरण, नाम-जप, कीर्तन, पाठ, साधना आदि को “आज नहीं, कल कर लूंगा” कहना आध्यात्मिक गिरावट की शुरुआत है।facebook+1
  • योग व भक्ति-शास्त्रों में प्रमाद को चित्त की ऐसी दुर्बलता कहा गया है, जिसमें साधक साधन को जानते हुए भी उसे टालता, हल्के में लेता या उसकी महत्ता को नहीं समझता।
  • संतों के अनुसार यह महज़ “आलस” नहीं, बल्कि भगवान से मिलने के अवसर को स्वयं नकार देना है, इसलिए इसे बहुत घातक बताया गया है।

2. प्रमाद क्या है? आध्यात्मिक दृष्टि से

  • हिन्दवी शब्दकोश के अनुसार प्रमाद का अर्थ है भूल, चूक, अनवधानता, अंतःकरण की दुर्बलता और साधना के साधनों की ठीक से भावना न करना।
  • योगशास्त्र में प्रमाद उन अंतरायों में गिना गया है जो साधक के ध्यान और समाधि को भंग करते हैं, अर्थात जो भगवान-प्राप्ति के मार्ग में रुकावट बनते हैं।
  • भक्ति मार्ग में प्रमाद का अर्थ है–
    • नाम-जप, भजन, सत्संग, शास्त्र-पठन को महत्त्व न देना।
    • “फुर्सत में करूंगा”, “रिटायरमेंट के बाद करूँगा”, “कल से नियमित बैठूँगा” जैसा मनोभाव रखना।
    • संसार के कामों को सर्वोपरी और ईश्वर-स्मरण को ‘अतिरिक्त’ या ‘फुर्सत का काम’ मान लेना।youtube+1

3. भजन को टालना क्यों प्रमाद है?

  • मृत्यु निश्चित है, पर उसकी घड़ी अनिश्चित है; इसलिए जो आज भजन टाल रहा है, उसे कल का भरोसा नहीं, यह बात संत बार-बार याद दिलाते हैं।
  • हर एक भजन, हर एक नाम-स्मरण से संसार से वैराग्य, भगवान से प्रेम और आत्म-स्वरूप का ज्ञान एक-साथ बढ़ता है; इसे टालना इन तीनों वरदानों को टालना है।
  • संत महात्मा समझाते हैं कि भजन की गाढ़ स्थिति में साधक को शरीर का होश तक नहीं रहता; यदि हम हर दिन इसे टालते रहेंगे तो यह परिपक्व अवस्था कभी आएगी ही नहीं।
  • जब मन यह कहे– “अभी तो व्यस्त हूँ, बाद में करूँगा” – वही क्षण पकड़कर भजन को चुनना साधकता है, और उसी को टालना प्रमाद है।

4. महाराज जी की शिक्षा: भजन की महत्ता

  • श्री हित प्रेमानंद गोविन्द शरण जी महाराज का सम्पूर्ण मार्गदर्शन नाम-जाप, हरि-स्मरण और प्रेम-भरे भजन पर केंद्रित है; वे बाहरी प्रदर्शन से अधिक सरल, सच्चा स्मरण सिखाते हैं।
  • प्रवचनों में वे बताते हैं कि सच्चा भजन वही है जिसमें साधक भगवान में इतना तन्मय हो जाए कि जैसे नींद में शरीर का भान नहीं रहता, वैसे ही जागृत अवस्था में भी देह-चेतना पीछे छूट जाए।
  • महाराज जी समझाते हैं कि केवल माला चलाते हुए संसार की बातें करते रहना भी एक प्रकार का प्रमाद है; इससे अच्छा है थोड़ा समय सही भाव से, एकाग्र होकर नाम-स्मरण करना।
  • वे यह भी बताते हैं कि हर एक भजन से–
    • शरीर और संसार से वैराग्य बढ़ता है,
    • भगवान से प्रेम बढ़ता है,
    • अपने वास्तविक स्वरूप (जीव-चेतना) का बोध जागृत होता है।

5. “कल पर टालने” के नुकसान

  • भजन को कल पर टालने से धीरे-धीरे मन में यह धारणा बन जाती है कि भक्ति कोई ‘ज़रूरी’ नहीं, बल्कि केवल ‘अतिरिक्त’ काम है; यह धारणा ही प्रमाद है।
  • निरंतर टालते-टालते मन कठोर हो जाता है, संवेदनशीलता घटती है, और भगवान की याद आने पर भी मन तुरंत किसी बहाने की ओर भागता है।
  • सत्संग, कथा और संत-वचन बार-बार सुनने के बाद भी यदि व्यवहार में परिवर्तन नहीं आता, तो ज्ञान केवल ‘श्रवण’ तक सीमित रह जाता है; यह भी प्रमाद का लक्षण है।youtube+1
  • भजन से मिलने वाला आंतरिक आनंद, स्थिरता, भय से मुक्ति और पाप-वासनाओं की शांति एक दिन में नहीं आती; यह निरंतर अभ्यास से मिलती है, इसलिए हर दिन टालना आध्यात्मिक प्रगति को शून्य बना देता है।

6. केवल 10–15 मिनट भी क्यों अमूल्य हैं

  • महाराज जी जैसे संत बार-बार कहते हैं कि यदि कोई पूरे दिन में केवल दस-पंद्रह मिनट भी सच्चे भाव से भजन कर ले, तो उसका बड़ा आध्यात्मिक प्रभाव होता है।
  • नियमित, भले थोड़ा ही सही, भजन से मन पर एक स्थायी संस्कार बनता है, जो आगे चलकर लंबे समय के भजन, ध्यान और समाधि की भूमि तैयार करता है।[
  • उदाहरण के लिए, यदि कोई गृहस्थ रोज सुबह केवल 15 मिनट नाम-जाप और गुनगुनाते हुए कोई सरल भजन कर ले, तो दिनभर के व्यवहार में भी संयम, धैर्य और संतोष की वृद्धि महसूस कर सकता है।

7. प्रमाद से बचने के व्यावहारिक उपाय

  • प्रतिदिन का निश्चित समय:
    • जैसे “सुबह उठकर स्नान से पहले 10 मिनट नाम-जाप”,
    • “रात सोने से पहले 5–10 मिनट भजन या श्लोक-पाठ” को नॉन-नेगोसिएबल नियम बनाएं।
  • छोटा लक्ष्य, दृढ़ निश्चय:
    • शुरुआत में अधिक समय तय न करें, नहीं तो मन बहाने खोजेगा।
    • 5–10 मिनट का व्रत लें: “जो भी हो, इन मिनटों में केवल भगवान की स्मृति ही होगी।”
  • वातावरण का निर्माण:
    • घर के किसी कोने में छोटा-सा स्थान केवल भजन, पाठ, ध्यान के लिए निर्धारित करें।
    • मोबाइल, टीवी और बातचीत से दूर, शांत जगह पर बैठें; मन पर इसका त्वरित प्रभाव पड़ता है।
  • सत्संग से प्रेरणा:
    • संत-महात्माओं के प्रवचन, भजन और कथाएं सुनना प्रमाद तोड़ने में बहुत सहायक है; सत्संग की प्रेरणा मन में भजन की तड़प जगाती है।
  • नाम-जाप को दिनचर्या में जोड़ना:
    • काम करते हुए, चलते-फिरते, वाहन चलाते समय मन ही मन नाम-जप, छोटे-छोटे मंत्र या प्रिय भजन की पंक्तियाँ गुनगुनाना।
    • इससे “समय नहीं है” वाला बहाना स्वतः समाप्त हो जाता है।

8. भजन के प्रकार और उनका अभ्यास

  • नाम-स्मरण और नाम-जप:
    • “राधे राधे”, “श्याम श्याम”, “हरे कृष्ण” जैसे नामों का निरंतर मनन, जीभ से या मन ही मन।
  • कीर्तन और भजन-गान:
    • महाराज जी के सान्निध्य में जो भजन-कीर्तन होते हैं, उनमें स्वर पूर्ण न भी हो, पर प्रेम होना ज़रूरी है; भगवान राग नहीं, प्रेम देखते हैं।
  • लीलास्मरण और कथा-श्रवण:
    • भगवान की लीलाओं, बाल्य वृत्तांतों, व्रज की रसिक कथाओं का सुनना और याद करना भी भजन ही है।
  • शास्त्र-पाठ और चिंतन:
    • गीता, भागवत, रसिक ग्रंथ, संत-वाणी आदि का नियमित, थोड़ा-थोड़ा पाठ कर, उस पर मनन करना भी भजन का ही अंग है।

9. गृहस्थ जीवन में भजन और प्रमाद

  • गृहस्थ साधक के लिए रोज़मर्रा के कार्य– नौकरी, व्यापार, परिवार, बच्चों की ज़िम्मेदारी– सबके बीच भजन के लिए समय निकालना चुनौतीपूर्ण लगता है, इसलिए “कल से शुरू करूँगा” वाला प्रमाद बहुत सामान्य है.
  • संत समझाते हैं कि भगवान गृहस्थ जीवन के दायित्वों के विरोधी नहीं हैं; वे तो केवल इतना चाहते हैं कि इन सब के बीच भी हृदय में उनकी स्मृति बनी रहे।
  • व्यावहारिक रूप से गृहस्थ इन उपायों से प्रमाद से बच सकते हैं–
    • सुबह उठते ही मोबाइल देखने की बजाय पहले दो मिनट नाम-जाप।
    • भोजन से पहले और बाद में छोटा-सा कीर्तन या दो पंक्तियाँ भजन की।
    • घर में सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ सामूहिक भजन-संध्या तय करना।

10. अंतर्दृष्टि: “आज” ही सबसे बड़ा अवसर

  • संतों की दृष्टि में आज ही हमारे पास वास्तविक धन है; कल केवल संभावना है, निश्चितता नहीं।
  • यदि अभी भगवान याद आ रहे हैं, मन भजन की ओर आकर्षित हुआ है, तो यही भगवान की कृपा का क्षण है; इसे टालना उसी कृपा को ठुकराना है, जो प्रमाद कहलाता है।
  • इसलिए श्री हित प्रेमानंद गोविन्द शरण जी महाराज का कथन हमें यह सिखाता है कि–
    • भजन के लिए कोई “उचित समय” नहीं, हर क्षण उचित है।
    • कोई “उचित अवस्था” नहीं, वर्तमान अवस्था ही पर्याप्त है।
    • जो अभी है, उसी में, जितना हो सके, उतना भजन शुरू कर देना ही सच्ची साधकता है।

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