उधारी – रिश्तों की EMI और जेब की जलेबी
नया साल आया है और साथ में आया है उधारियों का सीज़न — जैसे सर्दी में मूँगफली आती है, वैसे ही उधारी के नए प्रस्ताव आते हैं। कुछ लोग नए साल के संकल्प लेते हैं — वजन घटाने, पैसे बचाने या सिक्स-पैक बनाने के। लेकिन हमारे उधारी-प्रेमी समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो साल की शुरुआत “भाई, ज़रा दस हज़ार उधार दे ना, अगले महीने पक्का लौटा दूँगा” से करते हैं।
उधारी का सामाजिक विज्ञान
उधारी सिर्फ पैसों का लेन-देन नहीं है, यह एक पूरा भावनात्मक, दार्शनिक और पारिवारिक अनुभव है। उधारी वहां शुरू होती है जहां भरोसा ज़्यादा और बैंक बैलेंस कम होता है।
कभी-कभी तो लगता है कि उधारी, इंसान के DNA में दर्ज है — जैसे किसी के खून में क्रिकेट, तो किसी के खून में उधार लेने का जुनून।
किसी की उधारी दोस्ती के नाम पर शुरू होती है, तो किसी की रिश्तेदारी के बहाने।
वाक्य होते हैं —
- “भाई तू तो अपना है…”
- “बस दस दिन की बात है…”
- “अगले महीने सैलरी मिलते ही…”
और फिर वही दोस्त सैलरी मिलने के बाद “ऑनलाइन नहीं दिख रहा” होता है।
उधारियों की पहचान – पकड़े जाने से पहले पहचानो
अगर आप किसी को देख रहे हैं और सोच रहे हैं कि यह सज्जन व्यक्ति कल अपना हाथ आपकी जेब तक बढ़ा सकते हैं, तो यहां कुछ पहचान के गुण हैं –
- भावनाओं की स्क्रिप्ट तैयार:
उधारी लेने से पहले इनकी आंखों में नमी और आवाज़ में कंपकंपी आ जाती है। लगता है मानो दुनिया की सबसे बड़ी ट्रेजेडी इन्हीं के घर उतरी हो। - ‘बस थोड़े दिन की बात है’ ब्रांड:
ये वही लोग होते हैं जो “थोड़े दिन” को कैलेंडर से बाहर जीते हैं। उनके “दस दिन” आपके बैंक अकाउंट के लिए “दस जन्म” बन जाते हैं। - मोनो एक्टिंग के उस्ताद:
कभी मोबाइल कहीं भूल गए, कभी इलाज का खर्चा, कभी बच्चों की फीस — इनका बहानों का खजाना Netflix की कैटेगरी जैसा है — कभी खत्म नहीं होता। - नए शिकार की तलाश में:
ये उधारी-मास्टर पुराने शिकार तो पहले ही सूखा चुके होते हैं, तो नए साल में “नए बकरे” की तलाश में निकल पड़ते हैं।
उधारियों की इमोशनल कहानियाँ
उधारी सिर्फ पैसे की ज़रूरत नहीं, एक कला भी है।
उधारी लेने वाले लोग भावनाओं के कलाकार होते हैं —
- “भाई, मम्मी हॉस्पिटल में भर्ती है…”
- “सिर्फ दो दिन में लौटा दूँगा…”
- “तू तो मेरा दोस्त है, और किससे माँगू!”
दिल को छू लेने वाली बातों से शुरू होकर, ये कहानियाँ दिल और जेब दोनों खाली कर देती हैं।
और सबसे मज़ेदार बात — उधारी लौटाने के वक्त ये वही लाइनें भूल जाते हैं जो उधारी लेते वक्त बड़े ड्रामे से बोले थे।
उधारी क्यों लगती है लत जैसी
जैसे कुछ लोगों को सेल देखे बिना चैन नहीं मिलता, वैसे कुछ को उधार लिए बिना सुकून नहीं आता।
कारण कई हैं —
- आसान पैसा: जब बिना ब्याज और बिना गारंटी पैसे मिले तो क्यों मेहनत करें?
- नशा भरोसे का: किसी का भरोसा जीतकर उसका फायदा उठाने का जो एड्रेनालिन रश है, वो लॉटरी जीतने से कम नहीं।
- शॉर्टकट की सोच: “अभी किसी तरह काम चलाओ, बाद में देख लेंगे”— यही मानसिकता इनकी उधारी की रीड की हड्डी है।
उधारी की लत उतनी ही खतरनाक है जितनी “वन मोर रील देखकर सो जाऊँ” वाली सोच — दोनों में ‘बाद में’ कभी नहीं आता।
कैसे बचें इन बकरेबाजों से
अब सवाल यह है कि इन उधारी-प्रेमियों से खुद को कैसे बचाएं? क्योंकि “ना” कहना हमेशा आसान नहीं होता, ख़ासकर जब सामने वाला दोस्त या रिश्तेदार हो।
यहाँ कुछ Tested & Verified तरीक़े हैं –
- मृदु मुस्कान और दृढ़ इंकार:
“भाई, पैसे तो हैं, लेकिन अभी बिज़नेस में इन्वेस्ट कर रखा है।”
यह वाक्य जादू की तरह काम करता है — आप इन्वेस्टेड भी दिखते हैं और इंकार भी हो जाता है। - उधारी का हवाला:
“यार, पिछली बार भी तूने नहीं लौटाया, अब मुश्किल है।”
यह सामने वाले को उसके कर्मों की डेली रिमाइंडर देता है। - सीधा और ईमानदार तरीका:
“मैं अब उधार देना बंद कर चुका हूँ, अच्छे रिश्ते खराब हो जाते हैं।”
यह सुनकर सामने वाला भावनात्मक कार्ड खेलेगा, पर अंदर से समझ जाएगा कि अब मैदान खाली है। - वॉलेट और UPI डिफेंस:
“अभी तो UPI नहीं चल रहा, इंटरनेट स्लो है।”
यह तकनीकी कारणों वाला झूठ समाज में स्वीकृत है।
क्यों पैसा शायद ही लौटता है
पैसा न लौटाने की कई वजहें होती हैं —
- उधारी लेने वाला खुद मानता है कि “यह फ्री का पैसा है”।
- समाज में उधारी वापस न करना बदनामी नहीं, बल्कि चालाकी का प्रतीक बन चुका है।
- उधारी अंतिम काम बन जाती है— क्योंकि लौटाने का वादा सिर्फ जरूरत के वक्त किया गया एक “डायलॉग” था, न कि “नीति”।
यही कारण है कि कई लोग कहते हैं — दोस्त से पैसे मत मांगो, वरना दोस्ती भी चली जाएगी और पैसे भी।
उधारी का सामाजिक प्रभाव
उधारी धीरे-धीरे रिश्तों को खोखला कर देती है।
पहले जो दोस्ती “चाय पर गपशप” से चलती थी, अब “पैसे कब लौटाएगा?” में बदल जाती है।
उधारी न केवल जेब का मामला है, यह भरोसे, इज्ज़त और छवि पर भी असर डालती है।
इलाकों में नाम पड़ जाते हैं — “अरे वो वही हैं जो पैसे लेके गायब हो गए थे!”
उधारी से दूर रहने का मंत्र
- रिश्ते संभालो, लेकिन खुद को एम.एम.टी. (मोबाइल मिनी टेक्स्टाइल) बैंक मत बनाओ।
- हमेशा याद रखो — उधार देने से पहले सोचो, क्योंकि उधार लौटाने वाला ज्यादातर सोचता नहीं।
- अगर फिर भी देना पड़े, तो उतना दो जितना खोने पर भी चैन रहे।
अंतिम विचार – जेब बचाओ, रिलीशनशिप नहीं
नए साल में बहुत लोग नए लक्ष्य तय करते हैं —
कुछ फिटनेस, कुछ फाइनेंस के।
तो एक लक्ष्य यह भी रखिए — “किसी उधारी जाल में नहीं फँसना।”
आपकी जेब भी खुश रहेगी, दिल भी हल्का रहेगा, और दोस्ती भी ज़िंदा।
क्योंकि आखिर में वही इंसान सुखी है जो जानता है —
“उधार से दूर रहना, सौ रुपये बचाने से बड़ा निवेश है!”









