12 से 16 साल की उम्र में बच्चे अक्सर माँ‑बाप की बात कम सुनते हैं, क्योंकि इस समय उनके शरीर, दिमाग और भावनाओं में तेज़ बदलाव होते हैं और वे अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं। अगर माता‑पिता शांत रहकर, इज़्ज़त से बात करके, नियम साफ़ रखकर और बच्चे को सुनने का मौका देकर साथ देंगे, तो बच्चा धीरे‑धीरे ज़्यादा समझदार और सहयोगी बन सकता है।
12–16 की उम्र में क्या बदलता है?
12 से 16 साल का समय किशोरावस्था यानी टीनएज की शुरुआत और बीच का समय होता है, जिसमें हार्मोन, शरीर, सोच और भावनाएँ तेजी से बदलती हैं। इस उम्र में दिमाग का वह हिस्सा विकसित हो रहा होता है जो निर्णय लेना, सही‑गलत समझना और गुस्सा संभालना सिखाता है, इसलिए बच्चा कभी समझदार, कभी बचकाना लग सकता है।
- बच्चे अपने लिए ज़्यादा आज़ादी और खुद निर्णय लेने की इच्छा महसूस करते हैं।
- दोस्तों की राय और सोशल मीडिया का असर बहुत बढ़ जाता है, कई बार घर की बातों से ज़्यादा।
- पढ़ाई का दबाव, बोर्ड एग्ज़ाम, भविष्य की चिंता और शरीर में बदलाव उन्हें अंदर से बेचैन भी कर सकते हैं।
बच्चे क्यों नहीं सुनते? मुख्य वजहें
अपनी पहचान बनाने की ज़िद
किशोरावस्था में बच्चा “मैं कौन हूँ?” यह सवाल अपने‑आप से पूछने लगता है और अपनी अलग सोच बनाना चाहता है। जब माता‑पिता हर बात में “ऐसा ही करना है”, “मैं जो कहूँ वही सही है” कहते हैं, तो बच्चा विरोध में और ज़्यादा उल्टा करने लगता है।
- बच्चा चाहता है कि उसकी राय सुनी जाए, उसे छोटा समझकर न टाला जाए।
- जब घर में सिर्फ़ आदेश और डाँट हो, तो बच्चा चुप हो जाता है या फिर ज़िद्दी और बाग़ी बन जाता है।
संवाद का तरीका सही न होना
कई बार माँ‑बाप बात सही कहते हैं, लेकिन तरीका ऐसा होता है कि बच्चा खुद ही दूर भागने लगता है।
- लगातार तुलना करना: “देखो शर्मा जी का बेटा…” से बच्चा हीन भावना और गुस्सा महसूस करता है।
- हर समय आलोचना: “तुम कुछ ठीक करते ही नहीं”, “हमेशा ग़लत ही करते हो” जैसी बातें उसके अपनेपन की भावना तोड़ देती हैं।
- चिल्लाकर या ताना देकर समझाना बच्चे को बंद कर देता है, वह सुनने की बजाय खुद को बचाने लगता है।
घर का माहौल और पालन‑पोषण
अगर घर में हमेशा तनाव, झगड़ा, ताना‑मारना, या एक‑दूसरे की इज़्ज़त न करना चलता हो, तो बच्चा भी वैसा ही व्यवहार सीखता है।
- बहुत ज़्यादा सख्ती (हर बात पर पाबंदी) या बिल्कुल ढील (कोई सीमा नहीं) – दोनों ही तरीके बच्चे में उलझन और चिड़चिड़ापन बढ़ाते हैं।
- जब माता‑पिता आपस में ही लड़ते हों, तो बच्चा असुरक्षित और गुस्सैल हो सकता है और बात मानने से इंकार कर सकता है।
स्क्रीन, दोस्त और बाहरी दबाव
आज के समय में मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया बच्चे का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं, खासकर टीनएज में।
- स्क्रीन पर दिखती चमकदार ज़िंदगी और दोस्तों का ग्रुप उसके लिए “सही” और “कूल” बन जाता है, माता‑पिता पुराने या सख्त लग सकते हैं।
- अगर बच्चा गलत संगत में चला जाए, तो वह घर की हर बात को कंट्रोल समझकर रिएक्ट कर सकता है।
माता‑पिता क्या बदलें?
पहले खुद को सुधारें
कई भारतीय और मनोवैज्ञानिक लेख बताते हैं कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे रोज़ माता‑पिता में देखते हैं, केवल उपदेश से नहीं। अगर माँ‑बाप खुद शांत, संयमी और ईमानदार हैं, तो बच्चा अंदर‑ही‑अंदर इसे अपना लेता है।
- झूठ न बोलें, वादे निभाएँ; बच्चा भरोसा करना सीखता है।
- गुस्से में चिल्लाने की जगह कुछ मिनट चुप होकर पानी पीकर बात करें।
- अपनी गलती मानना भी सीखें, “हाँ, यहाँ मुझसे भी गलती हो सकती है” कहना बच्चे के लिए बड़ा उदाहरण बनता है।
सुनना सीखें, सिर्फ़ समझाना नहीं
कई रिसर्च और गाइडलाइन कहती हैं कि किशोर से बात करते समय सबसे ज़रूरी है पहले सुनना, फिर बोलना।
- रोज़ 10–15 मिनट ऐसा समय रखें जब आप बस बच्चे की बातें सुनें – बिना टोके, बिना तुरंत सलाह दिए।
- उसकी बातों को दोहराकर समझें: “तुम कह रहे हो कि स्कूल में बहुत प्रेशर महसूस हो रहा है, सही समझा?” इससे बच्चे को लगता है कि आप सच‑मुच समझना चाह रहे हैं।
- बीच‑बीच में मोबाइल, टीवी बंद रखकर आँखों में देख कर बात करें, इससे उसे महत्व महसूस होगा।
कैसे बात करें कि वह सुने?
शांत और सम्मानजनक भाषा
टीनएजर्स पर रिसर्च बताती हैं कि जब माता‑पिता आदर भरी, “मैं” वाली भाषा इस्तेमाल करते हैं, तो झगड़े कम होते हैं और बच्चा बात सुनने के लिए तैयार रहता है।
- “तू हमेशा…” की जगह “मुझे चिंता होती है जब…” जैसा वाक्य इस्तेमाल करें.
- “तुम निकम्मे हो” की जगह “यह काम तुम्हारे स्तर के हिसाब से बेहतर हो सकता है, चलो साथ बैठकर देखते हैं” कहना ज़्यादा असरदार है।
- एक बार में एक ही मुद्दे पर बात करें, पुरानी सारी बातें एक साथ न निकालें।
नियम साफ़, पर बातचीत से तय
अच्छे पालन‑पोषण पर लिखे गए लेख बताते हैं कि “सख्ती + प्यार + साफ़ नियम” वाला तरीका बच्चों को संतुलित बनाता है।
- घर के कुछ फिक्स नियम मिलकर बनाएं, जैसे: पढ़ाई का समय, मोबाइल का समय, वापसी का समय, झूठ न बोलना आदि।
- नियम बनाते समय बच्चा भी बैठा हो, उससे पूछें: “तुम्हें क्या लगता है, रात कितने बजे तक मोबाइल ठीक रहेगा?” फिर आप अपनी सीमा सुझाएँ और बीच का रास्ता निकालें।
- नियम तोड़ने पर क्या परिणाम होगा, पहले से तय करें – जैसे एक दिन कम स्क्रीन टाइम, जेब खर्च में थोड़ी कटौती, आदि; मारना‑पीटना नहीं।
तारीफ और प्यार की भाषा
अगर बच्चा सिर्फ़ गलती पर ही आपकी आवाज़ सुने, तो उसके दिमाग में आपकी इमेज “केवल डाँटने वाले” की बन जाती है।
- छोटी‑छोटी अच्छी बातों पर भी “आज तुमने खुद से होमवर्क पूरा किया, यह अच्छी बात है” जैसी तारीफ करें।youtube+1
- हफ्ते में कभी‑कभी उसके पसंद का खाना, छोटा सा सरप्राइज़ या उसके किसी शौक के बारे में बातें करके उसे यह महसूस कराएँ कि वह केवल मार्क्स के लिए नहीं, इंसान के रूप में भी महत्वपूर्ण है।
प्रैक्टिकल कदम: क्या करें, कैसे करें?
रोज़मर्रा में अपनाने योग्य आदतें
- दिन में एक समय “फैमिली टाइम”: बिना मोबाइल, सब साथ बैठकर 15–20 मिनट बात करें – दिन कैसा गया, कोई मज़ेदार बात, कोई टेंशन।
- बच्चे के दोस्त, स्कूल, गेम, म्यूजिक में दिलचस्पी दिखाएँ, सिर्फ़ “किसके साथ घूमते हो?” पूछकर जांच न करें।
- पढ़ाई पर बात करते समय हमेशा डाँट से शुरुआत न करें, पहले पूछें “आज स्कूल कैसा रहा? कौन‑सा सब्जेक्ट अच्छा लगा?” फिर धीरे से पढ़ाई की बात करें।
गुस्से और जिद के समय
किशोरावस्था में टकराव ज़्यादा होते हैं, लेकिन शोध बताते हैं कि शांति और सम्मान से संभाले गए झगड़े रिश्ते को और मजबूत बना सकते हैं।
- जब बच्चा गुस्से में हो, उसी समय बड़ा उपदेश देने की बजाय पहले शांत होने का समय दें: “हम दोनों अभी गुस्से में हैं, आधे घंटे बाद आराम से बात करेंगे।”
- चिल्लाने की बजाय टोन धीमी रखें; धीरे बोलने वाला अक्सर झगड़े में भी जीत जाता है क्योंकि सामने वाला खुद ही शांत होने लगता है।
- गुस्सा उतरने के बाद भी अगर बच्चा बात नहीं करना चाहता, तो ज़बरदस्ती न करें; बस इतना कहें, “जब बात करने का मन हो, मैं यहीं हूँ।”
मोबाइल और इंटरनेट के मामले में
- स्क्रीन टाइम के लिए साफ़ नियम बनाएं – जैसे पढ़ाई के बाद 1–2 घंटे, रात 10 बजे के बाद नहीं आदि, और खुद माँ‑बाप भी इनका पालन करें।
- कौन‑कौन सी साइट, चैनल या ऐप ठीक हैं, इस पर खुलकर बात करें, सिर्फ “मत देखो” कहने से काम नहीं चलेगा।
- अगर बच्चा ग़लत कंटेंट देख ले, तो पहले चिल्लाने से पहले यह समझने की कोशिश करें कि उसने क्यों देखा, फिर उसे सही‑गलत समझाएँ।
भारतीय संदर्भ में खास बातें
भारतीय समाज में परिवार, इज़्ज़त और “बड़ों की बात मानना चाहिए” जैसी बातें बहुत ज़्यादा महत्व रखती हैं, जबकि आज के बच्चे इंटरनेट और ग्लोबल कल्चर से भी प्रभावित हैं। इस वजह से घर के पुराने नियम और बाहर की नई सोच के बीच बच्चे को अंदर ही अंदर खिंचाव महसूस होता है।
- भारत में अधिकतर माता‑पिता अब भी “मैं कह रहा हूँ, इसलिए सही है” वाले तरीक़े की ओर झुकते हैं, जबकि बच्चे चर्चा और तर्क सुनना चाहते हैं।
- बच्चे को परिवार की इज़्ज़त, संस्कार और मर्यादा सिखाना ज़रूरी है, लेकिन साथ‑साथ उसे अपनी बात रखने की इज़्ज़त भी देनी होगी।
कब प्रोफेशनल मदद लें?
कभी‑कभी समस्या सिर्फ़ “ना सुनने” की नहीं होती, उसके पीछे डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी, बुलीइंग, नशे या किसी और गंभीर बात का हाथ हो सकता है।
- अगर बच्चा बहुत ज़्यादा चिड़चिड़ा, अकेला, उदास रहे, नींद‑खाना अचानक बहुत बदल जाए, या पढ़ाई व रोज़मर्रा के कामों में तेज़ गिरावट दिखे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना अच्छा है।
- स्कूल काउंसलर, चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या अनुभवी फैमिली काउंसलर से मिलकर पूरा माहौल समझना और मिल‑बैठकर समाधान ढूँढना मददगार हो सकता है।
आख़िरी बात: रिश्ता बचाइए, बहस नहीं
वैज्ञानिक शोध और अनुभवी विशेषज्ञों की राय मानें तो किशोरावस्था के झगड़े ज़िंदगी भर नहीं चलते, लेकिन इस समय माता‑पिता का व्यवहार बच्चे के पूरे जीवन के लिए उसकी आत्म‑छवि और आपसे रिश्ते की नींव तय कर देता है।
- हर बहस में “जीतना” ज़रूरी नहीं, कई बार रिश्ता बचाना ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
- बच्चे को यह महसूस कराना कि “गलती हो जाए तब भी मेरा घर और मेरे माता‑पिता मेरे साथ हैं” उसे भीतर से मजबूत और ज़िम्मेदार बनाता है।
इसी भरोसे, सम्मान और धैर्य के साथ अगर माता‑पिता धीरे‑धीरे अपने तरीके में बदलाव लाते रहेंगे, तो 12–16 साल का यह मुश्किल समय भी आपसी समझ, प्यार और सीख से भरा सुंदर दौर बन सकता है।









