नीचे दिया गया लेख लगभग 3000 शब्दों का है, आसान, बोलचाल की हिंदी में है और उसी मुद्दे पर आधारित है जिसके लिए आपने वीडियो भेजा है।[youtube]
भूमिका – हमारी सुंदरता, हमारा सच
आजकल लगभग हर लड़की और औरत रोज़ कोई ना कोई ब्यूटी प्रोडक्ट ज़रूर लगाती है – नेल पॉलिश, डिओ, क्रीम, शैम्पू, लिपस्टिक, फेयरनेस क्रीम वगैरह। बाहर से तो ये सब चीज़ें बहुत चमकदार और आकर्षक दिखती हैं, लेकिन अंदर क्या चल रहा है, ये ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता।[youtube]
Satvic Movement की इस वीडियो में बताया गया कि 70 से ज़्यादा महिलाओं के प्रोडक्ट की पड़ताल के बाद 7 ऐसी चीज़ें मिलीं जो धीरे–धीरे शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं और साथ ही उनके आसान, नेचुरल विकल्प भी बताए गए। इस लेख में हम उन्हीं 7 प्रोडक्ट्स को आसान भाषा में समझेंगे – क्यों ये नुकसानदेह हो सकते हैं, और इनके बदले हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या–क्या इस्तेमाल कर सकते हैं।youtube+1
1. नेल पॉलिश – छोटे बोतल में बड़ा खेल
नेल पॉलिश को हम अक्सर “सीधी–सादी” चीज़ मानते हैं। रंग अच्छा लगे, ब्रांड अच्छा हो, बस खरीद ली। लेकिन कई नेल पॉलिश के अंदर ऐसे केमिकल होते हैं जो शरीर के लिए ठीक नहीं माने जाते। रिसर्च में पाया गया कि बहुत सी नेल पॉलिश में टोल्यून, फॉर्मल्डिहाइड, डाइब्यूटिल फथैलेट जैसे केमिकल पाए जाते हैं, जो हार्मोन और फर्टिलिटी पर असर डाल सकते हैं।[youtube]
हमारा भ्रम यह है कि – “मैं तो इसे सिर्फ नाखून पर लगा रही हूं, खा तो नहीं रही।” लेकिन नाखून भी एक तरह से स्पंज जैसा होता है, जो चीज़ें अपने अंदर सोख लेता है। स्टडीज़ में यह दिखा कि नेल पेंट लगाने के कुछ घंटों के अंदर उसके केमिकल्स शरीर में जाकर यूरिन में भी पाए गए। खाने–पीने के समय वही परत थोड़ा–थोड़ा टूटकर खाने के साथ पेट में भी जा सकती है।[youtube]
क्या करें?
- कोशिश करें कि नेल पॉलिश का इस्तेमाल कम से कम करें, रोज़ाना लगाने की आदत छोड़ें।[youtube]
- अगर बहुत ज़रूरी हो (शादी, फंक्शन वगैरह) तो थोड़े समय के लिए लगाएँ, और बाद में अच्छी तरह हटाएँ।[youtube]
- धीरे–धीरे अपने नेल्स के नैचुरल रंग को स्वीकार करने की कोशिश करें। इस वीडियो में भी यही संदेश है कि वक्त के साथ आदत बदलना संभव है।[youtube]
एक आसान आदत ये हो सकती है कि महीने में सिर्फ 2–3 दिन ही नेल पॉलिश लगाएँ, बाक़ी दिन नाखून खुली हवा में रहने दें, ताकि केमिकल लोड कम हो।[youtube]
2. डिओडरेंट और एंटी–पर्सपिरेंट – पसीना रोकने की भारी कीमत
टीवी पर डिओडरेंट के विज्ञापन में दिखाया जाता है कि बस स्प्रे करो और दिन भर पसीना बंद, बदबू गायब, सब लोग इंप्रेस। लेकिन एंटी–पर्सपिरेंट कैसे काम करता है, ये rarely बताया जाता है। ज़्यादातर एंटी–पर्सपिरेंट में एल्युमिनियम कंपाउंड होते हैं जो पसीने की ग्रंथियों के मुहाने पर जमा होकर उन्हें बंद कर देते हैं।[youtube][youtube]
पसीना अपने साथ शरीर के अंदर बना हुआ कुछ वेस्ट और टॉक्सिन भी बाहर निकालता है। जब हम बार–बार पसीना रोकते हैं, तो ये वेस्ट सही से बाहर नहीं निकल पाता। वीडियो में समझाया गया कि इससे शरीर पर टॉक्सिक लोड बढ़ सकता है।[youtube]
इसका आसान, देसी विकल्प – फिटकरी (Alum Stone)
- फिटकरी एक प्राकृतिक पत्थर जैसा पदार्थ है, जो सदियों से इस्तेमाल हो रहा है।[store.satvicmovement][youtube]
- इसमें तेज़ एंटी–बैक्टीरियल गुण बताए जाते हैं; यानी जहाँ फिटकरी लगती है, वहां बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया कम हो सकते हैं।[youtube]
- इस्तेमाल का तरीका: नहाने के बाद फिटकरी को हल्का सा गीला करके हर बगल में 10–10 सेकंड घिस लें।[youtube]
- इससे पसीना बंद नहीं होता, बस बदबू कम हो सकती है – जो कि असल में हमें चाहिए भी यही।[youtube]
अगर आपको हल्की खुशबू भी पसंद है, तो नारियल तेल जैसे किसी बेस ऑइल में 1–2 बूंद लैवेंडर, रोज़, टी–ट्री या चंदन जैसे एसेंशियल ऑइल मिलाकर थोड़ा–सा लगा सकते हैं, लेकिन सीधे स्किन पर एसेंशियल ऑइल न लगाएँ।[youtube]
3. बॉडी सोप – सफाई के बहाने त्वचा की लूट
हम सबको सिखाया गया है कि “साफ–सफाई मतलब साबुन।” लेकिन ज़्यादातर मार्केट वाले साबुन में स्ट्रॉन्ग केमिकल सर्फेक्टेंट्स होते हैं, जो सिर्फ गंदगी नहीं, हमारी त्वचा के नैचुरल ऑइल भी हटा देते हैं।[store.satvicmovement][youtube]
त्वचा को आप एक ईंट की दीवार की तरह समझिए – ईंटें हैं स्किन सेल्स और उनके बीच का मसाला हैं नैचुरल ऑइल। तेज़ साबुन इस मसाले को घिस देता है, जिससे स्किन सूखी, खुरदुरी और इरिटेटेड होने लगती है। फिर हमें लगता है कि “क्रीम चाहिए, मॉइश्चराइज़र चाहिए”, और यहीं से नया खर्च शुरू हो जाता है।youtube+1
क्या सच में हर दिन साबुन ज़रूरी है?
- आम हालात में, सिर्फ पानी से नहाना भी काफी होता है, क्योंकि पानी खुद एक यूनिवर्सल सॉल्वेंट है और हल्की–फुल्की गंदगी हटा देता है।youtube+1
- जब ज़्यादा पसीना, धूल–मिट्टी या बहुत गंदगी हो, तब हफ्ते में कुछ दिन कोई हल्का हर्बल क्लेंज़र इस्तेमाल किया जा सकता है।[youtube]
प्राकृतिक बॉडी क्लेंज़र के 4 आसान विकल्प
वीडियो में चार देसी विकल्प बताए गए हैं, जो आसानी से घर पर बन सकते हैं या मिल जाते हैं।[youtube]
- बेसन (चने का आटा)
- एक कप चने को पीसकर पाउडर बना लें, बाथरूम में डिब्बे में रख दें।
- नहाते समय थोड़ा बेसन पानी में घोलकर पूरे शरीर पर मलें, हल्का स्क्रब जैसा असर मिलता है।[youtube]
- मुल्तानी मिट्टी
- ये नेचुरल क्ले है, जो रोम–छिद्रों की गंदगी और ऑयल सोख लेती है।
- इसे पानी में मिलाकर पेस्ट बनाकर शरीर या चेहरे पर लगाया जा सकता है, कुछ मिनट बाद धो लें।[youtube]
- साबुत हरी मूंग दाल पाउडर
- एक कप हरी मूंग दाल पीसकर रख लें।
- थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बनाएँ, चेहरे या शरीर पर हल्के हाथ से रगड़ें, इससे डेड स्किन निकलती है और स्किन मुलायम महसूस होती है।[youtube]
- चंदन पाउडर
- खास तौर पर चेहरे के लिए अच्छा माना गया है।
- ठंडक देता है, पिंपल वाली स्किन को शांत कर सकता है, और हल्की खुशबू भी देता है।[youtube]
अगर आपकी स्किन बहुत ड्राई है तो पानी की जगह थोड़ा नारियल तेल या तिल के तेल के साथ भी ये पाउडर मिलाकर लगा सकते हैं।[youtube]
4. केमिकल शैम्पू – रोज़ का फोम, रोज़ की कमजोरी
हम सबको लगता है कि जितना ज़्यादा झाग, उतना अच्छा शैम्पू। लेकिन झाग बनाने के लिए जो केमिकल डाले जाते हैं, वही अक्सर बालों के लिए सबसे ज़्यादा नुकसानदायक होते हैं।[youtube]
ज्यादातर कमर्शियल शैम्पू में सोडियम लॉरेथ सल्फेट (SLES) या सोडियम लॉरिल सल्फेट (SLS) होता है, जो मज़बूत डिटर्जेंट की तरह काम करता है। ये सिर की त्वचा के नैचुरल ऑइल निकाल देता है, जिससे बाल धीरे–धीरे रूखे, बेजान और कमजोर हो जाते हैं। फिर हमें कंडीशनर, सीरम, हेयर मास्क वगैरह बेचे जाते हैं, जो उसी समस्या को छुपाने की कोशिश करते हैं।youtube+1
साथ ही, कई शैम्पू में पैराबेन्स, सिंथेटिक फ्रेगरेंस जैसे और भी केमिकल होते हैं, जो स्कैल्प के ज़रिए शरीर में जा सकते हैं, क्योंकि सिर की त्वचा हाथ की तुलना में ज़्यादा सेंसिटिव और ज़्यादा शोषक मानी जाती है।[youtube]
“नेचुरल” लिखा हो तो भी सावधान
कई ब्रांड आगे से “हर्बल”, “नेचुरल”, “एलोवेरा वाला शैम्पू” लिख देते हैं, और पीछे की लिस्ट में वही पुराने केमिकल रहते हैं – इसे ग्रीनवॉशिंग कहा जाता है। थोड़ा–सा नेचुरल इंग्रेडिएंट डालकर पूरी बोतल को नेचुरल बता दिया जाता है।youtube+1
साफ़ विकल्प – 3 तरह के शैम्पू
वीडियो में तीन तरह के relatively साफ़ विकल्प सुझाए गए हैं।[store.satvicmovement][youtube]
- लिक्विड शैम्पू (क्लीन ब्रांड्स)
- टीम ने इंग्रेडिएंट लिस्ट पढ़कर और ट्राई करके कुछ ब्रांड चुने – जैसे Just Herbs, Rustic Art, Juicy Chemistry, Bon Organics जैसी कंपनियाँ, जो ज्यादा नेचुरल इंग्रेडिएंट्स पर ज़ोर देती हैं।satvicmovement+1
- पॉइंट ये है कि बोतल घुमाकर खुद इंग्रेडिएंट लिस्ट पढ़ने की आदत डालें – नाम जितने सिंपल और प्राकृतिक लगें, उतना बेहतर।
- शैम्पू बार
- साबुन जैसे ठोस बार, जिन्हें सिर पर रगड़कर झाग बनाया जाता है।
- प्लास्टिक बोतल की ज़रूरत नहीं, इसलिए पर्यावरण के लिए बेहतर; एक बार दो बोतलों जितना चल सकता है। Rustic Art और Shunyam जैसे ब्रांड्स ऐसे बार बनाते हैं।satvicmovement+1
- शैम्पू पाउडर (सबसे शुद्ध तरीका)
- आंवला, रीठा, शिकाकाई जैसे आयुर्वेदिक हर्ब्स को सुखाकर पाउडर बनाया जाता है।[youtube]
- घर पर भी बना सकते हैं, या Satvic जैसी जगहों से तैयार पाउडर भी लिया जा सकता है।satvicmovement+1
- थोड़ा पाउडर पानी में घोलकर पेस्ट बनाइए, स्कैल्प पर लगाइए, हल्का–सा मालिश कीजिए और धो लीजिए। इसमें झाग कम होगा, लेकिन सफाई अच्छी होगी।[youtube]
शुरू में कम झाग देखकर थोड़ी निराशा हो सकती है, लेकिन कुछ हफ्तों में महसूस होगा कि बाल हल्के, साफ और ज्यादा प्राकृतिक लग रहे हैं।[youtube]
5. केमिकल क्रीम, लोशन और मॉइश्चराइज़र – महक के पीछे छिपे राज
मार्केट में आज हर हिस्से के लिए अलग–अलग क्रीम मिलती है – फेस क्रीम, बॉडी लोशन, हैंड क्रीम, फुट क्रीम, रात की क्रीम, दिन की क्रीम, एंटी–एजिंग क्रीम, आदि। इनका कॉमन प्रॉब्लम ये है कि इन्हें लंबे समय तक स्टोर में रखा जा सके और लगाते ही “स्मूद” फील आए, इसके लिए ढेर सारे केमिकल्स डाले जाते हैं।youtube+1
इन क्रीम्स की असली गंध अच्छी नहीं होती, इसलिए कंपनियाँ इसमें अलग से सिंथेटिक फ्रेगरेंस, परफ्यूम या “Parfum” मिलाती हैं। ये खुशबू असली फूल, फल या जड़ी–बूटी से नहीं, बल्कि केमिकल से बनती है। कुछ रिसर्च में ऐसे केमिकल्स को हार्मोन बैलेंस, फर्टिलिटी और थायरॉइड पर असर डालने वाला माना गया है।[youtube]
आसान प्राकृतिक विकल्प – कोल्ड–प्रेस्ड तेल
क्रीम की जगह ठंडे तरीके से निकाले गए (कोल्ड–प्रेस्ड) तेल शरीर के लिए बेहतर माने जाते हैं, क्योंकि वे कम प्रोसेस्ड होते हैं और उनमें प्राकृतिक गुण ज़्यादा रहते हैं।[youtube]
- ड्राई स्किन के लिए: तिल का तेल, बादाम तेल, सरसों का तेल – नहाने के बाद हल्का–सा गीले शरीर पर लगाने से अच्छा मॉइश्चर मिल सकता है।[youtube]
- ऑयली या पिंपल वाली स्किन के लिए: जोजोबा ऑयल अच्छा विकल्प माना जाता है, क्योंकि ये स्किन के नैचुरल ऑयल जैसा होता है।[youtube]
- नॉर्मल स्किन के लिए: नारियल तेल, बादाम तेल या जोजोबा – जो भी शरीर को सूट करे, थोड़ा–सा लगाकर देख सकते हैं।[youtube]
इस तरह एक–दो अच्छे तेलों से पूरा शरीर संभल सकता है, अलग–अलग जगह की अलग–अलग क्रीम खरीदने की ज़रूरत नहीं रहती।[youtube]
6. लिपस्टिक – रोज़ थोड़ा–थोड़ा अंदर जाने वाला रंग
लिपस्टिक एक ऐसा मेकअप प्रोडक्ट है जिसे हम सिर्फ लगाते नहीं, थोड़ा–थोड़ा रोज़ निगल भी लेते हैं – खाना खाते, पानी पीते समय। कुछ साल पहले की रिसर्च में पाया गया कि चेक की गई लगभग 75% लिपस्टिक में लेड (सीसा) के अंश पाए गए।[youtube]
लेड एक भारी धातु है, जो ज़्यादा समय तक शरीर में जमा रहे तो स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं मानी जाती, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए। दिक्कत यह है कि लिपस्टिक की सही इन्ग्रेडिएंट लिस्ट हम अक्सर पढ़ते ही नहीं, बस रंग, ब्रांड और कीमत देखकर खरीद लेते हैं।[youtube]
घर पर नेचुरल लिपस्टिक बनाना इतना आसान क्यों नहीं?
बहुत लोगों ने कोशिश की है कि घर पर चुकंदर, हल्दी या दूसरी चीज़ों से लिपस्टिक बनाई जाए, लेकिन वीडियो में बताया गया कि प्रैक्टिकल रूप से एकदम परफेक्ट टेक्सचर, शेल्फ लाइफ और रंग पाना मुश्किल रहा। या तो जल्दी खराब हो जाती है, या अच्छा फिनिश नहीं आता।[youtube]
भरोसेमंद ब्रांड चुनना
फिलहाल सबसे आसान समाधान यही दिखाया गया कि कुछ ऐसे ब्रांड चुने जाएँ जो प्लांट–बेस्ड, क्लीन इन्ग्रेडिएंट्स से लिपस्टिक बनाते हैं और जिनकी पॉलिसी पारदर्शी हो। वीडियो में भारत के लिए Daughter Earth और Juicy Chemistry जैसे दो ब्रांड के नाम बताए गए, जो प्लांट–डिराइव्ड और क्रुएल्टी–फ्री लिपस्टिक बनाते हैं।[youtube][youtube]
आप चाहे जो भी ब्रांड चुनें, कोशिश करें कि:
- पूरी इन्ग्रेडिएंट लिस्ट पढ़ें।
- जहां बहुत ज़्यादा सिंथेटिक रंग और जटिल केमिकल नाम हों, उनसे दूरी रखें।
- रोज़–रोज़ लगाने की जगह खास अवसरों पर ही इस्तेमाल करें।
7. फेयरनेस क्रीम – शरीर से ज़्यादा, मन को चोट
फेयरनेस क्रीम या “स्किन–लाइटनिंग क्रीम” शायद सबसे संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि ये सिर्फ शरीर पर नहीं, आत्म–सम्मान पर भी असर डालती है। हमारे समाज में आज भी कई जगह गोरा रंग सुंदरता की पहचान माना जाता है – शादी के रिश्तों में, टीवी ऐड्स में, बातचीत में – हर जगह यह मैसेज बार–बार दिया जाता है कि “गोरे हो जाओ, तभी दुनिया तुम्हें नोटिस करेगी।”youtube+1
कई फेयरनेस प्रोडक्ट्स में ऐसे घटक पाए गए हैं जो स्किन की रंग बनाने वाली कोशिकाओं (मेलानिन बनाने वाली) पर सीधे हमला करते हैं। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी आया कि कुछ स्किन–व्हाइटनिंग प्रोडक्ट्स में मरकरी (पारा) का इस्तेमाल होता है, जो त्वचा के ज़रिए खून में जा सकता है और किडनी पर बुरा असर डाल सकता है।youtube+1
मरकरी मेलानिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाकर स्किन को हल्का दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन इसकी कीमत हमारे अंगों की सेहत से चुकानी पड़ सकती है।[youtube]
क्या कोई “नेचुरल फेयरनेस” उपाय है?
वीडियो का संदेश बहुत साफ़ है – असली हल “फेयर” होने में नहीं, सोच बदलने में है।[youtube]
- कोई भी क्रीम, पैक या नुस्खा जो “आपको गोरा बना देगा”, उस पर भरोसा करने से पहले सोचिए कि वह आपके शरीर के अंदर क्या कर रहा होगा।
- भगवान ने जो भी स्किन टोन दिया है – गेहुआँ, साँवला, डार्क, कोई भी – वही आपकी वास्तविक सुंदरता है।[youtube]
- फेयरनेस क्रीम बंद करना सिर्फ शरीर की सुरक्षा नहीं, खुद को स्वीकार करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।
हमारे शरीर को ज़रूरत है – साफ़ खाना, साफ़ जीवनशैली, सूरज की रोशनी से बचाव के लिए साधारण ध्यान (जैसे कैप, छाता, हल्का सन–प्रोटेक्टिव लेयर), लेकिन “रंग बदलने” की कोशिश से ज्यादा ज़रूरी है “खुद को अपनाना।”[youtube]
पुराने नुस्खे से “बॉक्स वाली” दुनिया तक – एक छोटी कहानी
वीडियो में एक दिलचस्प बात कही गई – पहले लोग हल्दी, चंदन, बेसन, दही जैसी चीज़ों से ही स्किन और बालों की देखभाल करते थे। ये सब हमारी ही रसोई में मिल जाती थीं, सस्ती थीं, और सालों–साल इस्तेमाल होती रहीं।youtube+1
जब कंपनियों ने देखा कि लोग इन चीज़ों से अच्छे रिज़ल्ट पा रहे हैं, तो उन्होंने इन्हीं चीज़ों को पैक करके बेचने का ख्याल बनाया। धीरे–धीरे हमने अपने घर की हल्दी, बेसन और चंदन को “गाँव वाला तरीका” कहकर छोड़ दिया, और बोतल–डिब्बे वाली चीज़ों को “मॉडर्न” और “एडवांस्ड” मान लिया।youtube+1
आज फिर से लोग समझ रहे हैं कि नेचुरल चीज़ें ज़्यादातर मामलों में ज़्यादा सुरक्षित और लंबे वक्त तक फायदेमंद होती हैं। फर्क बस इतना है कि पहले ये चीज़ें हमारी रसोई में मुफ्त मिलती थीं, अब वही चीज़ें पैक होकर महँगे दाम पर बाज़ार में लौट आई हैं।[store.satvicmovement][youtube]
धीरे–धीरे बदलाव कैसे शुरू करें? (छोटे–छोटे स्टेप्स)
एक साथ सबकुछ बदलना मुश्किल लगता है, इसलिए बेहतर है कि छोटे–छोटे कदमों से शुरुआत की जाए।[youtube]
आप इन आसान स्टेप्स से शुरू कर सकती हैं:
- सबसे पहले कौन–सा प्रोडक्ट छोड़ना आसान है, ये तय करें
- किसी को नेल पॉलिश छोड़ना आसान लगेगा, किसी को फेयरनेस क्रीम, किसी को डिओ।
- एक–एक करके बदलिए, ताकि शरीर और दिमाग दोनों को एडजस्ट करने का समय मिले।
- “इन्ग्रेडिएंट पढ़ने की आदत” डालें
- हर बोतल या डिब्बे को खरीदने से पहले घुमाकर देखें कि उसमें क्या–क्या लिखा है।
- जितने कम और जितने आसान, पहचान में आने वाले नाम हों, उतना अच्छा माना जा सकता है।
- घर की रसोई से शुरुआत
- नहाने के लिए हफ्ते में कुछ दिन बेसन या मूंग दाल पाउडर,
- फेस के लिए हफ्ते में 1–2 बार मुल्तानी मिट्टी या चंदन,
- बॉडी मॉइश्चराइज़िंग के लिए नारियल या तिल का तेल – ये सब बहुत सरल शुरुआत हैं।youtube+1
- मेकअप को रोज़ की ज़रूरत नहीं, “ऑकेज़न” बनाइए
- रोज़ाना फुल मेकअप की जगह, हफ्ते में 1–2 दिन या सिर्फ खास मौके पर ही करें।
- लिपस्टिक, भारी फाउंडेशन, आदि को कम–से–कम रखें।
- मन से जुड़ी बात – खुद को स्वीकार करना
- आईने में खुद को देखकर बार–बार अपनी कमियाँ ही ढूँढने की जगह, अपनी अच्छी बातों पर ध्यान दें।
- रंग से ज्यादा ज़रूरी है चेहरे की चमक, आँखों की चमक, और हेल्थ से आने वाली नैचुरल ग्लो।
निष्कर्ष – माँ प्रकृति पर भरोसा
इस पूरी चर्चा का मकसद ये नहीं कि आप डर जाएँ या एकदम से सब प्रोडक्ट्स फेंक दें, बल्कि इतना समझना है कि:
- हर चमकदार प्रोडक्ट हमारे लिए अच्छा हो, ज़रूरी नहीं।
- हमारे शरीर की ज़रूरतें ज़्यादातर नेचुरल चीज़ें आराम से पूरी कर सकती हैं।[store.satvicmovement][youtube]
- कंपनियों का काम प्रोडक्ट बेचकर मुनाफ़ा कमाना है, लेकिन हमारा काम है समझदारी से चुनना।
माँ प्रकृति ने हमारी स्किन, बाल और शरीर के लिए इतनी सारी चीज़ें पहले ही दे रखी हैं – अनाज, दाल, मिट्टी, तेल, जड़ी–बूटी – बस हमें थोड़ा भरोसा और थोड़ा धैर्य रखना है। जब हम धीरे–धीरे इन 7 तरह के केमिकल प्रोडक्ट्स से दूरी बनाना शुरू करेंगे, तो न सिर्फ हमारा शरीर हल्का लगेगा, बल्कि मन भी ज़्यादा आत्मविश्वास से भरा महसूस होगा।youtube+1







