क्यों SWP से कमाई रेंटल इनकम से बेहतर है ?


SWP क्या होता है?

SWP यानी Systematic Withdrawal Plan म्यूचुअल फंड से पैसे निकालने का एक प्लान है, जिसमें आप पहले एकमुश्त या बड़ी रकम म्यूचुअल फंड में लगाते हैं और फिर हर महीने/तिमाही/साल एक तय रकम अपने बैंक खाते में लेते रहते हैं।​

  • आपका पैसा फंड में लगा रहता है और उस पर रिटर्न भी बनता रहता है, साथ‑साथ आपको नियमित इनकम मिलती रहती है।​
  • यह रिटायरमेंट के बाद पेंशन जैसी रेगुलर सैलरी लेने का आसान तरीका बन जाता है।​

रेंटल इनकम क्या होती है?

रेंटल इनकम वह आय है जो आपको किसी प्रॉपर्टी (फ्लैट, प्लॉट, शॉप आदि) को किराए पर देकर मिलती है।​

  • इसके लिए आम तौर पर पहले करोड़ों तक की बड़ी रकम से प्रॉपर्टी खरीदनी पड़ती है।​
  • फिर हर महीने किराया आता है, लेकिन साथ में किरायेदार, मेंटेनेंस, सोसाइटी चार्ज, टैक्स, और खाली रहने का रिस्क भी रहता है।​

SWP बनाम किराया: मूल फर्क

नीचे सार में फर्क देखिए:

बिंदुSWP (म्यूचुअल फंड)रेंटल इनकम (प्रॉपर्टी)
शुरुआती पूंजीअपेक्षाकृत कम निवेश से भी शुरू हो सकता है, जैसे 30–50 लाख से नियमित इनकम संभव।​आमतौर पर 1–2 करोड़ या ज्यादा कीमत की प्रॉपर्टी खरीदनी पड़ती है।​
इनकम की स्थिरतासही फंड और सही दर पर SWP चलाएं तो लंबे समय तक स्थिर इनकम प्लान की जा सकती है।​किरायेदार बदल सकते हैं, खाली अवधि में एक पैसा नहीं आता, किराया लेट भी हो सकता है।​
मेंटेनेंस झंझटफंड की देखभाल फंड मैनेजर करता है, निवेशक को न्यूनतम झंझट।​रिपेयर, पेंट, सोसाइटी चार्ज, लीगल, किरायेदार की शिकायतें – सब संभालना पड़ता है।​
टैक्सज्यादातर केस में केवल कैपिटल गेन वाले हिस्से पर टैक्स; लंबे समय में दरें अपेक्षाकृत कम।​पूरा किराया “इन्कम फ्रॉम हाउस प्रॉपर्टी” के रूप में टैक्सेबल, डिडक्शन के बाद भी कई बार टैक्स बोझ अधिक।​
लिक्विडिटीजरूरत पड़ने पर कुछ या पूरा फंड जल्दी बेचा जा सकता है।​प्रॉपर्टी बेचने में महीनों लग सकते हैं, सही दाम भी न मिले।​
डाइवर्सिफिकेशनएक SWP में कई शेयर/बॉन्ड के जरिए जोखिम फैला होता है।​एक ही लोकेशन और एक ही प्रॉपर्टी पर पूरी पूंजी अटक जाती है।​

SWP, किराए से बेहतर क्यों लगने लगता है?

1. कम पूंजी में अच्छी इनकम

कई उदाहरणों में दिखाया गया है कि लगभग 50 लाख के अच्छे इक्विटी‑ओरिएंटेड फंड पोर्टफोलियो पर SWP से 50,000 रुपये के आसपास मासिक इनकम प्लान की जा सकती है, जबकि इतना ही किराया निकालने के लिए लगभग 2 करोड़ की प्रॉपर्टी चाहिए होती है।​

  • यानी समान इनकम के लिए प्रॉपर्टी की तुलना में लगभग चौथाई पूंजी में काम चल सकता है।​
  • बाकी पैसा आप दूसरे गोल्स या सेफ्टी फंड के लिए रख सकते हैं, जिससे फाइनेंशियल सुरक्षा बढ़ती है।​

2. पूंजी पर ग्रोथ जारी

SWP में आप सिर्फ एक हिस्सा निकालते हैं, बाकी पैसा फंड में लगा रहता है और मार्केट के साथ बढ़ भी सकता है।​

  • लंबे समय में अगर फंड का औसत रिटर्न SWP की निकासी से ज्यादा रहा तो आपका कॉर्पस भी बढ़ सकता है, जबकि आप हर महीने पैसे निकाल रहे हों।​
  • किराए में आमतौर पर प्रॉपर्टी की कीमत धीरे‑धीरे बढ़ती है, लेकिन किराया उतना तेज़ नहीं बढ़ता और मेंटेनेंस खर्च बढ़ते रहते हैं।​

3. टैक्स में फायदा

टैक्स का फर्क बहुत महत्वपूर्ण है:

  • SWP में हर निकासी को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है – आपका खुद का निवेश और उस पर बना मुनाफा (कैपिटल गेन)।​
  • टैक्स केवल मुनाफे वाले हिस्से पर लगता है, और यदि यह इक्विटी‑ओरिएंटेड फंड में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की कैटेगरी में आता है, तो एक लिमिट तक गेन टैक्स‑फ्री या कम टैक्स रेट पर हो सकता है।​

वहीं किराए में:

  • जो किराया मिलता है, वह मूल रूप से आपकी सालाना आय में जुड़ जाता है और उसी हिसाब से स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा, कुछ सीमित डिडक्शन के बाद।​
  • उच्च टैक्स स्लैब में आने वाले लोगों के लिए यह बोझ काफी बढ़ सकता है।​

4. झंझट कम, मन की शांति ज्यादा

रेंटल इनकम सुनने में आसान लगती है, लेकिन व्यवहार में कई दिक्कतें देती है।​

  • किरायेदार समय पर किराया न दें या निकलने से मना कर दें, तो कानूनी झंझट बढ़ जाते हैं।​
  • कई बार प्रॉपर्टी महीनों खाली रहती है, जिससे कोई इनकम नहीं आती, लेकिन सोसाइटी चार्ज, टैक्स, EMI, मेंटेनेंस फिर भी देना पड़ता है।​

SWP में:

  • न किरायेदार, न मकान की देखभाल, न लीगल टेंशन; बस फंड हाउस आपके सेट किए गए डेट पर आपके खाते में तय रकम भेज देता है।​
  • जरूरत हो तो SWP की राशि बढ़ा‑घटा या अस्थायी रूप से रोक भी सकते हैं, जो प्रॉपर्टी के किराए में संभव नहीं होता।​

5. लिक्विडिटी और इमरजेंसी में मदद

इमरजेंसी में सबसे बड़ा सवाल होता है – “पैसा कितनी जल्दी मिल जाएगा?”

  • म्यूचुअल फंड में, खासकर ओपन‑एंडेड स्कीम में, आप आम तौर पर 1–3 कार्यदिवस में पैसा अपने बैंक खाते में ले सकते हैं।​
  • आप जितना चाहिए उतना हिस्सा रिडीम कर सकते हैं, पूरा कॉर्पस बेचने की मजबूरी नहीं होती।​

प्रॉपर्टी में:

  • अगर अचानक बड़ी रकम चाहिए तो प्रॉपर्टी बेचना पड़ेगा, जो कई बार महीनों या साल तक भी बिक नहीं पाती या कम दाम पर बेचनी पड़ सकती है।​
  • आंशिक बेचने का विकल्प नहीं होता; या तो पूरी बेचें या नहीं बेचें।​

6. डाइवर्सिफिकेशन और रिस्क मैनेजमेंट

SWP आम तौर पर ऐसे म्यूचुअल फंड्स से चलता है जिनमें कई कंपनियों के शेयर/बॉन्ड शामिल होते हैं।​

  • अगर एक सेक्टर खराब प्रदर्शन करे तो दूसरा संभाल लेता है, यानी रिस्क बंट जाता है।​
  • आप चाहें तो इक्विटी, डेब्ट और बैलेंस्ड फंड में मिलाकर पोर्टफोलियो बना सकते हैं ताकि उतार‑चढ़ाव कुछ हद तक नियंत्रित रहे।​

रियल एस्टेट में:

  • आपका पूरा पैसा एक ही शहर, एक ही एरिया और एक ही प्रॉपर्टी में फंसा रहता है।​
  • उस एरिया में अगर डिमांड कम हो जाए, नया प्रोजेक्ट खुल जाए या लीगल/रेगुलेशन बदल जाए, तो पूरी इनकम पर असर पड़ जाता है।​

7. कौन‑किसके लिए SWP ज़्यादा बेहतर?

नीचे कुछ स्थितियाँ जहाँ SWP, किराए से ज़्यादा समझदारी वाला ऑप्शन बन सकता है:

  • जिनके पास 30–50 लाख या उससे अधिक की एकमुश्त रकम है और वह मासिक पेंशन जैसा इनकम सोर्स चाहते हैं।​
  • जिन्हें प्रॉपर्टी की झंझट, EMI, किरायेदार, रिपेयर आदि से बचना है और केवल सादा, प्लान्ड इनकम चाहिए।​
  • जो टैक्स के लिहाज से बेहतर प्लान बनाना चाहते हैं, खासकर हाई टैक्स स्लैब में।​
  • जो रिटायरमेंट के बाद “फ्रीडम” चाहते हैं, यानी बार‑बार किसी से बहस या दौड़‑भाग न करनी पड़े, बस अकाउंट में पैसे आते रहें।

8. ध्यान रखने वाली सीमाएँ

ऐसा नहीं है कि SWP में कोई रिस्क नहीं:

  • यह मार्केट‑लिंक्ड है, इसलिए इक्विटी फंड में गिरावट के समय कॉर्पस कुछ समय के लिए कम भी हो सकता है।​
  • अगर बहुत ज्यादा रेट से SWP निकासी रख दी, जैसे कॉर्पस छोटा और निकासी बहुत बड़ी, तो पैसा जल्दी खत्म होने का रिस्क भी रहता है।​

इसीलिए:

  • सही फंड चुनना, सही एसेट मिक्स रखना (इक्विटी + डेब्ट) और रिटायरमेंट प्लानिंग के हिसाब से SWP रेट तय करना ज़रूरी है।​
  • आम तौर पर सलाह दी जाती है कि औसत अपेक्षित रिटर्न से कम या बराबर रेट से SWP रखें, ताकि कॉर्पस लंबे समय तक चले।​

9. किस हाल में रेंटल इनकम ठीक हो सकती है?

कुछ परिस्थिति में रेंटल इनकम भी ठीक विकल्प हो सकती है:

  • अगर बहुत पुरानी प्रॉपर्टी है जो बिना EMI के है और अच्छा लोकेशन है, तो नेट रेंटल यील्ड संतोषजनक हो सकती है।​
  • कोई प्रॉपर्टी भावनात्मक या फैमिली कारणों से रखनी ही है, तो उससे किराया कमाकर कुछ हिस्सा SWP में भी लगाया जा सकता है ताकि डाइवर्सिफिकेशन हो.​

लेकिन सिर्फ इनकम के लिए नई प्रॉपर्टी खरीदने से पहले यह तुलना ज़रूर करनी चाहिए कि उतने ही पैसे से म्यूचुअल फंड + SWP में कितनी इनकम और कितनी शांति मिल सकती है।​


निचोड़ (संक्षेप में)

  • SWP: कम पूंजी में भी काम चल जाता है, टैक्स अपेक्षाकृत किफायती, झंझट बहुत कम, लिक्विडिटी अच्छी, रिस्क डाइवर्सिफाइड और पूंजी पर ग्रोथ की अच्छी संभावना।​
  • रेंटल इनकम: बड़ी पूंजी फँसी रहती है, मेंटेनेंस/किरायेदार/कानूनी झंझट, टैक्स बोझ और इनकम अनिश्चित (खाली अवधि, लेट पेमेंट आदि)।​

इसीलिए, आज के समय में बहुत से निवेशक नियमित आमदनी के लिए नई प्रॉपर्टी खरीदने के बजाय म्यूचुअल फंड SWP को ज़्यादा बेहतर, आसान और सुविधाजनक विकल्प मानने लगे हैं।​

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