क्या घर में जो पूजा-पाठ करते हैं, उसे भी लोगों से छुपाना चाहिए?

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के प्रवचन — विषय: “क्या घर में जो पूजा-पाठ करते हैं, उसे भी लोगों से छुपाना चाहिए?”

भूमिका
प्रश्नकर्ता ने महाराज जी से पूछा: “क्या घर में जो पूजा-पाठ करते हैं, उसे भी लोगों से छुपाना चाहिए? अब दैनिक जीवन की साधना आपके मार्गदर्शन में हो रही है, तो इसे अपने प्रियजनों से अप्रकाशित कैसे रखें?”

महाराज जी का उत्तर अत्यंत संतुलित एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भरा हुआ है। पूरी वार्ता के शब्द, भाव, और अर्थ को विस्तार से प्रस्तुत किया जा रहा है:


1. पूजा-पाठ का छुपाना या प्रदर्शित करना — सही अर्थ

  • मूल विचार:
    महाराज जी सबसे पहले स्पष्ट करते हैं कि “अप्रकाशित” का अर्थ छुपाना नहीं है। यदि आप सुबह से भगवान की सेवा, मंगला आरती, पाठ, जप, भजन आदि में लगे हैं और आसपास के लोग — घरवाले, पड़ोसी या रिश्तेदार — ये देख लेते हैं, तो उसमें किसी प्रकार की चिंता या विचार नहीं करना चाहिए।
    उन्होंने कहा — “कोई देख रहा है तो कोई फर्क नहीं पड़ता।”
    यानी कि अगर आपके साधना, पूजा या सेवा का सामान्य प्रदर्शन हो जाए, तो यह चिंता का विषय नहीं है।
  • दूसरा पक्ष:
    जो बात नहीं करना चाहिए, वह है:
    अपनी साधना का अहंकारिपूर्ण प्रदर्शन।
    “अगर हम चर्चा करें, तो बहुत सावधानी रखनी चाहिए कि उसमें अहंकार ना आए,” महाराज जी कहते हैं।
    जैसे — “सुबह से मेरी मंगला आठों पहर चल रही है, बड़ा आनंद आता है, इतने माला जप कर ली, अष्ट प्रहर सेवा कर ली…” इस प्रकार की व्यक्तिगत साधना की बातें अहंकारभाव से नहीं साझा करनी चाहिए।
    यह दिखावटीपन बन जाता है, जिसे महाराज जी मना करते हैं।

2. सेवा एवं साधना का प्रचार या अहंकार

  • विशिष्ट निर्देश:
    महाराज जी कहते हैं कि — “यह अहंकारभर के अपनी सेवा का प्रदर्शन, अपने भजन की बातें, यह नहीं बताई जाती।”
    अगर कभी प्रसंगवश बताना भी पड़े — तो “किसी संत अथवा साधक की आड़ लेते हुए बताना चाहिए।”
    जैसे — “ऐसा एक साधक मिला था, जो आठों पहर श्रीजी की सेवा करता था। उसे अष्ट प्रहर की सेवा का सब अनुभव होता था। या कोई साधक इतने माला जप करता था और उसे अमुक अनुभव हुआ।”
    इसका लाभ यह होता है कि आपको अनुभव साझा करने का अवसर भी मिलता है, किंतु आपका अहंकार पुष्ट नहीं होता।

3. साधना एवं अनुभूति को कैसे प्रकाशित करें?

  • साधना को ओपन न करें:
    महाराज जी ने स्पष्ट कहा — “हम अपनी साधना ओपन ना करें पूरी तरह।”
    यानी पूरी विवरण के साथ, विस्तारपूर्वक अपने जप, सेवाएं, पाठ, भजन, आरती को फैलाना— ये न करें।
    अगर घर के लोग, रिश्तेदार, पड़ोसी देख रहे हैं— “कोई बात नहीं। परंतु अपने मुख से विस्तारपूर्वक वर्णन न करना।”
    कोई चोरी से देख ले, सुन ले, तो वह अच्छाई है — महाराज जी ने यह शब्द ‘चोरी थ’ में कहा।

4. क्या ‘दिखावटी’ साधना ठीक है?

  • निष्कर्ष:
    महाराज जी बार-बार कहते हैं:
  • अपने अनुभव नहीं बताने
  • अपनी साधना नहीं बतानी
  • “कोई देख ले, तो कोई परेशानी नहीं।”

इसका सीधा अर्थ है कि आपको साधना छुपानी नहीं है, सिर्फ अहंकार या प्रदर्शन से बचना है।
अगर कोई देखता है तो उसमें कोई दोष नहीं है, बल्कि अगर कोई बिना बताये देख ले, तो उसकी शुभता और अधिक है।


5. साधना का प्रदर्शन और जीवन में उसका स्थान

  • घर में, परिवर में, समाज में — पूजा-पाठ, जप-तप, भजन, आरती जीवन का सहज भाग होना चाहिए।
  • यदि आपके ईश्वर-कार्य को लोग नोटिस करते हैं, तो भी आप सहज रहें — लेकिन अहंकार, प्रदर्शन, अपने भजन/सेवा/पाठ/जप को ‘बढ़ा-चढ़ा’ कर, ‘मैं ही विशेष हूँ’ भावना से कभी साझा न करें।
  • किसी को बताना हो, तो “संत के अनुभव”, “साधक के उदाहरण” को माध्यम बनाये।

6. अनुभव साझा करने का सही तरीका

  • सुझाव:
    यदि कभी अनुभव साझा करना ज़रूरी हो जाये (किसी के प्रेरणा के लिए) तो —
  • हमेशा किसी अन्य साधक, संत, महानुभाव, गुरुजन का अनुभव, प्रसंग या उदाहरण देकर बात करें।
    ताकि आपके व्यक्तित्व में विनम्रता, अहंकारहीनता, और प्रेरणा का भाव रहे।

7. अहंकार और साधना का संबंध

महाराज जी कहते हैं:

  • “हम अपनी साधना, भजन के अनुभव ना बताएं।”
  • “हम कह रहे हैं-हम पद गायन कर रहे हैं — कोई सुन रहा है, तो कोई बात नहीं। लेकिन हमें नहीं कहना कि मैं दो घंटे पद गायन करता हूँ — ये छुपा।”
  • “कुछ भी प्रशंसा या तुलना के भाव से न बोले — जैसे ‘मैं इतना पाठ करता हूँ, वह नहीं करता’, ‘मैं इतने माला जप करता हूँ।’”

8. भागवती सेवा के दैनिकचक्र

  • “हमारी जो भागवती सेवाएं घर में चल रही हैं वो तो देखेंगे ही लोग — परिवारवाले, रिश्तेदार, पड़ोसी।”
  • “लेकिन हमें अपने मुख से उसका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं करना।”

9. चोरी से देखना — शुभता का संकेत

  • “कोई देख ले, कोई सुन ले, तो कोई चोरी थ अच्छी बात है।”
  • इससे अभिप्रेत है कि आपकी पूजा, साधना, जप-तप की खबर बिना आपके कहे फैल जाये तो उसमें कोई दोष नहीं है — बल्कि यह आपकी वास्तविकता का प्रमाण है, न कि प्रचार का।

10. सारांश

महाराज जी मूलतः तीन बातें पुष्ट करते हैं:

  1. पूजा-पाठ, सेवा या साधना समाज या परिवार से ‘छुपाने’ का अर्थ छिपाव नहीं है, बल्कि अहंकार व प्रदर्शन से दूर रहना है।
  2. अगर कोई देखता है, सुनता है, उसे बताने की जरूरत नहीं है — चाहे वो पड़ोसी हो, रिश्तेदार हो।
  3. अपनी साधना व सेवा का बखान, तारीफ, या ‘मैं-केंद्रित’ भावना से चर्चा न करें।
  4. कोई आपसे प्रेरित हो, तो किसी महानुभाव या अपने गुरुजन, संत, साधक का प्रसंग देकर मार्गदर्शन करें — स्वयं को केंद्र में रखकर न बोलें।

अंतिम निष्कर्ष:

  • वास्तविक साधना में बहाव होना चाहिए, न कि प्रचार।
  • ईश्वर सेवा/साधना हर दिन और सहज रूप में हो, लेकिन प्रचारभाव से — जहां अपनी विशिष्टता, श्रेष्ठता, या अहंकार पुष्ट होता हो — बचना परम आवश्यक है।
  • छुपाना नहीं, बल्कि अहंकार और प्रदर्शन से बचना — यही सही तरीका है।
  • यदि साधना समाज या परिवार में दिख जाती है, तो कोई दोष नहीं।
  • “चोरी थ अच्छी बात है।” — बिना कहे आपके भक्तिव्यवहार का प्रभाव अगर फैल जाये तो उसमें शुभता है।

नोट:
इस प्रवचन की पूरी बातों को अपने जीवन में अपनाते हुए— पूजा, पाठ, साधना, सेवा, जप-तप — सब सहज रहें; और मुख से प्रसार-प्रदर्शन-तुलना से बचें।


चरणबद्ध, शब्दशः विस्तार — सर्वांगीण विश्लेषण:
यदि आप इसी भावना में अपने स्थायी साधना-पथ बनाना चाहते हैं —

  • प्रतिदिन की सेवा को कर्म मानिए, अहंकार न आने दें
  • साधना में गहराई हो, प्रचार न हो
  • परिवार के सदस्य, पड़ोसी, रिश्तेदार — यदि देख लें — तो उनको प्रेरणा मिले, लेकिन आप स्वयं कभी साधना का विवरण देकर सूची न बनाएं
  • कभी तुलना न करें कि ‘मैं इतना पाठ करता हूँ, वो इतना नहीं करता’
  • साधना का सही अनुभव — संतों की वाणी, साधकों की कथा, गुरु के प्रसंग — इन्हें ही आगे बढ़ाकर व्यक्तिगत अहंकार को रोकें
  • ‘भगवत सेवा, चाहे घर में हो, चाहे बाहर’ — इसका प्रचार नहीं, व्यावहारिकता और सहजता सही है
  • अपने कार्य, सेवा, साधना का वितरण विनम्रता से, उदाहरण या प्रेरणा से करें — अहंकार, प्रदर्शन, व्यक्तिगत श्रेष्ठता की भावना से बचें

समग्र अर्थ यही है — घर में पूजा-पाठ करते समय, चाहे कोई देखे, सुने, आपकी साधना का प्रभाव पाये — आप स्वयं बिलकुल सहज बने रहें। अपनी सेवा का विस्तार, अखबार, चर्चा न करें। यदि कोई चोरी से देख ले, सुने — वह उसकी शुभता है।
यही संत महाराज जी के वचनों का संपूर्ण, शब्दशः विश्लेषण और ‘छुपाने’ और ‘प्रदर्शन’ के सही अर्थ का विस्तार है।

  1. https://www.youtube.com/watch?v=WElOW0SuBMk

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