संध्या समय में क्या करें और क्या न करें?

लेख: संध्या समय में क्या करें और क्या न करें – श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज के शब्दों में

संध्या समय हिंदू आध्यात्मिकता और जीवनचर्या का अत्यंत पवित्र काल है। इस विषय में संत श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज ने विशेष कथन किया, जिसकी गहन व्याख्या यहाँ प्रस्तुत है। महाराज जी द्वारा वीडियो मे 2:47 से 5:00 मिनट तक जो बाते कहीं, वे इस काल की महत्ता, उसकी मर्यादा, जीवनशैली, और उसके भीतर किए जाने वाले, न किए जाने वाले कार्यों को उजागर करती हैं।

संध्या का समय – परिभाषा और विस्तार
श्री महाराज जी ने संध्या समय को सूर्यास्त के समीप का महत्त्वपूर्ण काल बताया। उन्होंने कहा, “45 मिनट आगे और 45 मिनट पीछे सूर्य भगवान के अस्त होने के मिलाकर कुल 48 मिनट का समय मानना चाहिए”। उन्होने स्पष्ट किया कि यह दो घड़ी का समय है – एक घड़ी 24 मिनट, दो घड़ी 48 मिनट। उदाहरण के तौर पर यदि सूर्य 5:45 पर अस्त होता है, तो उसके 24 मिनट पहले – अर्थात 5:21 बजे के आसपास संध्या प्रारंभ हो जाती है। इसी प्रकार सूर्यास्त के 24 मिनट बाद तक यह काल चलता रहता है।

महाराज जी ने कहा, “5:20 से लेकर 6:10 तक भोजन, स्वाध्याय, सहवास, मैथुन आदि क्रियाएं मना की गई हैं”। अर्थात यह समय अत्यंत पवित्र कार्यों — विशेषकर भगवान की उपासना, जप, ध्यान, गायत्री मन्त्र, गुरु मन्त्र, नाम-जप आदि के लिए है। सांसारिक कार्यों, विशेषकर शरीर-सम्बंधित गतिविधियों से बचना चाहिए। इस समय हमें अपने चित्त को निर्मल और शांत रखना है, बाह्य व्यर्थता से मुक्त होकर मयार्दित साधना करनी है।

संध्या के समय क्या करें?

  1. भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा :
    महाराज जी ने इस पावन समय में सूर्य भगवान को जल देना, यानी अर्घ्य देने को नितांत प्रशस्त बताया। यह परंपरा भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी है – सूर्य को स्मरण, सम्मान और आभार प्रकट करना केवल पदार्थिक नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धता का हेतु है।
  2. गायत्री मंत्र जप एवं गुरु मंत्र जप :
    संध्या के क्षणों में गायत्री मंत्र अथवा आपके अपने गुरु मंत्र का जप अत्यंत शुभ फलदायी है। “शांत भाव में भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर गायत्री जप, गुरु मंत्र जप, नाम-जप – उस समय जप प्रधान रहना चाहिए”। इस काल में वातावरण की ऊर्जा अत्यंत संवेदनशील और सात्विक होती है, इसलिए उच्चारण किए गए मन्त्र मन और आत्मा में गहराई तक उतरते हैं।
  3. नाम-स्मरण (नाम-जप) :
    महाराज जी ने बार-बार महत्व दिया कि संध्या समय हर हाल में, चाहे कोई भी कार्य चल रहा हो, “नाम-जप जरूर करना चाहिए”। जीवन में कार्य हमेशा चलते रहेंगे, लेकिन भगवान का भजन नहीं छोड़ना चाहिए। चाहे कोई व्यवसायी हो, किसान हो, गृहस्थ अथवा किसी भी स्थिति में, अपने कार्य में लगे हुए भी भगवत स्मरण चलता रहना चाहिए।

संध्या के समय क्या नहीं करें?

  1. भोजन निषिद्ध :
    महाराज जी ने अत्यंत स्पष्टता से बताया कि “संध्या के समय भोजन मना किया गया है”। यह “एक घंटा की बात है, छोटा-मोटा 48 मिनट”। यह काल शरीर के भौतिक तृप्ति का नहीं, आत्मिक निराकरण और उपासना का है। भोजन करने से शरीर भारी होगा, ध्यान-भजन में विघ्न होगा।
  2. स्वाध्याय, मैथुन आदि क्रियाएं भी वर्जित :
    इस समय स्वाध्याय (पढ़ाई), सहवास (सामान्य सामाजिक मेलजोल), मैथुन (काम संबंधी गतिविधियाँ) – समस्त सांसारिक क्रियाएँ निषिद्ध हैं। ये सभी कर्म चित्त को बाहर की ओर आकर्षित करते हैं और इस समय की पवित्रता को भंग करते हैं।
  3. कोई अलौकिक या बाह्य शोरगुल, विकर्षण :
    वातावरण को शुद्ध, शांत एवं सात्विक रखना इस काल के लिए अपेक्षित है। मन, वाणी और काया को संयमित भाव में रखना चाहिए। अनावश्यक बातचीत, हास-परिहास, अन्य क्रियाकलाप इस समय वर्जित माने गए हैं।

संध्या के समय जीवनशैली – सहजता का दर्शन

महाराज जी के अनुसार, किसान हो, व्यापारी हो – अपने कार्य तो होते ही रहेंगे, लेकिन संध्या का समय पश्चात भगवत-भजन हर हाल में प्राथमिक है। “जीवन में कार्य कभी समाप्त होने वाले नहीं, तो हम भगवान का भजन थोड़ी छोड़ देंगे, भगवान का भजन तो करना ही चाहिए”। इससे यह सिख मिलती है कि आध्यात्मिक अनुशासन केवल किसी एक वर्ग के लिए नहीं, सम्पूर्ण समाज के लिए है। पवित्रता और साधना का मार्ग हर मनुष्य के भीतर समाहित है, चाहे जीवन की परिस्थिति कैसी भी हो।

महाराज जी ने जीवन की व्यस्तता और साधना के बीच संतुलन पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “यदि कार्य कर रहे हैं तो भी नाम जप चलते रहना चाहिए”। यह आध्यात्मिकता का व्यावहारिक रूप है – सांसारिकता के बीच अध्यात्म का सतत प्रवाह।

संध्या के समय की वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता
महाराज जी ने संध्या काल को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी जागृत किया। सूर्यास्त के समय प्रकृति की ऊर्जा परिवर्तित होती है – इस पल में उत्तम ध्यान, ध्यान-संवर्धन और मनोबल वृद्धि होती है। शास्त्रों के अनुसार, संध्या काल में प्राणों की सूक्ष्म तरंगें अत्यंत संवेदनशील और सकारात्मक होती हैं, ऐसे में किया गया जप व उपासना अत्यंत फलदायी सिद्ध होती है।

लोकाचार और व्यक्तिगत आदर्श – महाराज जी का निर्देश

महाराज जी ने लोकाचार के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संध्या काल हर किसी के लिए है – चाहे कोई किसान हो, मजदूर, व्यापारी या अधिकारी। इस समय कार्य चलेगा, लेकिन “भगवान का स्मरण प्रारंभ कर दो अपने कार्य करते हुए”। इससे जीवन के हर स्तर पर अध्यात्म की धारा प्रवाहित होती रहती है, व्यक्ति सांसारिकता से ऊपर उठता है।

संध्या के समय जीवन का अनुशासन

  • संध्या काल में संयम, सादगी, भीतर की गहराई और भगवत-संवाद – इन्हीं मूल्यों की स्थापना होनी चाहिए।
  • इस समय शरीर, वाणी, और मन – तीनों को संयम और सात्विकता के साथ आग्रहित करना आवश्यक है।
  • यदि कार्य चल भी रहा हो, तो सर्वप्रथम अपने चित्त को भगवत-स्मरण एवं साधना की ओर मोड़ना चाहिए।
  • यह काल साधना का है, सांसारिकता का नहीं। इसका अनुपालन जीवन की उच्चतम आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खोलता है।

महाराज जी के शब्दों का सारांश

संध्या का समय अति पवित्र, अति शक्तिशाली, और जीवन को रूपांतरण देने वाला क्षण है। इसमें भगवत स्मरण, जप, ध्यान, गायत्री मंत्र का उच्चारण, गुरु मंत्र का जप – यही सर्वोत्कृष्ट कार्य हैं। अव्यावहारिक और भौतिक गतिविधियाँ वर्जित हैं। मन, वाणी, और तन को पूर्ण संयम में रखकर, आध्यात्मिक अनुभूति के लिए, आत्मशुद्धि हेतु, भगवत साधना करनी है।

महाराज जी का यह कथन केवल एक धार्मिक निर्देश नहीं; यह जीवन को संतुलित, अनुशासित, और परम-सुख की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शन है। उनके शब्दों में संध्या काल केवल एक समय नहीं, जीवन का महत्त्वपूर्ण बिंदु है जहाँ से अध्यात्म के अग्नि को और अधिक प्रज्वलित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज का यह संध्या काल का निर्देश – भौतिकता और आध्यात्मिकता के समन्वय, जीवन में साधना का स्तम्भ, कार्य और भजन का संतुलन, और चेतना को ऊपर उठाने का सीधा-सरल व गहन मार्गदर्शन है। संध्या के समय खाना, सांसारिक क्रियाएं –पूर्णतः वर्जित हैं; नाम स्मरण, सूर्य को अर्घ्य, गायत्री जप, और गुरु मंत्र – यही सर्वोत्तम साधना है। संध्या का समय जीवन को निर्मल, शांत, और भगवन्मय बनाने का श्रेष्ठ अवसर है – इसका पालन करके ही जीवन में सुख, शांति, और दिव्यता प्राप्त की जा सकती है।youtube​

  1. https://www.youtube.com/watch?v=G3VoSLpdvMs

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