मकान नया हो या पुराना, खरीदने से पहले ये बातें ज़रूर जान लें वरना पैसा फँस सकता है

यह रिपोर्ट आपको एक आइडिया देती है. इसके आधार पर आँख मूंदकर अपना फैसला नहीं ले. रजिस्टर्ड वित्तीय, प्रॉपर्टी सलाहकार से राय लेकर फैसला ले. हम म्यूच्यूअल फण्ड, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फण्ड, नॉन कनवर्टिबल डिबेंचर ( फिक्स्ड रिटर्न), इन्सुरेंस में निवेश करवाते हैं. हमसे संपर्क करे 9953367068


1. मकान खरीदना बड़ा फैसला क्यों है?

  • अपना घर लेने में ज़्यादातर लोगों की जिंदगी भर की बचत, PF, गोल्ड बेचकर पैसा, होम लोन सब लग जाता है।
  • अगर बाद में पता चला कि कागज़ात गड़बड़ हैं, बिल्डर ने ज्यादा फ्लोर बना रखे हैं या केस चल रहा है, तो घर फँस सकता है, बेच भी नहीं पाएंगे।
  • इसलिए “सस्ता मिल रहा है” या “जल्दी लो वरना मौका निकल जाएगा” जैसी बातों में आकर बिना जाँचे कभी बुकिंग न करें।

एक सिंपल सोच रखें: जिस दिन आप रजिस्ट्रेशन करवाएं, उस दिन रात को आराम से सो सकें, यह तभी होगा जब कानूनी, लोकेशन और क्वालिटी तीनों क्लियर हों।homeloans.hdfc+1


2. सबसे पहले क्या सोचें – जरूरत, बजट और उद्देश्य

2.1 मकान किसलिए ले रहे हैं?

  • खुद रहने के लिए – यहाँ लोकेशन, पड़ोस, सुविधा, स्कूल, ऑफिस की दूरी ज्यादा मायने रखती है।
  • निवेश के लिए – यहाँ किराया कितना मिलेगा, रिसेल वैल्यू, एरिया का डेवलपमेंट, आने वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर (मेट्रो, हाईवे) ज़्यादा ज़रूरी है।

बहुत लोग गलती करते हैं – सिर्फ सस्ता देखकर दूर किसी सुनसान इलाके में घर ले लेते हैं, बाद में रोज़ का आना-जाना, सुरक्षा, स्कूल सब झंझट बन जाता है।

2.2 बजट साफ रखें

  • कितना डाउन पेमेंट दे सकते हैं
  • EMI कितनी आराम से दे पाएँगे (कुल नेट इनकम का 35–40% से ज्यादा EMI रखना रिस्की हो सकता है)।
  • रजिस्ट्रेशन, स्टाम्प ड्यूटी, ब्रोकरेज, इंटरियर, शिफ्टिंग – इन सबके लिए भी पैसा अलग से लगेगा।

होम लोन प्री–अप्रूवल लेकर चलें तो आपको पता रहेगा कि बैंक आपको कितनी लिमिट तक लोन देगा, और उसी के हिसाब से प्रॉपर्टी देखें।


3. नया मकान बनाम पुराना मकान – कौन सा सही?

बहुत लोग कन्फ्यूज रहते हैं कि नया फ्लैट लें या पुराना (रीसेल) घर/फ्लैट। दोनों के अपने फायदे–नुकसान हैं।

3.1 नया मकान (नई सोसाइटी / नया फ्लैट)

फायदे

  • नई कंस्ट्रक्शन, मॉडर्न डिजाइन, लिफ्ट, पार्किंग, क्लब, जिम जैसी सुविधाएँ।
  • शुरुआती सालों में रिपेयर–मेंटेनेंस कम रहता है।
  • ज्यादातर बड़े बिल्डर से लेने पर बैंक से लोन मिलना आसान रहता है।

नुकसान

  • कीमत ज़्यादा होती है, क्योंकि बिल्डर पहले से ही भविष्य की लागत और प्रॉफिट जोड़कर बेचता है।
  • कई जगह ब्रॉशर में एक दिखाते हैं, असल में कुछ और हैं – एरिया, टावर, खुली जगह, पार्क सब कम निकलता है।
  • कभी–कभी बिल्डर समय पर पज़ेशन नहीं देता, या अतिरिक्त फ्लोर/फ्लैट बनाकर कानूनी दिक्कत पैदा कर देता है।

3.2 पुराना मकान / रीसेल फ्लैट

फायदे

  • आमतौर पर उसी एरिया में नया फ्लैट से सस्ता मिल जाता है।
  • जो आप देख रहे हैं, वही मिलेगा – सोसाइटी बनी हुई है, लोग रह रहे हैं, रोड, मार्केट, स्कूल सब का अंदाज़ा लग जाता है।
  • तुरंत पज़ेशन मिल जाता है, किराया बचता है या तुरंत रेंट पर दे सकते हैं।

नुकसान

  • पुरानी बिल्डिंग में स्ट्रक्चर, पाइपलाइन, वायरिंग, सीपेज, लिफ्ट आदि की कंडीशन अच्छे से चेक करनी पड़ती है।
  • बहुत पुराना (20–25 साल या उससे ज्यादा) फ्लैट हो तो आगे मेजर रिपेयर/रिनोवेशन का खर्च भी सोचना होगा।
  • पुरानी सोसाइटी में पार्किंग, मॉडर्न सुविधाएँ, सिक्योरिटी कम हो सकती हैं।

3.3 किसे क्या चुनना चाहिए?

  • अगर आप फैमिली के साथ खुद रहने के लिए घर ले रहे हैं और तुरंत शिफ्ट होना है, तो अच्छा रीसेल फ्लैट/घर प्रैक्टिकल ऑप्शन हो सकता है।
  • अगर आप लंबी अवधि के लिए रहना चाहते हैं, मॉडर्न सुविधाएँ चाहिए, बजट ठीक–ठाक है और लोकेशन सही मिल जाए तो नया फ्लैट भी ठीक है – बस बिल्डर और कागज़ात अच्छी तरह चेक करें।

तुलना सारणी: नया vs पुराना मकान

पहलूनया मकान / फ्लैटपुराना मकान / फ्लैट
कीमतज़्यादातर महँगा, प्रीमियम चार्जअक्सर सस्ता, नेगोशिएशन का स्कोप ज़्यादा
पज़ेशनकभी–कभी देरी, कंस्ट्रक्शन पर निर्भरतुरंत, डॉक्यूमेंट क्लियर हों तो जल्दी रजिस्ट्रेशन
सुविधाएँमॉडर्न, क्लब, जिम, पार्क, सिक्योर सोसाइटीबेसिक सुविधाएँ, कुछ जगह पुरानी इन्फ्रा
रिस्कबिल्डर, अप्रूव्ड मैप, पज़ेशन रिस्कस्ट्रक्चर, पुरानी लोन/कानूनी केस का रिस्क
लोन प्रोसेसब्रांडेड प्रोजेक्ट में आसानपुराने केस, NOC आदि देखकर बैंक फैसला करता है

4. लोकेशन और आस–पास की सुविधाएँ

किसी भी प्रॉपर्टी की असली कीमत उसके लोकेशन से तय होती है।

  • रोड कनेक्टिविटी: एरिया से मेन रोड, हाईवे, मेट्रो स्टेशन तक पहुंच कैसी है, ट्रैफिक कितना रहता है।
  • मार्केट और रोज़मर्रा की ज़रूरतें: किराना, सब्जी, मेडिकल स्टोर, बैंक, ATM, हॉस्पिटल कितनी दूरी पर हैं।
  • स्कूल और कॉलेज: बच्चों की पढ़ाई के हिसाब से नजदीक ठीक–ठाक स्कूल हों, रोज़ लंबा ट्रैवल बच्चों के लिए मुश्किल हो जाता है।
  • सेफ्टी: इलाका सुरक्षित है या नहीं, रात में सुनसान तो नहीं, आसपास का क्राइम रिकॉर्ड कैसा है (स्थानीय लोगों से पूछकर अंदाज़ा लगा सकते हैं)।
  • मकान की एंट्रेंस की दिशा कौन सी है, भले आप इन सब चीजो पर विश्वास ना करते हो लेकिन बहुत लोग विश्वास करते हैं ,खासकर साउथ फेसिंग को ठीक नहीं मानते, रीसेल में दिक्कत आती है.

बहुत से लोग सस्ते में शहर से बहुत दूर का घर ले लेते हैं, बाद में पेट्रोल/डीजल, टाइम और मानसिक तनाव में बहुत ज्यादा खर्च हो जाता है।


5. सबसे महत्वपूर्ण – कागज़ात और कानूनी जांच

यहीं पर सबसे ज्यादा लोग गलती कर देते हैं – पेंट, टाइल्स, फॉल्स सीलिंग देखकर खुश हो जाते हैं, पर असली गेम कागज़ों का है।

5.1 ओनरशिप और टाइटल जाँचें

  • जो व्यक्ति या बिल्डर आपको प्रॉपर्टी बेच रहा है, क्या वह असली मालिक है?
  • टाइटल डीड, पिछली सेल डीड, म्यूटेशन, जमीन का रिकार्ड (खसरा–खतौनी/जैमाबंदी) से पता करें कि जमीन/मकान सही नाम पर है या नहीं।
  • यदि प्रॉपर्टी किसी ट्रस्ट, सोसाइटी या कंपनी के नाम पर है, तो उनके आंतरिक रेज़ोल्यूशन, ऑथराइज्ड साइनटरी की भी जांच ज़रूरी है।homeloans.hdfc+1

5.2 नक्शा पास है या नहीं?

  • बिल्डर या मकान मालिक से अप्रूव्ड लेआउट मैप दिखाने को कहें, सिर्फ ब्रॉशर पर भरोसा न करें।
  • कितने मंजिल, कितने फ्लैट की परमिशन मिली है, और असल में क्या बना है – ये ज़रूर मैच कराएँ।
  • कहीं ऐसा तो नहीं कि 4 मंजिल की परमिशन है और 5–6 मंजिल बना दी हैं – बाद में सीलिंग, डिमोलिशन, या लीगल झंझट हो सकता है।jagran+1

5.3 ऑक्यूपेंसी/कम्प्लीशन सर्टिफिकेट

  • रेडी टू मूव फ्लैट/मकान में कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) देखना बहुत ज़रूरी है।
  • इससे पता चलता है कि निर्माण पूरा हो चुका है और लोकल अथॉरिटी ने इसे रहने लायक मानकर सर्टिफिकेट दे दिया है।

5.4 लोन या बंधक तो नहीं?

  • प्रॉपर्टी पर पहले से कोई होम लोन या दूसरे बैंक का मॉर्गेज तो नहीं है, इसका NOC देख लें।
  • बैंक के द्वारा पहले से लोन दिया गया हो तो अच्छा संकेत भी है, क्योंकि बैंक कुछ बेसिक जांच करके ही लोन पास करते हैं; लेकिन फिर भी अपने स्तर पर वेरिफिकेशन ज़रूरी है।

कानूनी पेपर अच्छे से समझ में न आएँ तो लोकल अच्छे रियल एस्टेट वकील से एक बार डॉक्यूमेंट चेक जरूर करवाएँ, फीस थोड़ी लगेगी पर बहुत बड़ी मुसीबत से बच सकते हैं।


6. बिल्डर या विक्रेता की जांच

6.1 बिल्डर की विश्वसनीयता

  • बिल्डर कितने साल से काम कर रहा है, कितने प्रोजेक्ट पूरे कर चुका है – यह देखिए।
  • पिछले प्रोजेक्ट में समय पर पज़ेशन दिया या नहीं, मेंटेनेंस कैसा है, कस्टमर रिव्यू क्या बोलते हैं।
  • RERA में प्रोजेक्ट रजिस्टर्ड है या नहीं (जहाँ लागू हो), RERA वेबसाइट से भी बहुत जानकारी मिल जाती है – टाइमलाइन, शिकायतें, आदि।

6.2 अगर किसी से पुराना मकान खरीद रहे हों

  • जिस घर/फ्लैट में अभी वे खुद रह रहे हैं या किराए पर दिया है, वहां के पड़ोसियों से बात करके पता करें – कोई सोसाइटी विवाद, लीगल केस, झगड़ा, पानी–बिजली की समस्या तो नहीं।
  • बहुत ज्यादा जल्दी कराने वाला, बहुत कम दाम में बेचने वाला व्यक्ति हो तो डबल सावधानी बरतें – हो सकता है कोई छुपी हुई समस्या हो।

7. मकान की क्वालिटी और तकनीकी जांच

प्लास्टर चमक रहा हो, इसका मतलब ये नहीं कि घर मजबूत भी है।

7.1 स्ट्रक्चर और निर्माण

  • दीवारों में दरार, सीलन (नमी), पेंट उखड़ना, पानी की लकीरें – ये सब seepage और खराब वाटरप्रूफिंग के संकेत हो सकते हैं।
  • पुराना मकान हो तो बीम–कॉलम पर ज्यादा ध्यान दें, उनमें क्रैक या जंग लगे आयरन के निशान तो नहीं।youtube+1
  • छत पर जाकर देखें, टंकी के आसपास, बाथरूम के ऊपर सीपेज है या नहीं।

7.2 प्लंबिंग और इलेक्ट्रिक काम

  • बाथरूम, किचन के नल खोलकर पानी का प्रेशर चेक करें, लीकेज तो नहीं।
  • मेन इलेक्ट्रिक बोर्ड, वायरिंग, MCB, मीटर आदि की कंडीशन देखें – बार–बार ट्रिप होने वाले सिस्टम बाद में बहुत परेशान करते हैं।

7.3 वेंटिलेशन और लेआउट

  • घर में धूप और हवा आती है या नहीं, सिर्फ ट्यूब लाइट से चलने वाला घर स्वास्थ्य और बिजली दोनों के लिए सही नहीं।
  • कमरों का साइज, हॉल, किचन, बालकनी – सब आपकी फैमिली के हिसाब से ठीक है या नहीं, ये प्रैक्टिकली सोचिए।

संभव हो तो किसी सिविल इंजीनियर या अनुभवी ठेकेदार से एक बार साइट विजिट करवा लें, पुराने घर के लिए खास तौर पर ये बहुत काम आता है।


8. सोसाइटी, मेंटेनेंस और छुपे हुए खर्च

बहुत बार EMI तो मैनेज हो जाती है, पर हर महीने के मेंटेनेंस, पार्किंग, फंड आदि में अच्छा खासा पैसा चला जाता है।

  • मेंटेनेंस चार्ज: कितना है, क्या–क्या चीजें उसमें शामिल हैं (लिफ्ट, सिक्योरिटी, क्लीनिंग, जेनरेटर आदि)।
  • फंड और एक्सट्रा चार्ज: रिपेयर फंड, सिंकिंग फंड, पार्किंग चार्ज, क्लब/जिम मेम्बरशिप – ये सब पूछकर लिखित में लें।housegyan+1
  • सोसाइटी रूल्स: किराए पर देने पर कोई रोक–टोक, पालतू जानवर, गेस्ट पार्किंग, टाइमिंग आदि भी जान लें, नहीं तो बाद में झंझट हो सकता है।

पुरानी सोसाइटी में अगर फंड ठीक से जमा नहीं किया गया हो तो आगे चलकर भारी रिपेयर के लिए एक बार में बड़ा पैसा मांग सकते हैं, इसे भी ध्यान में रखें।


9. होम लोन, EMI और फाइनेंस की समझ

9.1 लोन लेने से पहले

  • अलग–अलग बैंकों/NBFC से रेट ऑफ इंटरेस्ट, प्रोसेसिंग फीस, प्री–पेमेंट चार्ज, अन्य शर्तें कंपेयर करें।
  • जितना हो सके उतना क्लियर और डॉक्युमेंटेड इनकम दिखाएँ, इससे लोन लिमिट और रेट दोनों बेहतर हो सकते हैं।

9.2 EMI सुख से दे पाएंगे या नहीं?

  • कुल EMI और आपकी मंथली इनकम में सही बैलेंस होना ज़रूरी है, नहीं तो छोटी–सी इमरजेंसी में पूरा बजट गड़बड़ा सकता है।
  • कोशिश करें कि इमरजेंसी फंड (6–12 महीने के खर्च) EMI से अलग हमेशा रखा रहे।

9.3 जॉइंट लोन और टैक्स बेनिफिट

  • पति–पत्नी मिलकर जॉइंट लोन लेते हैं तो ज्यादा लोन लिमिट और कुछ मामलों में ज्यादा टैक्स बेनिफिट मिल सकता है (कानून के अनुसार)।

10. रजिस्ट्रेशन, स्टाम्प ड्यूटी और पजेशन

  • एग्रीमेंट टू सेल, सेल डीड, पेमेंट रिसीट सब लिखित और ठीक तारीख के साथ रखें।
  • स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज अपने शहर/राज्य के हिसाब से पहले से पता कर लें – कुल कॉस्ट में इसे जोड़कर ही निर्णय लें।jagran+1
  • पजेशन लेते समय एक चेकलिस्ट बना लें – घर में जो–जो वादा किया गया था (फैन, लाईट, गीजर, वॉडरोब, मॉड्यूलर किचन आदि), सब ठीक से लगा है या नहीं, पानी–बिजली कनेक्शन चालू हैं या नहीं।

11. आम गलतियाँ जो लोगों को नहीं करनी चाहिए

  • सिर्फ दाम देखकर फैसला करना, लोकेशन, डॉक्यूमेंट और क्वालिटी को नजरअंदाज करना।jagran+1
  • बिल्डर या ब्रोकर की मीठी बातों में आकर तुरंत टोकन मनी दे देना, बिना डॉक्युमेंट देखे।facebook+1
  • फैमिली की जरूरत (बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की सुविधा, ऑफिस की दूरी) सोचे बिना सिर्फ “आजकल सब यहीं ले रहे हैं” सोचकर खरीद लेना।
  • वकील या प्रोफेशनल से डॉक्यूमेंट वेरिफाई न करवाना – बाद में केस–केस खेलना पड़ता है।

12. निष्कर्ष – मकान खरीदते समय आपकी चेकलिस्ट

घर खरीदने को एक प्रोजेक्ट की तरह लें – हर स्टेप की टिक–मार्क चेकलिस्ट बना लें।

  • अपनी जरूरत और बजट साफ करें – खुद रहने या निवेश के हिसाब से।
  • नया या पुराना – दोनों के फायदे–नुकसान समझकर फैसला लें।
  • लोकेशन, कनेक्टिविटी, मार्केट, स्कूल, हॉस्पिटल, सेफ्टी देखें।jagran+1
  • टाइटल, ओनरशिप, नक्शा पास, OC/CC, लोन–NOC, RERA – सब डॉक्यूमेंट वेरिफाई करें।
  • मकान की क्वालिटी – स्ट्रक्चर, सीपेज, वायरिंग, प्लंबिंग, वेंटिलेशन जाँचें।
  • सोसाइटी चार्ज, पार्किंग, नियम और छुपे खर्च पहले से जान लें।
  • होम लोन की EMI अपने कैश–फ्लो के हिसाब से आरामदायक रखें, सिर्फ बैंक लिमिट के भरोसे न रहें।

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