अगर पति मांस-मदिरा आदि का सेवन करता हो तो पत्नी को क्या करना चाहिये ? पति मार-पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिये ? अगर पीहरवाले भी उसको अपने घर न ले जाये, तो वह क्या करे ?

अगर पति मांस-मदिरा आदि का सेवन करता हो तो पत्नी को क्या करना चाहिये ? पति मार-पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिये ? अगर पीहरवाले भी उसको अपने घर न ले जाये, तो वह क्या करे ?

उत्तर- पति को समझाना चाहिये, निषिद्ध आचरण से छुड़ाना चाहिये। अगर पति न माने तो लाचारी है, पर पति को समझाना स्त्री का धर्म है, अधिकार है। पत्नीको तो अपना खान-पान शुद्ध ही रखना चाहिये। पत्नीको तो यही समझना चाहिये कि मेरे पूर्वजन्म का कोई बदला है, ऋण है, जो इस रूप में चुकाया जा रहा है; अत: मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हैं। पीहरवालों को पता लगनेपर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं; क्योंकि उन्होंने मार-पीट के लिये अपनी कन्या थोड़े ही दी थी! अगर पत्नी के मायकेवाले भी उसको अपने घर नहीं ले जा रहे, तो उसको अपने पुराने कर्मों का फल भोग लेन चाहिये, इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है! उसको पति की मार-पीट धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिये। सहने से पाप कट जायँगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाय। यदि वह पति की मार-पीट न सह सके तो पति से कहकर उसको अलग हो जाना चाहिये और अलग रहकर अपनी जीविका सम्बन्धी काम करते हुए एवं भगवान्का भजन-स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिये। पुरुष को कभी भी स्त्रीपर हाथ नहीं चलाना चाहिये। शिखण्डी भीष्मजी को मारनेके लिये ही पैदा हुआ था; परन्तु वह जब युद्धमें भीष्मजी के सामने आता है, तब भीष्मजी बाण चलाना बन्द कर देते हैं। कारण कि शिखण्डी पूर्वजन्म में स्त्री था और इस जन्म में भी स्त्री रूप से ही जन्मा था, पीछे उसको पुरुषत्व प्राप्त हुआ था। अतः भीष्मजी उसको स्त्री ही मानते हैं और उसपर बाण नहीं चलाते. विपत्तिके दिन किसी पाप के कारण ही आते हैं। उसमें उत्साहपूर्वक भगवान् का भजन स्मरण करने से दुगुना लाभ होता है. एक तो पापोंका नाश होता है और दूसरा भगवान्‌ को पुकारने से भाग्व्दिश्वास बढ़ता है. अत: विपत्ति आने पर स्त्रियों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. विपत्ति आनेपर आत्महत्या करने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिये; क्योंकि आत्महत्या करने का बड़ा भारी पाप लगता है। किसी मनुष्य की हत्या का जो पाप लगता है, वही पाप आत्महत्याका लगता है। मनुष्य सोचता है कि आत्महत्या करने से मेरा दुःख: मिट जाएगा, मैं सुखो हो जाऊंगा ये मूर्खताकी बात है; क्योंकि पहलेके पाप तो कटे नहीं, नया पाप और कर लिया! जिन्होंने आत्महत्याका प्रयास किया और बच गये, उनसे यह बात सुनी है कि आत्महत्या करनेमें बड़ा भारी कष्ट होता है और पश्चात्ताप होता है कि मैं ऐसा नहीं करता तो अच्छा रहता, अब क्या करूँ? आत्महत्या करनेवाले प्रायः भूत-प्रेत बनते हैं और वहाँ भूखे-प्यासे रहते हैं, दुःख पाते हैं। तात्पर्य है कि आत्महत्या करनेवालोंकी बड़ी भारी दुर्गति होती है।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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