आपको नाम जप पर अटूट विश्वास कब और कैसे हुआ?

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज को नाम जप पर अटूट विश्वास कैसे हुआ – इस प्रश्न पर उनका उत्तर सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि पूरा आध्यात्मिक जीवन-दर्शन है।


1. बचपन की घटना – 11 वर्ष की आयु में नाम का बीज

  • महाराज जी बताते हैं कि नाम जप पर उनका अटूट विश्वास बचपन में ही, लगभग 11 वर्ष की आयु में जागा।
  • उस समय वे घर छोड़कर भजन के लिए निकल पड़े थे; परिवार वाले खोजते-खोजते उन्हें ढूँढ लाए।
  • पिता समान बड़े भैया (चाचा) जब उन्हें लेने आए, तो पहले तो डाँटने की, गुस्सा करने की स्थिति थी; उनका स्वभाव भी सख्त था।[
  • उन्होंने पूछा – “ये क्या है? क्यों घर से भागे?” तो महाराज जी ने दृढ़ स्वर में कहा – “हमें भगवान का भजन करना है, अब हम घर नहीं जाएंगे, आजीवन भगवान का भजन ही करेंगे, चाहें मार डालो।”
  • इस उत्तर से उनके बड़े भैया का चेहरा बदल गया; क्रोध की जगह प्रसन्नता और करुणा आ गई, उन्होंने गले से लगा लिया और भावपूर्ण होकर “राम-राम-राम…” जपने लगे।
  • यहीं से, एक छोटे बालक के मन में यह छाप गहराई से बैठ गई कि जीवन का मूल लक्ष्य भगवान का भजन और नाम जप ही है।

2. गुरु कृपा – नाम को “साधना का सार” बना देने वाला उपदेश

  • बड़े भैया उन्हें सीधे अपने गुरुदेव के पास ले गए, जो सन्यासी संत थे; उन्होंने कहा – “ये लड़का कह रहा है कि संत बनेंगे, आपकी शरण में दे रहे हैं।”[youtube]​
  • गुरुजी ने परीक्षा के रूप में कहा – “छोड़ दो, एक सप्ताह में या तो घर भाग जाएगा या संत बन जाएगा; कड़ा शासन रखो।”
  • एक सप्ताह बाद गुरुजी ने उन्हें गंगा स्नान के लिए भेजा और वापस आने पर मंत्र दिया, नाम दिया।[youtube]​
  • मंत्र देते समय गुरुदेव ने एक अत्यंत गूढ़ और निर्णायक बात कही – “बेटा, साधना की सार बात तुम्हें बता रहा हूँ – जो नाम दिया है, वह भीतर ही भीतर निरंतर चलता रहे, यही समस्त शास्त्रों का सार है।”
  • “समस्त शास्त्रों का सार” यह वाक्य बालक के कोमल, नए दिमाग में इतनी गहराई से बैठ गया कि पूरा जीवन उसी पर टिक गया।
  • यहीं से महाराज जी के भीतर यह निश्चय स्थिर हो गया कि साधना का केंद्र और मूल – नाम जप है; बाकी सब उसी के सहायक अंग हैं।[youtube]​

3. शास्त्र, संत और महापुरुष – नाम के सिद्धांत की पुष्टि

महाराज जी बताते हैं कि बाद में यह अनुभव केवल भावना या अंध-विश्वास नहीं रहा, इसे तीन स्तरों पर पुष्टि मिली – शास्त्र, महापुरुष और संतों की वाणी से।[instagram]​[youtube]​

  • वे कहते हैं, “गुरुदेव की बात हमारे दिमाग में बैठ गई, उसी बात को बाद में शास्त्रों ने पुष्ट किया।”[youtube]​
  • हनुमान प्रसाद पोदार जी (गीताप्रेस गोरखपुर से जुड़े महात्मा) की वाणी ने भी उसी नाम-महिमा को बार-बार पुष्ट किया।[youtube]​
  • वृंदावन आने के बाद पूज्य महाराज जी (अपने परमहंस गुरुवर) ने भी नाम की इसी महिमा पर “मोहर” लगा दी – यानी अनुभव, उदाहरण और आचरण से दिखा दिया कि नाम ही सबका आधार है।[youtube]​
  • इस तरह –
    • गुरु उपदेश,
    • शास्त्र-वचन,
    • महापुरुषों की वाणी,
    • और अपने गुरुवर का आचरण –
      चारों ने मिलकर नाम जप को जीवन का अंतिम निष्कर्ष बना दिया।[instagram]​[youtube]​

4. “नाम अंक है, बाकी सब शून्य” – विश्वास का तर्कपूर्ण रूप

महाराज जी एक अत्यंत सरल पर गहरी उपमा देते हैं, जो उनकी अंदरूनी निश्चय को तर्क के रूप में भी स्पष्ट कर देती है।[youtube]​

  • वे कहते हैं – “नाम एक अंक है, और सब साधन, सब कर्म शून्य हैं।”[youtube]​
  • यदि केवल शून्य हों – 0, 0, 0… तो इनका कोई मूल्य नहीं; पर यदि आगे 1 लगा दें – 1 के बाद शून्य – तो वही 10, 100, 1000, 10000 बन जाते हैं।[youtube]​
  • इसी प्रकार –
    • पूजा, पाठ, सेवा, दान, व्रत, तप, यज्ञ – ये सब शून्य के समान हैं;
    • जब तक इनसे पहले “नाम रूपी अंक” न जुड़ा हो, इनका कोई स्थायी आध्यात्मिक मूल्य नहीं बनता।[youtube]​
  • लेकिन यदि हर कर्म, हर साधन के साथ भगवान के नाम का स्मरण जुड़ जाए –
    • खेत में फावड़ा चलाते समय नाम जप,
    • ऑफिस जाते-जाते नाम जप,
    • घर के काम करते हुए नाम जप,
    • स्कूल-कॉलेज, दुकान, नौकरी में नाम स्मरण –
      तो वही साधारण कर्म दस गुना, सौ गुना, हजार गुना फलदायी बन जाते हैं।[youtube]​
  • यह दृष्टि उनके भीतर नाम पर पूर्ण विश्वास को “व्यावहारिक गणित” के रूप में स्थिर कर देती है – नाम है तो साधन अर्थपूर्ण, नाम नहीं तो सब व्यर्थ।[youtube]​

5. हर समस्या का उत्तर – क्यों “सिर्फ नाम”?

जब उनसे पूछा गया – “आपको ये कैसे स्पष्ट हो गया कि हर समस्या का उत्तर नाम जप है?”, तो वे केवल भावुक बात नहीं करते, जीवन और शास्त्र के उदाहरणों से यह बात स्पष्ट करते हैं।[instagram]​[youtube]​

5.1 ध्रुव महाराज का उदाहरण

  • वे ध्रुव जी का प्रसंग बताते हैं – पाँच वर्ष के बालक ने देवर्षि नारद के उपदेश से नाम जप किया, तो “अचल पदवी” ध्रुव पद प्राप्त की, जिसकी सप्तऋषि भी परिक्रमा करते हैं।[youtube]​
  • इससे वे संकेत करते हैं कि –
    • उम्र, परिस्थिति, योग्यता, विद्या – कुछ भी बाधा नहीं;
    • जब साधना का केंद्र नाम हो, तो साधारण बालक भी अप्रतिम लोक प्राप्त कर सकता है।[youtube]​

5.2 नाम की एक बार की उच्चारण की महिमा

  • वे मज़ाकिया पर गंभीर भाव से कहते हैं – “आपने एक बार ‘राधा’ कहा तो यमराज के रजिस्टर में दर्ज हो गया।”[youtube]​
  • यदि कोई मनुष्य जीवन भर पाप करता रहा, पर एक बार हृदय से ‘राधा’ बोल दिया, तो यमराज भी उलझन में पड़ जाते हैं – “अब इसे क्या करें? नरक भेजें तो नाम का अपमान, स्वर्ग दें तो न्याय का प्रश्न।”[youtube]​
  • अंततः वे बताते हैं कि नाम ऐसा है कि पूरे पाप-पत्र में गुणा का चिह्न लग जाता है; एक नाम संपूर्ण हिसाब-किताब की दिशा बदल देता है।[youtube]​
  • वे एक पद की पंक्ति का भाव भी बताते हैं – “नाम त्रैलोक तारे; जो न ले सो जन्म हारे” – तीनों लोकों को तारने वाला नाम, जो न ले वह वास्तव में जन्म व्यर्थ कर देता है।[youtube]​

5.3 नाम – स्वयं भगवान की महाशक्ति

  • “भगवान का नाम स्वयं में परम महामहिम है, भगवान को भी अपने वश में कर लेने की शक्ति रखता है।”[facebook]​[youtube]​
  • वे हनुमान जी से संबद्ध वचन का भाव रखते हैं – “पवनसुत पावन नाम अपने बस कर राखे रामू” – यानी राम ने स्वयं को नाम के आधीन किया।[youtube]​
  • जब नाम इतना स्वामी है कि भगवान भी उसके अधीन हैं, तो साधक के लिए नाम से बढ़कर सुरक्षा, सहारा, उपाय और क्या हो सकता है? यही भाव उनके भीतर अटूट विश्वास बन गया।[youtube]​

6. नाम और जीवन – हर कर्म को साधना बना देने वाला मार्ग

महाराज जी नाम जप को केवल माला तक सीमित नहीं रखते; वे इसे जीवन-व्यवहार का केंद्र बनाते हैं।[youtube]​

  • वे कहते हैं – “अगर नाम रूपी अंक लगा हुआ है, आप फावड़ा चला रहे हैं, ऑफिस जा रहे हैं, स्कूल जा रहे हैं – और नाम जप रहे हैं, तो आप महात्मा हैं।”[youtube]​
  • पवित्र भोजन, पवित्र आचरण, किसी को दुख न देना, स्वयं दुख सह लेना, विवेक जागृत रहना – यह सब नाम में आ जाता है, क्योंकि नाम हृदय को रूपांतरित कर देता है।[youtube]​
  • आगे वे बताते हैं – “नाम के प्रभाव से ही जीवन समाज-प्रिय बनता है, समाज का मंगल करने वाला बनता है।”[youtube]​
  • यानी नाम जप केवल व्यक्तिगत मुक्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सदाचार और परमार्थ का भी आधार बनता है।

7. भीतर का अनुभव – “जो खुद जपेगा, खुद बोलेगा”

महाराज जी केवल उदाहरण और तर्क नहीं देते, वे साधक के व्यक्तिगत अनुभव पर जोर देते हैं।[youtube]​

  • वे कहते हैं – “जो बात हम कह रहे हैं, जब आप स्वयं जपोगे, तब अनुभव में आएगी। तब आप खुद बोलने लगोगे – ‘कुछ बने चाहे न बने, तुम नाम जप के देखो, तुम्हारा मंगल हो जाएगा।’”[youtube]​
  • इसका अर्थ –
    • नाम जप पर उनका विश्वास “उधार” नहीं, स्वानुभव से पुष्ट है।
    • वे श्रोता को भी इसी अनुभव की ओर बुलाते हैं; विश्वास केवल सुनी-सुनाई नहीं, खुद जीकर प्राप्त हो।[youtube]​
  • यह शैली दिखाती है कि उनके लिए नाम जप कोई सिद्धांत मात्र नहीं, बल्कि रोज़-रोज़ जीया हुआ सत्य है – जो हर परिस्थिति में उन्हें सहारा देता रहा।

8. “भगवान की कृपा से…” – विश्वास का मूल कारण

उनके उत्तर का आरंभ ही इस वाक्य से होता है – “भगवान की कृपा से…”[instagram]​[youtube]​

  • वे स्पष्ट करते हैं कि नाम जप पर अटूट विश्वास उनका “व्यक्तिगत कमाल” नहीं, बल्कि ईश्वर की विशेष कृपा है।
  • यह कृपा किन रूपों में दिखाई देती है?
    • बचपन में भजन की लगन,
    • घर छोड़ने का साहस,
    • सही समय पर सही गुरु की शरण मिलना,
    • गुरु-मंत्र में पूर्ण श्रद्धा जागना,
    • और बाद में शास्त्र, महापुरुष, संत – सबकी वाणी से वही बात पुष्ट होते जाना।[instagram]​[youtube]​
  • वे संकेत करते हैं कि नाम जप में टिक जाना भी स्वयं नाम की कृपा है; साधना का बल साधक के अहंकार से नहीं, भगवान की करुणा से आता है।

9. साधक के लिए संदेश – हम इस उत्तर से क्या सीखें?

महाराज जी का व्यक्तिगत अनुभव हर साधक के लिए दिशा बन जाता है। नीचे इसे बिंदुवार समझें।

9.1 छोटी उम्र में भी निर्णायक “हाँ”

  • 11 वर्ष का बालक भी यदि यह निश्चय कर सकता है कि “अब जीवन भगवान के लिए ही है”, तो बड़े भी अपना जीवन-दिशा बदल सकते हैं।[youtube]​
  • उम्र, पढ़ाई, नौकरी, पारिवारिक स्थिति – ये सब बाधा नहीं; मुख्य बात है – अंदर से एक साफ निर्णय लेना कि जीवन में प्रधान क्या है – नाम या संसार?

9.2 गुरु की एक बात को जीवन का केंद्र बनाना

  • गुरु ने कहा – “अंदर ही अंदर नाम निरंतर चले, यही साधना का सार है” – और उन्होंने इसे जीवन का “फाइनल फॉर्मूला” मान लिया।[youtube]​
  • आज के साधक के लिए भी संकेत है –
    • यदि कोई सच्चा संत, शास्त्र सम्मत गुरु मिल जाए,
    • और वह किसी साधना को “सार” बताकर जीवन में उतारने को कहे,
    • तो उसे हृदय की गहराई में बैठाकर जीवन का केंद्र बना दें।

9.3 नाम को हर कर्म से जोड़ना

  • “नाम अंक, बाकी सब शून्य” – यह केवल सिद्धांत नहीं, साधना की विधि है।
  • साधारण जीवन में इसका अभ्यास कैसे हो सकता है?
    • सुबह उठते ही कुछ समय एकाग्र होकर माला से नाम जप।
    • फिर नित्य कर्म, काम, ऑफिस, पढ़ाई – सबके साथ भीतर-भीतर धीमा नाम स्मरण।
    • चलते-फिरते, वाहन चलाते, लाइन में खड़े रहते, नींद आने से पहले – जहाँ-जहाँ मन खाली हो, वहाँ नाम।
  • इस प्रकार धीरे-धीरे जीवन का हर कार्य नाम-सहित होता जाता है और साधक का मन भीतर से बदलने लगता है।

9.4 केवल उपाय नहीं, “सर्वोत्तम समाधान”

  • वे कहते हैं कि हर प्रश्न, हर समस्या के उत्तर में अंततः नाम ही है – क्योंकि नाम हृदय बदल देता है, हृदय बदल गया तो दृष्टि, निर्णय, संस्कार – सब बदल जाते हैं।[youtube]​
  • बीमारी, दुःख, कष्ट, आर्थिक समस्या, मानसिक तनाव – इनमें नाम जप क्या करता है?
    • भीतर धैर्य, संतोष, समर्पण की शक्ति देता है।
    • विवेक देता है कि परिस्थिति में क्या करना है और क्या छोड़ना है।
    • भगवान पर भरोसा जन्माता है कि वे हमारे साथ हैं।
  • इस तरह नाम जप समस्या “खत्म” न भी करे, तो भी “समस्या से ऊपर उठा” देता है; यही सच्चा समाधान है।

10. व्यावहारिक संकेत – जो बात महाराज जी ने छुपे रूप से सिखाई

उनके उत्तर से साधक के लिए कई व्यावहारिक संकेत निकलते हैं:

    1. शुद्ध नाम
      केवल होंठों की गति नहीं, मन की श्रद्धा और प्रेम से नाम लेना; धीरे-धीरे मन उसी में रम जाए।[youtube]​
    1. निरंतर अभ्यास
      उन्होंने कहा – “जो नाम दिया है, अंदर ही अंदर निरंतर चलने का अभ्यास होना चाहिए।”[youtube]​
      अभ्यास से ही सहज नाम-स्मरण की स्थिति बनती है।
    1. भक्ति का लक्ष्य स्पष्ट
      नाम केवल संकट में याद करने की वस्तु नहीं; जीवन के लक्ष्य – भगवत प्राप्ति – तक पहुँचने की सीढ़ी है।[youtube]​
    1. समाज-प्रिय जीवन
      वास्तविक नाम-साधक वह है जो –
    • पवित्र भोजन ले,पवित्र आचरण रखे,किसी को दुःख न दे,और जो दुःख दे, उसे भी सह सके;
      इसीलिए वे कहते हैं – नाम से समाज-प्रिय, सबका मंगल करने वाला जीवन बनता है।
    1. स्वानुभव की दिशा
      महाराज जी बार-बार संकेत देते हैं – “जब तुम खुद जपोगे, तब तुम खुद कहोगे।”
      यानी, लक्ष्य यह नहीं कि केवल महाराज जी का अनुभव जानकर रुक जाएँ, बल्कि स्वयं नाम जप करके उसी रस और दृढ़ विश्वास को पाएं।

11. सार रूप में – “अटूट विश्वास” की परतें

यदि महाराज जी के उत्तर को संक्षेप में परतों की तरह समझें, तो यह क्रम बनता है:

    1. भगवान की कृपा – 11 वर्ष की उम्र में भजन की लगन और घर छोड़ने का साहस।[instagram]​[youtube]​
    1. गुरु का निर्देश – “निरंतर नाम जप ही साधना का सार है।”[youtube]​
    1. शास्त्र की पुष्टि – ध्रुव जैसे उदाहरण, नाम-महिमा से भरे शास्त्र-वचन।[youtube]​
    1. महापुरुषों की वाणी – हनुमान प्रसाद पोदार जी आदि की रचनाओं से पुष्ट होता संदेश।[youtube]​
    1. गुरुवर की मोहर – वृंदावन में अपने पूज्य महाराज जी के जीवन और वचनों से वही बात दृढ़ हो गई।[youtube]​
    1. स्वानुभव – जीवन भर नाम जपते हुए हर परिस्थिति में नाम की रक्षा, सहारा और कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव।[youtube]​
    1. व्यावहारिक गणित – “नाम अंक, बाकी सब शून्य”; नाम जुड़ते ही हर कर्म सार्थक।[youtube]​

इन्हीं सबके मेल से उनके भीतर यह अखंड निश्चय बन गया कि “भगवान के नाम से ही सब कुछ प्राप्त हो जाएगा – यह विश्वास कर लो।”[instagram]​[youtube]​


यदि आप चाहें तो अगली बार मैं इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाकर “नाम जप से जीवन-परिवर्तन” पर अलग से पूरा साधन-पथ, रोज़मर्रा की प्रैक्टिकल दिनचर्या के रूप में भी लिख सकता हूँ।

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