सोने में छिपा संकट: जब केंद्रीय बैंक कर्ज़ से बचाव के लिए दौड़े तिजोरियों की ओर

यह आर्टिकल “As debts mount, central banks flirt with gold’s hidden value” (Economic Times Prime, अक्टूबर 2025) समझाता है कि कैसे बढ़ते कर्ज़ों से जूझती दुनिया की सरकारें सोने के भंडार को आर्थिक बीमारी छिपाने के औज़ार के रूप में देखने लगी हैं। नीचे इसका आसान हिंदी संस्करण दिया गया है, ताकि आम पाठक इसे सरलता से समझ सकें।


सोना: राष्ट्रों की छिपी हुई ताकत

हर देश के पास सोने का भंडार होता है—कभी तिजोरियों में रखा, तो कभी विदेशी बैंक खातों में जमा। अब, जब कर्ज़ बढ़ते जा रहे हैं और अर्थव्यवस्थाएँ धीमी पड़ रही हैं, तो वही पुराना सोना एक बार फिर चर्चा में है।

विश्व के कई केंद्रीय बैंक अब उस सोने को ‘आर्थिक ऑक्सीजन’ की तरह देखने लगे हैं। सीधे बेचने के बजाय, वे इसे गिरवी रखकर या उसके बदले डॉलर कमाकर अपनी वित्तीय हालत सँभालने की कोशिश कर रहे हैं।


बढ़ते कर्ज़ की पृष्ठभूमि

पिछले कुछ सालों में COVID, रूस-यूक्रेन युद्ध, और मंदी की आशंकाओं ने दुनिया भर की सरकारों पर भारी खर्च का बोझ डाला।

  • अमेरिका का सरकारी कर्ज़ अब उसके GDP से भी ज़्यादा हो गया है।
  • यूरोप ब्याज दरों और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है।
  • जापान का कर्ज़ उसके GDP के लगभग दोगुना के बराबर है।

ऐसी हालत में नए टैक्स लगाना जनता को गुस्सा दिला सकता है। कर्ज़ घटाने का एकमात्र रास्ता है—कोई वैकल्पिक संपत्ति, और वहीं आता है “सोना”।


सोना क्यों बना सहारा

सोना हमेशा से मूल्य का स्थायी प्रतीक माना गया है। डॉलर कमजोर पड़ता है, शेयर गिरते हैं, लेकिन सोना लंबे समय तक स्थिर रहता है।

केंद्रीय बैंक इसे इसलिए खरीदते हैं ताकि संकट के समय मुद्रा की कीमत बची रहे। लेकिन अब वे इसे बेचने की बजाय उसके “भविष्य के उपयोग” पर दांव लगा रहे हैं — यानी सोने की ऊँची कीमत का इस्तेमाल करके नकली मजबूती दिखाना।


वित्तीय रसायन शास्त्र: सोने से नकली स्थिरता

इसे ‘फाइनेंशियल अलकेमी’ कहा जा सकता है — मिट्टी को सोना नहीं, बल्कि सोने को भ्रम में बदलने की कला।

सरकारें अपने केंद्रीय बैंक को कहती हैं:
“हमारे पास इतना सोना है, तो चिंता क्यों?”

लेकिन हकीकत यह है कि वे सोना बिकाऊ संपत्ति की तरह उपयोग नहीं करतीं, बल्कि उसे ‘कागज़ी सुरक्षा’ में बदलकर अपनी बैलेंस शीट में दिखाती हैं ताकि निवेशकों को भरोसा रहे।

यह तरीका थोड़ा वैसा है जैसे कोई परिवार अपने घर को गिरवी रखकर बैंक को दिखाए कि वे अब भी आर्थिक रूप से सुरक्षित हैं।


केंद्रीय बैंकों का बढ़ता सोना प्रेम

2022 से 2025 के बीच, केंद्रीय बैंकों ने रिकॉर्ड मात्रा में सोना खरीदा। विश्व स्वर्ण परिषद (World Gold Council) के अनुसार, इस अवधि में करीब 1,100 टन सोना खरीदा गया — जो दशकों में सबसे ज़्यादा है।

  • तुर्की, चीन, रूस और भारत जैसे देश अग्रणी रहे।
  • चीन अपने सोने को सार्वजनिक आंकड़ों में कम दिखाता है लेकिन धीरे-धीरे भंडार बढ़ा रहा है।
  • भारत भी रिज़र्व बैंक के जरिए विदेशी संपत्ति में सोना बढ़ा रहा है ताकि डॉलर निर्भरता घटे।

अमेरिका का ‘सोने’ से डर

ज्यादातर देश अपने सोने के भंडार का कुछ हिस्सा अमेरिकी फेडरल रिज़र्व या ब्रिटेन के बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में रखते हैं। यह भरोसे पर टिका सिस्टम है। लेकिन जब देश जैसे रूस पर पाबंदियाँ लगाईं गईं, तो उन्हें अपने विदेशी सोने तक पहुंच से वंचित कर दिया गया।

इसने बाकी देशों को सोचने पर मजबूर किया — क्या अब वक़्त नहीं आ गया कि सोना घर लाया जाए? इसलिए, कई देशों ने अब अपने भंडार घरेलू तिजोरियों में स्थानांतरित कर दिए।


भारत का मामला

भारत के पास लगभग 827 टन सोना है, जो हमारे विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 8% हिस्सा है।

रिज़र्व बैंक इस सोने को आर्थिक स्थिरता के प्रतीक के रूप में रखता है, लेकिन धीरे-धीरे इसका उपयोग बढ़ाने के तरीकों पर विचार कर रहा है।

भारत पहले से ही “सोने के बॉन्ड” और “मॉनिटाइजेशन स्कीम” चला चुका है, जिससे लोगों के पास जमा सोने को आर्थिक प्रवाह में लाने की कोशिश की गई थी।


संभावित खतरा

सोने को एक ‘कर्ज़ छिपाने’ के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने के खतरे भी हैं।

  • अगर सोने की कीमत अचानक गिरती है, तो कई देशों की बैलेंस शीट ध्वस्त हो सकती है।
  • यह नकली स्थिरता निवेशकों को झूठा भरोसा देती है।
  • लंबी अवधि में यह मुद्रास्फीति (inflation) को और तेज़ कर सकता है।

नई भू-राजनीति और सोने की भूमिका

सोना अब सिर्फ आभूषण या निवेश नहीं रहा। यह अब “राजनीतिक हथियार” भी बनता जा रहा है। चीन और रूस डॉलर से दूर जाने के लिए सोने पर टिके हैं।

वे चाहते हैं कि भविष्य का लेनदेन “सोने-समर्थित डिजिटल मुद्रा” के रूप में हो — ऐसा सिस्टम जो अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को तोड़ सके।


क्या सोना सब समस्याएँ हल कर सकता है?

नहीं। सोना आत्मविश्वास बढ़ा सकता है, लेकिन उत्पादन नहीं। यह सरकारी कर्ज़ कम नहीं करता—बस कुछ समय के लिए उसे “कम दिखाई देने” में मदद करता है।

वास्तविक समाधान अब भी वही हैं: उत्पादकता, तकनीकी निवेश, और राजकोषीय अनुशासन।


निष्कर्ष

केंद्रीय बैंकों का सोने की ओर रुख बताता है कि आर्थिक दुनिया डर से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। लेकिन यह रास्ता दीर्घकालिक समाधान नहीं है।

सोना आर्थिक ताकत का प्रतीक जरूर है, पर अगर उसे ढाल बनाकर “सच्चाई छिपाने” की कोशिश की गई, तो वह चकमक पत्थर की तरह सिर्फ चमकेगा—जलाएगा नहीं।


यह हिंदी रूपांतर लेख के असली संदेश को सरल भाषा में समझाता है—कि “उच्च सोने की कीमतें सरकारों के लिए आर्थिक जादू नहीं, बल्कि एक अस्थायी भ्रम” हैं।​

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