भारत का सौर चमत्कार — उछाल या बुलबुला?

नीचे लेख “Solar boom or bubble? Inside India’s great renewable overbuild” सरल हिंदी संस्करण प्रस्तुत है। यह रूपांतर मूल अर्थ, संदर्भ और प्रमुख तथ्यों को बनाए रखते हुए आसान भाषा में लिखा गया है ताकि सामान्य पाठक इसे अच्छी तरह समझ सके।


भारत का सौर चमत्कार — उछाल या बुलबुला?

लगभग दस साल पहले, भारत की सौर ऊर्जा की कल्पना बहुत छोटी थी। उस समय पूरे देश में सिर्फ 4 गीगावॉट (GW) सौर क्षमता थी — इतनी कि शायद मुंबई का एक हिस्सा ही रोशन कर सकती। लेकिन आज, भारत के पास 123 गीगावॉट से अधिक सौर क्षमता है। यह इतनी बड़ी उपलब्धि है कि अब भारत दुनिया में सौर ऊर्जा उत्पादन के मामले में तीसरे नंबर पर है — चीन और अमेरिका के बाद।

यह एक ऐसी कहानी है जो किसी फिल्म की तरह लगती है — एक कमजोर शुरुआत जिसने एक विशाल सफलता की शक्ल ले ली। लेकिन इस चमक के पीछे एक जटिल औद्योगिक कहानी भी है — “उछाल” और “जोखिम” दोनों की।


तेज़ी से बढ़ता सौर क्षेत्र

सरकार की नीतियों और निजी निवेश ने सौर ऊर्जा को बहुत आगे बढ़ाया। प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा और उत्थान महाभियान (कुसुम योजना), उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI योजना) और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए सब्सिडी जैसी योजनाओं ने इस बढ़ोतरी में बड़ी भूमिका निभाई।

देश के हर राज्य में अब सौर ऊर्जा पार्क या परियोजनाएँ चल रही हैं। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु सौर ऊर्जा के हब बन चुके हैं क्योंकि वहाँ सूरज की रोशनी और खुली जमीन दोनों प्रचुर मात्रा में हैं।


उद्योग का बदला परिदृश्य

सौर पैनल बनाने वाले उद्योग में पहले चीन का एकाधिकार था। लेकिन अब भारत ने भी अपना घरेलू उत्पादन बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले सौर परियोजनाओं के लिए अधिकांश पैनल चीन से आयात किए जाते थे, पर अब “मेक इन इंडिया” के तहत कई भारतीय कंपनियाँ भी पैनल और मॉड्यूल बना रही हैं।

अदाणी, रिलायंस और टाटा जैसी बड़ी कंपनियाँ सौर उपकरण निर्माण में उतर चुकी हैं और अरबों रुपये के निवेश कर रही हैं। इससे रोजगार और तकनीकी आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ी हैं।


क्या यह बढ़त स्थाई है?

यही सबसे बड़ा सवाल है। कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भारत में सौर क्षमता बहुत तेज़ी से बढ़ रही है — लेकिन बिजली वितरण और मांग के स्तर पर उतनी तैयारी नहीं हुई है। कई सौर संयंत्र ऐसे इलाकों में हैं जहाँ बिजली की मांग ज्यादा नहीं है, या वितरण के लिए आवश्यक ट्रांसमिशन नेटवर्क नहीं।

इसका मतलब है कि बड़ी मात्रा में उत्पादित सौर बिजली कभी-कभी उपयोग नहीं हो पाती। उद्योग जगत इसे “ओवरबिल्डिंग” या “अति-निर्माण” कहता है। यानी, हमने जितना ढांचा बना लिया, उतने की अभी आवश्यकता नहीं है।


बिजली वितरण की चुनौती

सौर ऊर्जा का एक मुख्य गुण – और समस्या – यह है कि यह दिन के समय ही मिलती है। जब सूरज नहीं होता, तब उत्पादन शून्य हो जाता है। इसलिए, यदि ऊर्जा का भंडारण (स्टोरेज) मजबूत न हो, तो बिजली की आपूर्ति अस्थिर हो सकती है।

भारत में अभी बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Battery Energy Storage System – BESS) सीमित है। सरकार ने इसे बढ़ाने के लिए 2024 में कई नई नीतियाँ पेश कीं, लेकिन अभी भी लागत बहुत अधिक है। यदि यह समस्या हल नहीं होती, तो सौर बिजली उतनी कारगर नहीं रह पाएगी।


भविष्य की नीतियाँ और लक्ष्य

भारत ने 2070 तक “नेट-ज़ीरो उत्सर्जन” का लक्ष्य रखा है। इसके लिए देश को आने वाले दशकों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करनी होगी और नवीकरणीय (renewable) ऊर्जा को प्राथमिकता देनी होगी।

सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा 50% से अधिक हो। इसके लिए 500 गीगावॉट क्षमता तक पहुँचने की योजना बनाई गई है, जिसमें सौर ऊर्जा सबसे बड़ी भूमिका निभाएगी।


वित्तीय और निवेश चुनौतियाँ

हालांकि सौर उद्योग के लिए नीतियाँ अनुकूल हैं, लेकिन निवेशकों की चिंता बढ़ रही है। कुछ परियोजनाएँ बहुत कम कीमतों पर निविदा (बिड) जीत लेती हैं, जिससे बाद में उन्हें आर्थिक नुकसान होता है। बिजली वितरण कंपनियाँ (DISCOMs) भी समय पर भुगतान नहीं करतीं, जिससे नकदी प्रवाह प्रभावित होता है।

विदेशी निवेशकों का समर्थन अब भी जारी है, खासकर जापान, सिंगापुर और यूरोपीय फंडों से। लेकिन वे भी सतर्क हो रहे हैं कि कहीं यह “सौर बुलबुला” फट न जाए।


स्थानीय समुदायों का प्रभाव

सौर परियोजनाओं ने कई ग्रामीण इलाकों में नए अवसर पैदा किए हैं। किसानों को अपनी बंजर जमीन किराए पर देने का मौका मिला है। कई इलाकों में रोजगार सृजन भी बढ़ा है। लेकिन साथ ही कुछ चिंता के स्वर भी हैं – जैसे भूमि अधिग्रहण, जल संसाधनों का उपयोग और पारिस्थितिकीय प्रभाव।

इसलिए, विशेषज्ञ अब “संतुलित विकास” की बात कर रहे हैं — जहाँ सौर उन्नति हो, लेकिन सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियाँ भी निभाई जाएँ।


अति-निर्माण का खतरा

“ओवरबिल्डिंग” की स्थिति में, कई सौर संयंत्र निष्क्रिय पड़े रहते हैं या पूरे समय उत्पादन नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, राजस्थान के कुछ हिस्सों में दिन के समय बिजली की आपूर्ति इतनी अधिक हो जाती है कि ग्रिड को बंद करना पड़ता है।

यदि मांग और उत्पादन में यह असंतुलन बढ़ता गया, तो निवेशकों को नुकसान और प्रणालीगत अस्थिरता दोनों का खतरा रहेगा।


क्या ऊर्जा संक्रमण सफल होगा?

भारत के ऊर्जा संक्रमण (energy transition) की राह आसान नहीं है, पर संभावनाएँ बहुत व्यापक हैं। यदि ग्रिड इन्फ्रास्ट्रक्चर, भंडारण तकनीक और मांग प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सुधार होता है, तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा हरित ऊर्जा उत्पादक बन सकता है।

इस संक्रमण से न केवल ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन और ईंधन आयात में भी भारी कमी आएगी।


निष्कर्ष

भारत का सौर उछाल निश्चित रूप से ऐतिहासिक है। यह सफलता मानव परिश्रम, नीतिगत दूरदर्शिता और तकनीकी नवाचार की मिसाल है। लेकिन अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने का यह अभियान टिकाऊ बनाना है, तो योजनाओं को संतुलित और व्यवहारिक दिशा देनी होगी।

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह “बूम” है या “बबल” — लेकिन इतना तय है कि भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि सीमित संसाधनों में भी ऊर्जा क्रांति संभव है।


यह लेख लगभग “Solar Boom or Bubble?” का आसान हिंदी सारांश देता है जो भारत के सौर उछाल, उसकी चुनौतियों और भविष्य की दिशा को संतुलित दृष्टि से समझाता है।

  1. https://economictimes.indiatimes.com/prime/energy/solar-boom-or-bubble-inside-indias-great-renewable-overbuild/primearticleshow/124576462.cms

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