बच्चों को ईसाई-स्कूलों में शिक्षा दिलानी चाहिये या नहीं ? (EN)

प्रश्न- बच्चों को ईसाई-स्कूलों में शिक्षा दिलानी चाहिये या नहीं ?

उत्तर- ईसाई-स्कूलोंमें बच्चोंको पढ़ाओगे तो वे घरमें रह हुए भी ईसाई बन जायँगे अर्थात् आपके बच्चे ऊपरसे हिन्दू भीतरसे ईसाई बन जायँगे। यह बड़ी शर्मकी बात है कि हज मील दूर रहनेवाले यहाँ आकर आपके बच्चोंको ईसाई बना हैं और आप अपने घरके बच्चोंको भी हिन्दू बनाये नहीं सकते ! बच्चे आपके देशकी खास सम्पत्ति हैं, उनकी रक्षा करो.

बड़े आदमियोंको चाहिये कि वे निजी स्कूल, कालेज बन जिनमें अच्छा अनुशासन हो और बच्चोंको अच्छी शिक्षा दे व्यवस्था हो। पढ़ानेवाले शिक्षकोंके आचरण भी अच्छे हों। य अच्छे आचरणवाले शिक्षक मिलने कठिन हैं, तथापि उद्योग किया जाय तो मिल सकते हैं। ऐसे स्कूल-कालेजोंमें अपने धर्मकी और गीता, रामायण आदि ग्रन्थोंकी शिक्षा भी बच्चोंको दी जानी चाहिये। धार्मिक शिक्षाके लिये एक घण्टा तो अनिवार्य रखना ही चाहिये।

आप स्वयं भी सादगी रखें और बच्चोंको भी सादगी सिखायें। आप स्वाद-शौकीनी, ऐश-आरामका त्याग करें और अच्छे-से-अच्छे काममें लगे रहें तो इसका बच्चोंपर भी अच्छा असर पड़ेगा। घरमें भगवान्‌का मन्दिर हो, भगवान्‌का पूजन हो। भगवान्‌का चरणामृत छोटे-बड़े सभी लें। घरमें भगवत्सम्बन्धी चर्चा हो, भगवन्नाम-कीर्तन हो, अच्छे-अच्छे पदोंका गान हो। आप जितने अच्छे बनोगे, बच्चे भी उतने ही अच्छे बनेंगे। वचनोंकी अपेक्षा आचरणोंका असर ज्यादा पड़ता है।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुख जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

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