किसी पाप का सच्चा प्रायश्चित्त कब होता है

३६-किसी पापका सच्चा प्रायश्चित्त तब होता है, जब १. उसके लिये मनमें भयानक पीड़ा – घोर पश्चात्ताप हो, २. भविष्यमें वैसा न करनेका दृढ़ निश्चय हो, ३. अपने पापको प्रकट करके नीचातिनीच कहलाने और सम्मान करनेवाले लोगोंके द्वारा भी तिरस्कृत होनेका साहस हो, ४. पापके फलस्वरूप किसी भी दण्डके सहनेमें प्रसन्नता हो और ५. श्रीभगवान्से यह कातर प्रार्थना हो कि उनकी कृपासे फिर कभी ऐसा कुकर्म बने ही नहीं।

३७-क्रोध जिसको आता है, उसको पहले जलाता है और जिसपर आता है, उसको पीछे। क्रोध आनेपर यदि मनुष्य चुप रह जाय तो अंदर-अंदर उसे जलाकर क्रोध भी जल जाता है, पर यदि क्रोधके वशमें होकर शरीर या वचनसे कोई क्रिया हो जाय तो फिर वह दूसरोंको भी जलाता है और आगकी तरह चारों ओर फैलकर तमाम वातावरणको संतापसे भर देता है। फिर वह गरमी सहज ही शान्त भी नहीं होती।

३८-क्रोधमें जब जबान खुलती है, तब विवेककी आँखें मुँद जाती हैं। उस समय ऐसी बातें मुँहसे निकल जाती हैं, जिनके लिये केवल इसी जीवनमें नहीं, कई जन्मोंतक पश्चात्ताप करना पड़ता है।

३९-वही सच्चा शूर है, जो मनके क्रोधको मनमें ही मार डाले, बाहर प्रकट होने न दे। और वह तो सर्वविजयी है, जिसके मनमें भी क्रोध उत्पन्न न होता हो।

४०-कामकी कुक्रिया एकान्तमें होती है, अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको एकान्तकी कामोत्तेजक परिस्थितिसे सदा बचना चाहिये, अर्थात् एकान्तमें किसी भी पुरुषसे स्त्रीको और किसी भी स्त्रीसे पुरुषको नहीं मिलना चाहिये।

४१-मनुष्य कितना धोखा खा रहा है। अपना सुधार करना अपने हाथ है, उसको नहीं करता और अपनेको परिस्थितिके वश मानकर अपने दोषोंका समर्थन करता है, पर दूसरेका सुधार करनेके लिये प्रयत्न करता है, जो उसके हाथमें नहीं है।

४२-जिसका जीवन जितना ही आडम्बर और विलाससे युक्त है जिसकी रहन-सहन जितनी ही व्यर्थक शौकोंसे भरी है, उसका जीव उतना ही अधिक अभावयुक्त, धनकी दासता तथा धनके लिये अन्यायका आश्रय लेनेवाला, अशान्त और दुःखी है। ऐसे मनायक लिये सबसे अधिक हानिकी बात यह है कि वह धनियाँका मुखापक्षी धनियाँका पदानुगामी, धनियाँका गुलाम, धनियोंके दोषोंका समर्थक और धनियोंके बरे आचरणोंका अनुसरण करनेवाला बनकर शीघ्र ही

पतित हो जाता है। जेता है जिसका जीवन जितना ही सीधा-सादा, कम खर्चीला औ संतोषयुक्त है, वह उतना ही अभावहीन, स्वावलम्बी, न्यायप्रिय, शान्त, सुखी और निष्पाप है।

४४-किसीको नीचा दिखाकर या किसीकी निन्दा करके अपना गौरव बढ़ानेका प्रयास करना बहुत बड़ी मूर्खता और नीचता है।

४५-संसारमें ऐसा कोई नहीं है, जिसमें दोष-ही-दोष हो। खोजनेपर निकृष्ट-से-निकृष्ट वस्तुमें भी अद्भुत गुण मिल सकते हैं। गुण देखनेवाली आँखें चाहिये।

४६-दोष देखनेवाला सदा घाटेमें रहता है। दिन-रात दोष- दर्शन और दोष-चिन्तनसे उसके अन्दरके दोष पुष्ट होते और नये-नये दोष आ-आकर अपना घर करते रहते हैं। फलतः उसका जीवन दोषमय बन जाता है।

४७-जो सबमें दोष देखता है, उसकी गुण ग्रहण करनेकी शक्ति नष्ट हो जाती है और दोष ग्रहण करनेकी शक्ति बढ़ जाती है। वह जहाँ-तहाँसे दोषोंका ही आकर्षण, ग्रहण और संग्रह करता है।

४८-वाणीके कथनकी अपेक्षा मनके दृढ़ विचार और विचारकी अपेक्षा वैसा ही आचरण कहीं ऊँचा है। वह विचार किस कामका जो आचरणमें न परिणत हो।

४९-शुद्ध आचरण ही यथार्थ आचार है और शुद्ध भाव ही यथार्थ विचार है। इसी आचार-विचारको अपनाना चाहिये।

५०-जिसमें अपना और दूसरोंका परिणाममें कल्याण हो, ऐसा भाव शुद्ध विचार है, ऐसा आचरण शुद्ध आचार है।

५१-किसी दूसरेके आचरणकी मीमांसा करते समय पहले अपनेको उसकी उस परिस्थितिमें ले जाना चाहिये, जिसमें पड़कर उसने वह आचरण किया था; तभी यथार्थ मीमांसा और निर्णय हो सकेगा।

५२-जो मनुष्य अपने सुख-दुःखको गौण समझकर दूसरोंके सुख-दुःखको मुख्य समझता है, वही दूसरोंको दुःख पहुँचानेसे बच सकता है और वही दूसरोंको सुख भी पहुँचा सकता है। जिसकी दृष्टिमें अपना दुःख-सुख ही सब कुछ है, वह दूसरोंके सुख-दुःखकी परवा क्यों करने लगा।

५३-आत्मवत् व्यवहार वाणीसे नहीं होता, आचरणसे होता है और उसका यथार्थ सम्बन्ध मनसे है। जिसके मनमें आत्मीयता है, वही सच्चा आत्मीय है।

५४-जो मनुष्य अपनी अलग कोई इच्छा नहीं रखता, मंगलमय भगवान्की इच्छाके प्रवाहमें ही अपनेको बहा देता है, वही संसार- सागरमें डूबनेसे बचता है। जो मंगलमय भगवान्‌की इच्छाके विपरीत चलता है, उसे तो विपत्तियोंका शिकार बनना ही पड़ता है। नदीके बहावके अनुकूल साथ बहे चले जानेपर कहीं किनारे लग जाओगे; पर बहावके प्रतिकूल चले तो क्रमशः थककर डूबना ही पड़ेगा।

५५-भगवान्‌को निवेदन कर देनेपर विष भी अमृत बन जाता है। प्रह्लाद और मीराको दिया हुआ प्राकृत विष इसीसे अमृत बन गया था। हम भी यदि संसाररूपी यह हलाहल जहर भगवान्‌को अर्पण कर दें तो यह भी अमृत बन जायगा। फिर संसारके भोग हमें मृत्युके मुखमें न ले जाकर अमृतत्वकी प्राप्ति करानेवाले ही होंगे।

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥

५६-पूर्ण परात्पर भगवान्की ह्लादिनी अथवा आनन्दमयी शक्तिकी दिव्य पूर्ण परिणति ही श्रीराधा हैं और श्रीराधाकी अंगकान्तिका कायव्यूह-रूपशक्तियाँ जो निरन्तर श्रीराधाकृष्णके अप्राकृत मिलनदे प्रयत्नमें लगी हई नित्य-नवीन भाव विकास करती रहती हैं, श्रीगोपांगन हैं। श्रीराधा महाभावस्वरूपिणी हैं और श्रीकृष्ण रसराजशिरोमणि श्रीराधा शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान्। एक ही परमतत्त्व लीलाविलासके लिये दो दिव्य रूपोंमें प्रकट हैं।

५७-भोगोंसे भोगकामनाकी तृप्ति कभी नहीं हो सकती। जैसे अग्निमें घीकी आहुति पड़नेसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही भोगोंकी वृद्धिर भोगकामना बढ़ती है।

‘बुझे न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घीते।’

५८-भोगकामना जन्मसे लेकर मृत्युकालतक मनुष्यके पीछे लगी रहने है और बिच्छूके डंक मारनेकी भाँति निरन्तर उसे पीड़ित करती रहती है।

५९-भोगकामनासे छूटना हो तो भोगोंकी वृद्धिके फेरमें न पड़का भोगोंका तिरस्कार करना चाहिये।

६०-कर्म, ज्ञान और भक्तिमें वस्तुतः विरोध नहीं है। प्रधानता औ गौणताके भेदसे इनमें भेदकी प्रतीति होती है। वस्तुतः ये एक-दूसरेके सहायक हैं और इनमें एकके बिना दूसरेका सर्वांग-सम्पन्न होना कठिन हो जाता है।

६१-भोग-संस्पर्शसे प्राप्त होनेवाला इन्द्रियसुख आगमापायी है।

और दुःखोत्पादक है। सच्चा सुख तो ब्रह्मसंस्पर्शमें है। जो भक्त निर्मत और सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा ब्रह्मसंस्पर्श प्राप्त करता है, वह धन्य है और वह तो परम धन्य है, जिसकी बुद्धि ही नहीं, मन ही नहीं-नेत्र, श्रोत्र नासिका आदि प्रत्येक इन्द्रिय, शरीरका एक-एक रोम ब्रह्मसंसा प्राप्त करके धन्य हो जाता है। इसीसे गोपांगनाएँ साधक-जगत्ले सर्वशिरोमणि हैं। क्योंकि उनका प्रत्येक अंग दिव्य भगवत्-संस्पर्श से धन्य हो चुका है।

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