2026 में भारत में पैसा कमाने के सच्चे बिज़नेस लेसन: अटेंशन, ब्रांडिंग और प्राइसिंग की पूरी गाइड

नीचे इस पॉडकास्ट पर आधारित लगभग 3000 शब्दों का आसान, बातचीत‑जैसा हिंदी आर्टिकल है, जो छोटे‑मोटे बिज़नेस ओनर्स और नए उद्यमियों के लिए लिखा गया है।


2026 में भारत में पैसा कमाने के असली बिज़नेस लेसन

भारत में बिज़नेस शुरू करना अब पहले से कहीं आसान हो गया है, लेकिन इसे सालों‑साल चलाना और उससे असली पैसा बनाना उतना ही मुश्किल हो गया है। सोशल मीडिया, एआई, स्टार्टअप्स, फंडिंग–इन सब के बीच एक छोटे या मिड‑साइज़ बिज़नेस ओनर के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है: “सही में पैसे कैसे बनाऊं?”

राज शमानी के पॉडकास्ट पर बिज़नेस कोच राजीव तलरेजा ने 2026 के लिए कुछ “ब्रूटल” लेकिन सच बिज़नेस लेसन शेयर किए। यह आर्टिकल उन्हीं लेसन को आसान भाषा में समझाने की कोशिश है ताकि आप अपने बिज़नेस में तुरंत इन्हें लागू कर सकें।


1. भारत की मार्केट 140 करोड़ नहीं, आपके टॉप 10 लाख कस्टमर हैं

हम सब सोचते हैं कि “इंडिया 140 करोड़ की मार्केट है, किसी को भी बेच देंगे, बहुत पैसा बन जाएगा।” सच इसके उल्टा है–जिन्हें आप असली में बेचकर अच्छा पैसा बना सकते हैं, वो टॉप 10 लाख लोग हैं जो आपकी कैटेगरी के लिए सही कस्टमर हैं।

राजीव एक सीधा फ्रेमवर्क देते हैं: सही कस्टमर = M.A.N.
यहाँ M.A.N. का मतलब है:

  • Money – जिसके पास पैसे हैं
  • Authority – जो खुद फैसला ले सकता है (किसी से पूछना न पड़े)
  • Need – जिसे सच में आपके प्रोडक्ट / सर्विस की जरूरत है

अगर आप ऐसे लोगों को टारगेट कर रहे हैं जिनके पास पैसा तो है, पर न जरूरत है, न निर्णय लेने की ताकत, तो आपका सेल्स साइकल लंबा, थकाने वाला और अक्सर फेल होने वाला होगा।

जिसे बेचोगे, उसकी problem आपकी problem बनेगी

राजीव एक बहुत जबरदस्त लाइन बोलते हैं:
“जिसको भी आप बेचोगे, उसकी problems आपकी problems बन जाएंगी।”

  • अगर आप गरीब या बहुत प्राइस‑सेंसिटिव कस्टमर को बेचते हैं, तो उनकी दिक्कतें – “महंगा है, अभी पैसे नहीं हैं, EMI कर दो, बाद में दे देंगे” – सब आपकी दिक्कत बन जाती हैं।
  • अगर आप अमीर, प्रीमियम सेगमेंट के कस्टमर को बेचते हैं, तो उनकी प्रॉब्लम्स – “सबसे प्रीमियम दीजिए, शो‑ऑफ वाला दीजिए, रेफरल दूंगा, प्राइस बढ़ा सकते हो” – आपके लिए ज्यादा फायदे वाली होती हैं।

इसका मतलब: सिर्फ “मार्केट बड़ी है” सोचकर सबको बेचने भागने से पहले ये तय करो कि आपको किस तरह के कस्टमर की problems अपनी जिंदगी में लानी हैं।


2. बेहतर कस्टमर कैसे चुनें: “गलत लोकेशन” वाला लहंगा बुटीक

एक फैशन डिज़ाइनर का केस स्टडी पॉडकास्ट में आया:

  • वो वेस्ट दिल्ली में वेडिंग लहंगे बनाती थी, टारगेट कस्टमर – होने वाली दुल्हनें।
  • उसके लहंगे 70–80 हज़ार के थे, लेकिन लोकेशन लोअर मिडिल क्लास एरिया थी, जहाँ लोगों की एवरेज इनकम कम थी, तो हर ग्राहक कहता: “बहुत महंगा है।”
  • चार साल तक ये सुन‑सुनकर उसका खुद पर से भरोसा उठ गया – उसे लगने लगा कि शायद उसका काम ही अच्छा नहीं है।

राजीव ने उससे एक ही काम कराया:

  • वेस्ट दिल्ली का बुटीक बंद करो
  • प्रीमियम लोकेशन में शिफ्ट हो जाओ
  • और वहाँ जाकर अपने प्राइस डबल कर दो

नतीजा: एक साल में उसने उतना पैसा कमा लिया, जितना उसने पिछले चार साल में मिलाकर भी नहीं कमाया था।

सीख:

  • गलत सेगमेंट को बेचोगे, तो उनकी “पैसे नहीं हैं” वाली प्रॉब्लम आपकी प्रॉब्लम बन जाएगी।
  • लोकेशन, कस्टमर की इनकम लेवल, उनकी spending capacity – सब समझकर अपना कस्टमर सेगमेंट चुनो।

3. Spend Threshold: आपके प्रोडक्ट पर ग्राहक कितना सोचे बिना खर्च करेगा?

बहुत से बिज़नेस ओनर अपने प्रोडक्ट पर तो फिदा होते हैं, लेकिन ये नहीं समझते कि कस्टमर की जिंदगी में आपके प्रोडक्ट की जगह कहाँ है।

इसे राजीव “Spend Threshold” कहते हैं – यानी किसी खास चीज़ पर कस्टमर कितनी रकम बिना बहुत सोचे खर्च कर सकता है।

उदाहरण – “Happiness Coach” वाला किस्सा:

  • एक हैप्पीनेस कोच शिकायत कर रहा था कि लोग पब में 2000 रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन 1500 रुपये के कोचिंग सेशन के लिए तैयार नहीं होते।
  • उसका टारगेट था – 50,000 से 1 लाख सैलरी वाले वर्किंग प्रोफेशनल।
  • जब उनकी लाइफ का खर्चा (रेंट, EMI, बच्चों की फीस, कार लोन, क्रेडिट कार्ड बिल, खाना, Netflix, Zomato आदि) कागज पर लिखा गया, तो दिखा – उनकी इनकम से ज्यादा खर्च है, वो क्रेडिट कार्ड पर जिंदगी चला रहे हैं।

अब ऐसे इंसान से हर महीने 6000 रुपये हैप्पीनेस कोचिंग के लिए मांगना practically नामुमकिन है – उनकी priority list में यह चीज़ दूर‑दूर तक नहीं है।

राजीव की सलाह:

  • ऐसे लोगों को टारगेट करो जिनके लिए 6000 या 60,000 रुपये उस कैटेगरी में देना बड़ी बात न हो – जैसे पॉलिटिशियन, सेलिब्रिटी, हाई‑नेटवर्थ फैमिली के मेंबर, जिन्हें असल में emotional support चाहिए और जो afford भी कर सकते हैं।

यही logic हर बिज़नेस पर लागू होता है – पहले सोचो कि जिस इंसान को आप बेच रहे हो, उसके महीने के खर्चों की लिस्ट में आपके प्रोडक्ट की जगह कहाँ है – टॉप 5 खर्चों में या “सोचेंगे भी नहीं” वाली लिस्ट में?


4. Digital Marketing Agency हो या कोई भी सर्विस – गलत साइज़ के क्लाइंट मत चुनो

आजकल हर दूसरा युवा सोचता है, “मुझे Instagram, YouTube चलाना आता है, मैं डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी खोल सकता हूँ।”
समस्या ये होती है कि ज़्यादातर एजेंसियाँ बहुत छोटे बिज़नेस को टारगेट करती हैं, जिनका महीना 8–10 लाख रेवेन्यू है, और उनसे 1 लाख रुपये रिटेनर मांगती हैं।

ऐसे बिज़नेस की प्राथमिकता क्या होती है?

  • पहले सैलरी
  • फिर दुकान का रेंट
  • फिर सप्लायर के पेमेंट
  • और थोड़ा जो बचे, वो घर ले जाना

इनके लिए 1 लाख रुपये मार्केटिंग पर खर्च करना बहुत बड़ा फैसला होता है, और वो 2–3 महीने में ही घबरा जाते हैं:
“इतना पैसा दे रहे हैं, अभी तक कितने कस्टमर आए?”

इसलिए:

  • अगर आप हाई‑टिकट सर्विस बेचते हो, तो टारगेट भी वही करो जिनका रेवेन्यू, प्रॉफिट और mindset उस खर्च को justify कर सके – जैसे 200 करोड़ टर्नओवर वाला मैन्युफैक्चरर जो बस पॉपुलर होना चाहता है।
  • जिनकी spending capacity से आपका fee match नहीं करता, उनके पीछे समय लगाना दोनों के लिए नुकसान है।

5. प्राइसिंग: आज प्राइस “कास्ट + प्रॉफिट” से नहीं, “कस्टमर कितना देने को तैयार है” से तय होती है

पुराना फॉर्मूला था: Cost Price + Profit = Selling Price.
राजीव कहते हैं – 2026 में यह फॉर्मूला practically मर चुका है।

आज का फॉर्मूला:

Customer की perceived value – जितना वो देने को तैयार है –
minus
आपका desired margin
= वो cost जिसमें आपको efficient होना है।

Perceived Value क्या है?

Perceived Value मतलब – कस्टमर के दिमाग में आपके प्रोडक्ट की कीमत कितनी “काबिल” लगती है, भले ही actual cost कुछ भी हो।

उदाहरण:

  • कोई दिलजीत दोसांझ के कॉन्सर्ट के टिकट के लिए 15,000 रुपये देने को तैयार है, जबकि वही गाने वह Spotify पर फ्री या सस्ते में सुन सकता है।
  • वो 15,000 सिर्फ गाना सुनने के लिए नहीं, experience, vibe, स्टोरी, स्टेटस, Instagram स्टोरीज – इन सब के लिए दे रहा है।

Perceived value बढ़ती कैसे है?

  • आपकी visibility और brand से – लोग आपको जानते हैं या नहीं।
  • आपके track record से – आपने किसके लिए क्या रिज़ल्ट दिए हैं।
  • आपकी “ना” कहने की क्षमता से – आप सबको नहीं लेते, सिर्फ उन्हीं के साथ काम करते हो जो आपकी वैल्यू पे करने को ready हैं।

यही वजह है कि कुछ लोग वही सर्विस 50,000 में बेचते हैं और कुछ 5 लाख में – क्योंकि उनकी perceived value और brand positioning अलग होती है।


6. “कितना मार्जिन अच्छा है?” – Trinity of Margin

हर बिज़नेस ओनर का common सवाल: “मेरे बिज़नेस में कितना प्रॉफिट मार्जिन ठीक है?”

किसी इंडस्ट्री की “औसत मार्जिन” कॉपी करने से पहले ये देखो कि आपका मार्जिन तीन काम पूरे कर पा रहा है या नहीं।

राजीव इसे कहते हैं – Trinity of Margin:

  1. बिज़नेस की ज़रूरत
    • वर्किंग कैपिटल – रोज का कैश फ्लो, स्टॉक, क्रेडिट साइकल संभालने का पैसा
    • Future investment – मशीनरी, नई ब्रांच, टेक, मार्केटिंग, टीम आदि के लिए रिजर्व
  2. टीम की ग्रोथ
    • सैलरी समय पर
    • increments / bonus / incentives
    • सीखने और आगे बढ़ने के मौके
  3. आपकी लाइफस्टाइल और पर्सनल wealth
    • सिर्फ रोटी, कपड़ा, मकान नहीं, थोड़ा enjoyment भी – घूमना, experiences
    • personal saving & investment – ताकि सिर्फ बिज़नेस पर निर्भर ना रहो।

अगर आपका मार्जिन इन तीनों को reasonably कवर कर पा रहा है, तो दूसरों से comparison करके परेशान होने की ज़रूरत नहीं – आपका मार्जिन आपके लिए अच्छा है।


7. Marketing: “हमारा धंधा तो word of mouth से चलता है” वाला जमाना गया

बहुत से established बिज़नेस ओनर कहते हैं:

  • “हम 15–20 साल से चल रहे हैं, हमें मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं, हमारा काम ही बोलता है।”
  • “हमारा पूरा बिज़नेस रेफरल और word of mouth पर चलता है।”

राजीव का साफ जवाब:

  • 1996 वाला जमाना गया, 2026 में हर इंडस्ट्री में इतना शोर है कि “केवल अच्छा काम” दिखता ही नहीं है।
  • अगर लोग आपको जानते ही नहीं, तो वे आपसे खरीदेंगे कैसे?

आज का रूल:

“Wherever attention goes, money flows.”

मतलब – जहाँ लोगों का ध्यान है (YouTube, Instagram, LinkedIn, Reels, Shorts), वहीं पैसा जाएगा।

Word of mouth अब बोनस है, स्ट्रेटजी नहीं

  • अगर आपका पूरा बिज़नेस सिर्फ word of mouth पर depend है और आप नए हो, तो आप बिज़नेस नहीं, जुआ खेल रहे हैं।
  • आप control नहीं कर सकते कि अगले महीने कितने रेफरल आएंगे, कितनी enquiry आएगी – तो predict भी नहीं कर सकते कि कितना रेवेन्यू आएगा।

इसीलिए:

  • हर बिज़नेस – B2B हो या B2C – को proactive और consistent marketing करनी ही पड़ेगी।
  • 2030 तक अगर आपके बिज़नेस में फुल‑टाइम कंटेंट/ब्रांडिंग टीम नहीं होगी, तो आपका बिज़नेस ही नहीं रहेगा – ये राजीव का बहुत strong statement है।

8. Educator, Entertainer या Storyteller – आप कौन सा अवतार चुनोगे?

हर बिज़नेस ओनर को आज के समय में किसी ना किसी रूप में कंटेंट क्रिएटर बनना ही होगा – चाहे YouTube, Instagram, LinkedIn, Shorts या Reels के ज़रिए।

राजीव कहते हैं – मार्केटिंग के तीन “अवतार” हैं:

  1. Educator – जो सिखाता है
    • Tips, how‑to, explainers, frameworks, mistakes to avoid
    • Example: डॉक्टर health tips दे, आर्किटेक्ट घर डिज़ाइन की practical advices दे
  2. Entertainer – जो मज़ेदार है
    • फनी कंटेंट, ट्रांज़िशन, creative visuals, memes, dramatic hooks
  3. Storyteller – जो अपनी और दूसरों की कहानियाँ बताता है
    • अपनी जर्नी, स्ट्रगल, क्लाइंट के stories, बिहाइंड‑द‑सीन, इंसानी angles

आपको ये देखना है कि:

  • आपकी natural ताकत किसमें है, और
  • आप किस स्किल को सीखने के लिए genuinely तैयार हो।

अगर आप 45 के हो गए हैं तो भी फर्क नहीं पड़ता – कल मरने थोड़ी वाले हो। सीखने की उम्र 20 या 25 पर नहीं रुकती।


9. Branding: “महेश, मुकेश और मंदीप” – चार कुर्सी, चार किस्म के बिज़नेस

फर्नीचर (ऑफिस चेयर) के example से राजीव चार तरह के बिज़नेस समझाते हैं:

  1. Freelancer / Mahesh – खुद ही असेंबली करता है, बिना कंपनी नाम, बिना ब्रांड, बस सस्ता देने की कोशिश, उसे अपनी सैलरी से थोड़ा ज्यादा मिल जाए यही बड़ी बात।
  2. Survivor / Mukesh – दुकान, वर्कशॉप, टीम, लोगो, वेबसाइट सब बना लिया, लेकिन product वही “जस्ट अनदर चेयर” है, कोई खास डिफरेंशिएटर नहीं, इसीलिए price war में फंसा है।
  3. Differentiator / Mandeep – वही चेयर, लेकिन कॉन्सेप्ट बदल दिया – “Body‑type के हिसाब से 20‑स्पोक ऑफिस फर्नीचर, health और productivity पर फोकस, एआई‑enabled ऐप से sizing।”
  4. Brand – जैसे Federlite जैसी established कंपनियाँ जिनका नाम सुनते ही purchase manager बोल देता है: “FDL से 100 चेयर ऑर्डर कर दो।” कस्टमर product नहीं, brand खरीदता है।

जो लोग सिर्फ “अच्छी क्वालिटी” और “कम प्राइस” पर लटके रहते हैं, उन्हें हमेशा मार्केट का कचरा हिस्सा मिलता है – सबसे कठिन कस्टमर, कम मार्जिन, high tension।
जो लोग डिफरेंशिएटर बनाते हैं और उसका सही तरीके से मार्केटिंग करते हैं, उन्हें क्रीम हिस्सा मिलता है – fewer clients, high margin, ज्यादा respect।


10. Sales Mindset: “रिजेक्टेड मिलियनेयर या रिस्पेक्टेड ब्रोक?”

सेल्स से ज़्यादातर लोगों को डर लगता है – वजह simple है:

  • “ना” सुनने से ego हर्ट होती है
  • रिजेक्शन के बाद हम 2–4 दिन शांत बैठ जाते हैं
  • अगला कॉल करते वक्त पहले से ही negative mindset होता है – “ये भी नहीं बोलेगा”

राजीव के मेंटर ने उन्हें एक powerful rule दिया:

“The richest person in the room is the person with the highest number of rejections.”

आप दो तरह के इंसान बन सकते हो:

  • या तो rejected मिलियनेयर / बिलियनेयर
  • या respected ब्रोक पर्सन

मोस्ट लोग “respected” बने रहना पसंद करते हैं, इसलिए कम बेचते हैं, कम फॉलो‑अप करते हैं, safe खेलते हैं।

पॉडकास्ट में राज शमानी बताते हैं कि:

  • जितने गेस्ट वो साल भर में शो पर बुलाते हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग उन्हें हर हफ्ते reject कर देते हैं – कोई reply नहीं करता, कोई block कर देता है, कोई बोलता है “next year” और वो फिर next year फॉलो‑अप करते हैं।

सेल्स का basic rule:

“Some will buy, some won’t, so what – who’s next?”

जितना ज्यादा आप रोज “ना” सुनने के लिए तैयार रहेंगे, उतनी ही जल्दी आपकी sales और income बढ़ेगी।


11. Boring काम ही असली पैसा बनाते हैं: Systems & Team Building

अधिकतर बिज़नेस ओनर्स को “धमाका” वाला काम अच्छा लगता है – नई मीटिंग, नए कस्टमर, खुद जाकर deal बंद करना, hero बनना।

लेकिन असली wealth बनाने वाला काम बहुत boring होता है, जैसे:

  • हर department के SOP (Standard Operating Procedure) बनाना
  • Process Manuals बनाना – marketing, sales, operations, accounts, collection, सबके लिए
  • Reporting templates डिजाइन करना, उनमें डेटा भरना
  • Team को hire, train, coach, feedback देना, accountable बनाना
  • Conflicts resolve करना, roles और responsibilities clear करना

ये सब काम थकाऊ, slow और non‑glamorous लगते हैं, इसलिए ज़्यादातर लोग इन्हें टालते हैं और खुद “मैं ही कर लूंगा” मोड में जीते रहते हैं।

Result:

  • बिज़नेस = आप खुद
  • आप बीमार पड़े या थक गए तो बिज़नेस भी रुक जाता है
  • सालों बाद भी आप बस “महिने का खर्चा” निकाल पा रहे होते हैं, wealth नहीं बनती

अगर आपका लक्ष्य सिर्फ income generation है, तो ये फ्रीलांसिंग है – इसे बिज़नेस मत बोलो।
अगर आपका लक्ष्य wealth creation और legacy है, तो आपको systems और team बनानी ही पड़ेगी, भले ही वो काम boring लगे।


12. Right Customers, Right People, Right Collaborations

राजीव बार‑बार एक बात पर आते हैं:

“जिसके साथ काम करोगे, उसकी problems तुम्हारी problems बनेंगी – चाहे वो ग्राहक हो, पार्टनर हो, या टीम मेंबर।”

इसलिए:

  • ऐसे clients चुनो जो आपकी value समझते हों और सिर्फ price पर न टिके हों।
  • ऐसे partners के साथ joint venture करो जहाँ शुरुआत में ही clear हो कि “मजदूर” कौन है – actual काम कौन करेगा।
  • ऐसे team members रखो जो growth चाहें; सिर्फ salary लेने वाले लोग लंबे समय में आपको थका देंगे।

अगर आप अपना ज़्यादातर समय गलत लोगों को मनाने, संभालने और justify करने में लगा रहे हैं, तो आप growth activities पर ध्यान दे ही नहीं पाओगे।


13. Knowledge नहीं, Action आपकी असली ताकत है

आज दुनिया में content की कोई कमी नहीं – हर दिन नए podcast, reels, course, किताब, newsletter निकल रहे हैं।

राजीव का आखिरी warning यही है:

  • अगर आप सिर्फ सुनते, पढ़ते, देखते रह गए और अपने बिज़नेस पर बैठकर ये नहीं चेक किया कि “इन 10–12 पॉइंट्स में से मैं क्या कर रहा हूँ, क्या नहीं”, तो ये knowledge आपके लिए cholesterol बन जाएगा – बस सिर भारी करेगा, काम कुछ नहीं आएगा।

आपको ये आर्टिकल पढ़कर ये करना है:

  • ईमानदारी से अपने बिज़नेस पर ये सवाल लगाओ:
    • क्या मैं सही M.A.N. कस्टमर को target कर रहा हूँ?
    • क्या मेरा product मेरे कस्टमर के spend threshold में आता है?
    • क्या मेरी pricing कस्टमर की perceived value पर based है?
    • क्या मेरा margin Trinity of Margin को पूरा कर रहा है?
    • क्या मैं marketing और content को serious ले रहा हूँ?
    • क्या मेरा कोई clear differentiator और brand positioning है?
    • क्या मैं sales में rejection झेलने के लिए तैयार हूँ?
    • क्या मैंने systems और team सच में बनाए हैं या सब मैं ही कर रहा हूँ?

जिस भी सवाल का जवाब “नहीं” है, वहीं से आपका अगले 12 महीनों का actual काम शुरू होता है।


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