पिछले 3 साल में किसने ज़्यादा कमाया – डायरेक्ट शेयर निवेशक या म्यूचुअल फंड करने वाले?


1. एक आम कहानी, लेकिन गहरा सबक

राजेश (बदला हुआ नाम) दिल्ली–एनसीआर का 35 वर्ष का नौकरीपेशा युवक है।
कोरोना के बाद जब शेयर बाज़ार में तेज़ी आई, तो उसने भी एक लोकप्रिय ट्रेडिंग ऐप डाउनलोड किया और सीधे शेयरों में निवेश शुरू कर दिया।

शुरुआत में किस्मत उसके साथ थी।
कुछ स्मॉल–कैप और मिड–कैप शेयर 40–60% तक ऊपर चले गए।
दो–तीन अच्छे ट्रेड़ के बाद उसे लगा कि अब उसे मार्केट की “समझ” आ गई है।

धीरे–धीरे उसने:

  • टीवी चैनलों की टिप्स पर शेयर लेना शुरू किया,
  • यूट्यूब और टेलीग्राम चैनलों से “मल्टीबैगर” लिस्ट कॉपी करनी शुरू की,
  • इंट्रा–डे, फ़्यूचर और ऑप्शन में भी हाथ आज़माना शुरू कर दिया।

2022–23 में जब बाज़ार में करेक्शन आया, तो हकीकत सामने आने लगी।

  • कुछ शेयर 40–70% तक गिर गए,
  • जिनमें अच्छा मुनाफ़ा था, वे भी आधे से ज़्यादा नीचे आ गए,
  • घबराहट में कई जगह गलत समय पर बिकवाली भी हो गई।

तीन साल बाद जब राजेश ने पूरे पोर्टफोलियो का हिसाब लगाया, तो पाया कि:

  • कुछ शेयरों में अच्छा मुनाफ़ा था,
  • कई में भारी घाटा,
  • लेकिन पूरे मिलाकर उसका कुल रिटर्न बहुत साधारण, कभी–कभी बैंक की एफ.डी. से भी कम था।

इसी ऑफिस में काम करने वाली नेहा की कहानी अलग थी।

  • नेहा ने 2021 में बस इतना किया कि हर महीने 10,000 रुपये दो–तीन अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में एसआईपी से लगाने शुरू किए – एक निफ्टी 50 इंडेक्स फ़ंड, एक फ़्लेक्सी–कैप फ़ंड और एक टैक्स–सेविंग (ELSS) फ़ंड।
  • उसने न इंट्रा–डे किया, न ही फ़्यूचर–ऑप्शन में ट्रेडिंग की।
  • बाज़ार ऊपर–नीचे होता रहा, लेकिन एसआईपी चालू रही।

तीन साल बाद उसका पोर्टफोलियो आराम से डबल–डिजिट, लगभग 12–18% सालाना के आसपास रिटर्न दिखा रहा था (फ़ंड के चुनाव के हिसाब से यह रेंज बदल सकती है)।

बाज़ार दोनों के लिए एक ही था, समय लगभग एक जैसा, लेकिन:

  • डायरेक्ट शेयर और ट्रेडिंग करने वाले राजेश का नतीजा कमजोर रहा,
  • म्यूचुअल फ़ंड में अनुशासन से निवेश करने वाली नेहा ने बेहतर और स्थिर रिटर्न पाया।

यही फर्क इस पूरे लेख का विषय है।


2. पहले समझें: पिछले 3 साल में बाज़ार ने क्या दिया?

किसी भी तुलना से पहले यह समझना ज़रूरी है कि बाज़ार ने स्वयं क्या रिटर्न दिया।

साधारण भाषा में:

  • बड़े इंडेक्स (जैसे निफ़्टी 50, सेंसेक्स) ने पिछले कुछ सालों में कुल मिलाकर अच्छा डबल–डिजिट सालाना रिटर्न दिया है।
  • अगर किसी निवेशक ने सिर्फ़ निफ़्टी 50 इंडेक्स फ़ंड में 3 साल तक अनुशासन से निवेश किया हो, तो लगभग 12–13% सालाना के आसपास रिटर्न मिलना संभव था (सटीक आंकड़ा फ़ंड और अवधि पर निर्भर करेगा)।
  • कई अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड – जैसे फ़्लेक्सी–कैप, लार्ज & मिड–कैप, टैक्स–सेविंग (ELSS) – ने इसी अवधि में लगभग 15–20% या उससे अधिक सालाना रिटर्न दिखाया है (कुछ विशिष्ट मामलों में इससे भी ज़्यादा)।

इसका मतलब:

यदि आप केवल “बाज़ार के साथ–साथ” चलते, यानी इंडेक्स या अच्छे फ़ंड के ज़रिए निवेश करते, तो आपका अनुभव सामान्यतः सकारात्मक रहता।

फिर भी बहुत से लोगों ने या तो बहुत कम कमाया या घाटा किया।
क्यों?
क्योंकि बाज़ार का रिटर्न और निवेशक का वास्तविक रिटर्न, दोनों अलग–अलग चीज़ें हैं।


3. 10 प्रकार के म्यूचुअल फ़ंड – रिटर्न का एक अंदाज़

यहाँ हम किसी विशेष स्कीम का प्रचार नहीं कर रहे, सिर्फ़ यह दिखा रहे हैं कि अलग–अलग प्रकार के इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स ने औसतन किस तरह के रिटर्न दिये हो सकते हैं। आप चाहें तो अपने रिसर्च टूल से वास्तविक स्कीम–वाइज़ डेटा लेकर एक टेबल बना सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, पिछले 3 साल की अवधि में कई फ़ंड कैटेगरी का रेंज कुछ इस प्रकार रहा है (अनुमानित रेंज):

  1. फ़्लेक्सी–कैप फ़ंड – लगभग 15–22% सालाना।
  2. दूसरा फ़्लेक्सी–कैप फ़ंड – 14–20% सालाना के बीच।
  3. लार्ज & मिड–कैप फ़ंड – लगभग 15–20% सालाना।
  4. दूसरा लार्ज & मिड–कैप फ़ंड – 14–18% के आसपास।
  5. ELSS (टैक्स–सेविंग) फ़ंड – लगभग 16–24% सालाना रेंज।
  6. मल्टी–कैप या मिड/स्मॉल–ओरिएंटेड फ़ंड – बाज़ार के मूड पर निर्भर, कुछ स्कीमें 20%+ सालाना तक भी पहुँच सकती हैं।
  7. अंतरराष्ट्रीय इक्विटी फ़ंड (जैसे US मार्केट पर आधारित) – रेंज अधिक बदलती है, लेकिन रिकवरी वाले फ़ेज़ में 15–25% तक भी जा सकती है।
  8. निफ़्टी 50 इंडेक्स फ़ंड – लगभग 12–13% सालाना के आसपास।
  9. निफ़्टी नेक्स्ट 50 या मिड–कैप इंडेक्स फ़ंड – कुछ अवधियों में 15–20% तक भी।
  10. किसी अच्छे लार्ज & मिड–कैप फ़ंड की SIP रिटर्न (XIRR) – सही समय पर शुरू होने पर 20–25% या उससे अधिक भी हो सकती है।

सटीक प्रतिशत हर फ़ंड, तिथि और स्रोत के अनुसार बदलेंगे, पर मोटा–मोटी तस्वीर साफ़ है:

  • अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स ने पिछले 3 साल में सामान्यतः मजबूत डबल–डिजिट रिटर्न दिखाया है।
  • साधारण इंडेक्स फ़ंड ने भी बैंक एफ.डी. से काफी बेहतर रिटर्न दिया है।

4. डायरेक्ट शेयर (इक्विटी कैश) में आम निवेशक का अनुभव

अधिकांश रिटेल (छोटे) निवेशक:

  • जल्दी–जल्दी शेयर बदलते हैं,
  • टिप्स पर ज़्यादा भरोसा करते हैं,
  • गिरावट में घबराकर बेच देते हैं,
  • एक–दो तेज़ मुनाफ़े से ओवर–कॉन्फिडेंट हो जाते हैं,
  • और कई बार “लॉटरी” टाइप स्मॉल–कैप में भारी पैसा लगा देते हैं।

इसका नतीजा यह होता है कि:

  • बाज़ार ऊपर होता है, इंडेक्स अच्छा रिटर्न देता है,
  • लेकिन उनका व्यक्तिगत पोर्टफोलियो उतना नहीं बढ़ पाता।

कई अध्ययनों और सर्वे में यह सामने आया है कि:

  • जो लोग शेयरों में बहुत ज़्यादा ट्रेडिंग करते हैं (बार–बार खरीद–फरोख़्त, इंट्रा–डे आदि), उनमें बड़े हिस्से तक लोगों को नुकसान होता है या वे इंडेक्स से कम कमाते हैं।
  • जो निवेशक शांति से लंबे समय तक अच्छी कंपनियों में टिके रहते हैं, उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।

बहुत से लोग इसे “सट्टा” की तरह चला देते हैं, जिस कारण उनका असली रिटर्न गिर जाता है।


5. फ़्यूचर–ऑप्शन (F&O): जहाँ 90% से ज़्यादा लोग हारते हैं

फ्यूचर ऑप्शन में तो लोगों ने पैसा गँवाया ही है।
इसे सिर्फ़ महसूस नहीं, बल्कि विभिन्न अध्ययनों ने भी दिखाया है।

सार यह है कि पिछले कुछ वर्षों के डेटा से पता चला है:

  • फ़्यूचर और ऑप्शन में ट्रेड करने वाले छोटे–मोटे निवेशकों/ट्रेडर्स में भारी बहुमत को नुकसान हुआ है।
  • कुछ रिपोर्टों में यह प्रतिशत 90% से भी ज़्यादा पाया गया है।
  • कुल मिलाकर, हज़ारों–लाखों लोगों ने यहाँ अपनी जमा–पूँजी का बड़ा हिस्सा गँवा दिया – कई अध्ययनों में कुल घाटा लाखों करोड़ रुपये की श्रेणी तक बताया गया है।

यह पूरी स्थिति कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर इशारा करती है:

  1. F&O निवेश नहीं, सट्टा/ट्रेडिंग का साधन है।
  2. लीवरेज (उधार की ताकत) के कारण छोटे–से गलत निर्णय में भी बड़ा नुकसान हो सकता है।
  3. नियमित आय वाले सामान्य व्यक्ति के लिए यह क्षेत्र बहुत जोखिम भरा है, खासकर जब उचित ज्ञान और सिस्टम न हो।

जब एक तरफ़ म्यूचुअल फ़ंड में बैठा आम निवेशक 12–18% सालाना के आसपास रिटर्न कमा रहा हो, और दूसरी तरफ़ F&O में लगे बहुसंख्यक लोग अपनी पूँजी ही गँवा रहे हों, तो तुलना अपने–आप बहुत साफ़ हो जाती है।


6. म्यूचुअल फ़ंड बनाम डायरेक्ट शेयर – संरचना का अंतर

अब हम मूल संरचनात्मक अन्तर को समझें।

(क) विविधता (डायवर्सिफ़िकेशन)

  • म्यूचुअल फ़ंड:
    • आम तौर पर 30–80 शेयरों में पैसा फैलाकर निवेश किया जाता है।
    • एक–दो शेयर खराब हो जाएँ, तो भी पूरे पोर्टफोलियो पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ता।
  • डायरेक्ट शेयर:
    • आम निवेशक अक्सर 5–10 “पसंदीदा” शेयरों में पैसा लगाते हैं।
    • अगर इनमें से 2–3 शेयर बहुत गिर जाते हैं, तो पूरे पोर्टफोलियो की सेहत बिगड़ जाती है।

(ख) रिसर्च और समय

  • म्यूचुअल फ़ंड:
    • शोध–टीम, विश्लेषक, कंपनियों से मीटिंग, सेक्टर एनालिसिस, रिस्क मैनेजमेंट – एक पूरा ढाँचा होता है।
  • आम निवेशक:
    • नौकरी या बिज़नेस के साथ–साथ थोड़ा समय निकालकर यूट्यूब, टीवी, सोशल मीडिया देखकर निर्णय लेता है।
    • गहराई से बैलेंस शीट, कैश–फ़्लो, प्रबंधन, वैल्यूएशन आदि पढ़ने का समय/इच्छा कम होती है।

(ग) व्यवहार (Behaviour)

  • म्यूचुअल फ़ंड में एसआईपी:
    • बाज़ार ऊपर हो या नीचे, हर महीने तय राशि लगती रहती है।
    • इससे “मार्केट टाइमिंग” की गलती काफी हद तक कम हो जाती है।
  • डायरेक्ट शेयर निवेशक:
    • तेज़ी में “FOMO” से ऊँचे दाम पर खरीद लेते हैं,
    • गिरावट में डरकर या मजबूरी में घाटे में बेच देते हैं।

(घ) ख़र्च (Cost)

  • म्यूचुअल फ़ंड
    • एएमसी फण्ड मैनेजर और म्यूच्यूअल फण्ड डिस्ट्रीब्यूटर की बहुत कम निश्चित एक्सपेंस रेशियो, कोई रोज़–रोज़ की ब्रोकरेज या भारी टर्नओवर नहीं।
  • डायरेक्ट ट्रेडिंग/F&O:
    • बार–बार ख़रीद–फरोख़्त से ब्रोकरेज, टैक्स, स्लिपेज, स्प्रेड – सब मिलकर वास्तविक रिटर्न को कम कर देते हैं।

यही वजह है कि व्यवहारिक स्तर पर म्यूचुअल फ़ंड छोटे निवेशक के लिए अधिक व्यावहारिक और सुरक्षित माध्यम बन जाता है।


7. तो क्या सच में म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों ने ज़्यादा कमाया?

अब मूल प्रश्न पर साफ़–साफ़ बात करते हैं।

सवाल:
पिछले 3 सालों में क्या डायरेक्ट शेयर (इक्विटी कैश) में पैसा लगाने वालों ने कम कमाया है और म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए निवेश करने वालों ने ज़्यादा?

व्यावहारिक उत्तर (औसत व्यवहार के आधार पर):

  1. बाज़ार (इंडेक्स) ने अच्छी डबल–डिजिट रिटर्न दी।
  2. अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स ने सामान्यतः 12–20% या उससे अधिक सालाना रिटर्न दिखाया।
  3. F&O और बहुत एक्टिव ट्रेडिंग करने वाले रिटेल निवेशकों का बड़ा हिस्सा नुकसान में रहा।
  4. डायरेक्ट शेयर लेकर बैठने वालों में से:
    • जिनके पास ज्ञान, धैर्य और अनुशासन था, उन्होंने अच्छा कमाया,
    • लेकिन बहुसंख्यक लोगों ने गलत समय पर खरीद–फरोख़्त, टिप्स पर भरोसा और ओवर–ट्रेडिंग के कारण या तो कम कमाया या घाटा किया।

इसलिए, समग्र तस्वीर यह कहती है कि:

हाँ, औसतन देखा जाए तो पिछले 3 सालों में म्यूचुअल फ़ंड में व्यवस्थित निवेश करने वाले आम निवेशकों ने, डायरेक्ट शेयर और खासकर F&O में भाग लेने वाले आम निवेशकों की तुलना में अधिक और स्थिर रिटर्न कमाया है।

यह बात हर व्यक्ति पर नहीं, बल्कि “औसत” निवेशक पर लागू होती है।
कुछ डायरेक्ट शेयर इन्वेस्टर बहुत शानदार रिटर्न भी बना पाए होंगे, लेकिन उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।


8. आगे के लिए व्यावहारिक सलाह – आम निवेशक क्या करे?

1. F&O को निवेश नहीं, सट्टा मानें

  • यदि आप फुल–टाइम, प्रोफ़ेशनल, रिस्क–मैनेज्ड ट्रेडर नहीं हैं, तो F&O से दूर रहना ही बेहतर है।
  • जीवन के महत्वपूर्ण लक्ष्यों (रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई, घर आदि) के पैसे को कभी भी F&O में दाँव पर न लगाएँ।

2. पोर्टफोलियो का “कोर” म्यूचुअल फ़ंड से बनाएं

  • कुल निवेश का 60–80% हिस्सा अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड और इंडेक्स फ़ंड में रखें (आपके जोखिम–प्रोफ़ाइल के अनुसार)।
  • लार्ज–कैप/इंडेक्स + फ़्लेक्सी–कैप + थोड़े मिड/स्मॉल–कैप + यदि ज़रूरत हो तो थोड़ा अंतरराष्ट्रीय फ़ंड – ऐसा संयोजन काफ़ी मज़बूत हो सकता है।

3. डायरेक्ट शेयर को “सैटेलाइट” हिस्सा मानें

  • यदि आपको सच में शेयर चुनने का शौक है, तो कुल पोर्टफोलियो का 10–20% हिस्सा ही डायरेक्ट शेयरों में लगाएँ।
  • यहाँ भी फोकस गुणात्मक कंपनियों पर हो – मजबूत बिज़नेस, अच्छा प्रबंधन, स्पष्ट कमाई का रिकॉर्ड – न कि केवल “गर्लफ़्रेंड टिप्स” या “मल्टीबैगर की अफ़वाहें” पर।

4. एसआईपी + एसेट एलोकेशन + रीबैलेंसिंग

  • नियमित एसआईपी,
  • पहले से तय इक्विटी–डेब्ट अनुपात (जैसे 60:40, 70:30),
  • और 1–2 साल में पोर्टफोलियो की समीक्षा व संतुलन (रीबैलेंसिंग) –
    ये तीन चीजें मिलकर लंबे समय में बहुत मजबूत परिणाम दे सकती हैं।

5. “ज्यादा बुद्धिमान” बनने से बेहतर है “ज़्यादा अनुशासित” होना

  • शेयर बाज़ार में कई बार साधारण, अनुशासित निवेशक, अत्यधिक “स्मार्ट” और ओवर–कॉन्फिडेंट ट्रेडर से ज़्यादा सफल होता है।
  • लक्ष्य होना चाहिए – स्थिर, बढ़ती हुई संपत्ति; न कि हर महीने “जैकपॉट” मारने की कोशिश।

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