पूरे satsang में संत‑भगवान ने महाराज जी से जो मुख्य प्रश्न किया, वह जन्म‑सूतक, मृत्यु‑सूतक और मासिक धर्म आदि के समय ठाकुरजी की सेवा‑पूजा कैसे करें / करें भी या नहीं, इस विषय पर था।
नीचे पूरी बात बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सबकी समझ की सरल भाषा में, बिंदुवार और विस्तार से लिखी जा रही है।[youtube]
संत‑भगवान का प्रश्न क्या था?
- संत‑भगवान ने कहा कि जो गृहस्थ परिवार में ठाकुरजी (घर के देवता/विग्रह/चित्र) की नियमित सेवा‑पूजा करते हैं, वे बार‑बार फोन करके पूछते हैं –
“जन्म सूतक, मृत्यु सूतक या घर में किसी के देहांत आदि के समय ठाकुरजी की सेवा करें या रोक दें, क्या करें, क्या न करें, समझ नहीं आता।” - इसी उलझन को साफ‑साफ जानने के लिए उन्होंने पूज्य महाराज जी से सीधे प्रश्न किया कि सूतक आदि के बारे में शास्त्र की क्या मर्यादा है और व्यावहारिक रूप से क्या करना चाहिए?
महाराज जी का सीधा सिद्धांत
- महाराज जी ने सबसे पहले एक शास्त्र वचन को आधार बताया –
“तस्मात् शास्त्र प्रमाणं ते, कार्य‑अकार्य व्यवस्थितम् मानना चाहिए।” यानी किसी काम को करना है या नहीं करना, यह शास्त्र से पूछकर तय करना चाहिए।[youtube] - फिर महाराज जी ने साफ कहा कि सनातन धर्म की गृहस्थ‑मर्यादा में “जन्म सूतक” और “मरण सूतक” को माना गया है, यह कोई कल्पना नहीं, शास्त्रीय नियम हैं।[youtube]
सरल भाषा में:
भगवान की भक्ति करते हुए भी गृहस्थ‑धर्म की शास्त्रीय मर्यादाएं माननी चाहिए, उन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए।[youtube]
सूतक का सरल अर्थ क्या है?
- जन्म सूतक: घर में किसी बच्चे का जन्म होना। कुछ दिनों तक घर को अशौच (अशुद्ध) माना जाता है, इसलिए कुछ धार्मिक कार्य सीमित या रोके जाते हैं।[youtube]
- मरण सूतक: घर में किसी सदस्य का देहांत हो जाए तो भी कुछ दिन तक विशेष सावधानी रखी जाती है, शास्त्र इसे भी अशौच की अवधि मानते हैं।[youtube]
- महाराज जी ने कहा कि सनातन धर्म की गृहस्थ‑मर्यादा में जन्म सूतक और मरण सूतक को मानना चाहिए – यानी यह परंपरा यूँ ही नहीं बनी, शास्त्र से चली आ रही है।[youtube]
गृहस्थ और विरक्त – दोनों के लिए नियम अलग
- महाराज जी ने साफ कहा कि जो विरक्त साधु हैं, जो घर‑गृहस्थी से अलग होकर केवल भगवान की सेवा में लगे हैं, उनके लिए ये सूतक‑नियम वैसे नहीं चलते; वे तो “रातों‑दिन भगवान की सेवा” में रहते हैं।[youtube]
- लेकिन गृहस्थ‑धर्म की बात अलग है; जो परिवार, नौकरी, रिश्ते, संसार सब निभा रहे हैं, उन पर सनातन धर्म की मर्यादा लागू होती है, उन्हें जन्म‑सूतक, मरण‑सूतक, मासिक धर्म आदि के नियम मानने ही चाहिए।[youtube]
सरल समझ:
संत के लिए नियम अलग, गृहस्थ के लिए अलग। गृहस्थ को “मैं तो प्रेमी हूँ, मुझे नियम नहीं मानने” ऐसा बहाना नहीं बनाना चाहिए।[youtube]
मासिक धर्म (पीरियड्स) के समय क्या करना चाहिए?
महाराज जी ने माताओं‑बहनों के लिए बहुत स्पष्ट मार्ग बताया:[youtube]
- जब स्त्री मासिक धर्म में हो, तो
- घर में भगवान की सेवा बंद न रहे, इसलिए कम से कम 11 दिन तक (अन्य प्रकार के सूतक में)
- या तो घर में किसी और से ठाकुरजी की सेवा‑पूजा करवाएँ,
- या बाहर से किसी भक्त को बुलाकर भगवान को भोग लगवाएँ।[youtube]
सीधी बात:
शरीर की शुचिता और शास्त्र की मर्यादा दोनों को ध्यान में रखकर, स्त्रियाँ इन दिनों भगवान की सीधे सेवा न करें, लेकिन घर की सेवा किसी न किसी के द्वारा चलती रहे।[youtube]
सूतक में ठाकुर सेवा – बंद हो या न हो?
महाराज जी ने दो स्तर पर बात रखी – शास्त्रीय मर्यादा और प्रेम का मार्ग।[youtube]
1. शास्त्रीय / गृहस्थ मर्यादा
- शास्त्र और सनातन धर्म की सामान्य मर्यादा के हिसाब से
- जन्म सूतक, मरण सूतक, मासिक धर्म आदि के समय
- रसोई सेवा, ठाकुर सेवा, भोग, आरती आदि में रोक या परिवर्तन रखना चाहिए।[youtube]
- जन्म सूतक, मरण सूतक, मासिक धर्म आदि के समय
- उन्होंने साफ कहा –
“गृहस्थ धर्म में, सनातन धर्म की मर्यादा में, जननासूतक, मरणासूतक, मासिक धर्म आदि के समय रसोई सेवा, ठाकुर सेवा सब निषिद्ध मानी गई है, सो हमें लगता है – ऐसे समय सेवा नहीं करनी चाहिए।”[youtube]
मतलब:
गृहस्थों को इन समयों में खुद ठाकुरजी को न छूएँ, न सेवा करें; सेवा किसी और से करवाएँ या कुछ दिन नियमपूर्वक रोकें।[youtube]
2. प्रेम का मार्ग (हित धर्म / प्रेम धर्म)
- महाराज जी ने आगे कहा कि जब साधक प्रेम वाले मार्ग में आगे बढ़ता है, तब सूतक‑आदि की पकड़ धीरे‑धीरे ढीली हो जाती है, यानी प्रेम में इन बाहरी बंधनों का विसर्जन हो जाता है।[youtube]
- उदाहरण देते हुए कहा –
“जब प्रेम की पद्धति में आ जाएँगे तो हम जी नहीं सकते कि हम पानी भी पिएँ और अपने लाडले ठाकुरजी को भोग लगाए बिना पिएँ।”[youtube] - यानी जो वास्तव में प्रेम में डूबा होता है, वह हर काम भगवान को प्रसाद बनाकर ही करता है; वहाँ “आज सूतक है, आज भोग नहीं लगाएँगे” जैसी बात प्रेम के लिए असह्य हो जाती है।[youtube]
लेकिन ध्यान रहे –
यह स्तर ऊँचे साधकों का है; सामान्य गृहस्थ के लिए महाराज जी ने बार‑बार कहा – जब तक गृहस्थ धर्म की मर्यादा है, तब तक सूतक‑आदि मानना चाहिए।[youtube]
“अपने घर” और “दूसरे के घर” की स्थिति
महाराज जी ने एक सूक्ष्म बात समझाई:[youtube]
- अगर आपके अपने घर में कोई सूतक जैसा प्रसंग हो (जन्म/मृत्यु)
- तब भी उनके मत में आपके घर में आपके ठाकुरजी की सेवा बंद नहीं होगी – यह उनके “अपनी उपासना” की बात है कि वे तो अपना सब कुछ पहले ठाकुरजी को ही भोग लगाकर लेते हैं।[youtube]
- लेकिन दूसरे के घर में, जैसे किसी की तेरहवीं, क्रिया‑कर्म आदि में,
- वहाँ जाकर भोग नहीं लगाएंगे, यानी सूतक वाले दूसरे घर की रसोई या प्रसाद आदि में वे भाग नहीं लेते।[youtube]
सरल शब्दों में:
अपने घर में, जहाँ ठाकुरजी साक्षात विराजमान हैं, उनकी सेवा प्रेम से निरंतर चलती रहे; लेकिन दूसरों के सूतक‑घर के प्रसंग में धार्मिक कर्म‑कांड से बचें।[youtube]
प्रेम‑मार्ग में “विधि‑निषेध” का स्थान
- महाराज जी ने एक महत्त्वपूर्ण वाक्य उद्धृत किया –
“विधि निषेध न दास अनन्य उत्कट वृत्तधारी।”[youtube] - अर्थ: जो दास भगवान का अनन्य हो गया, उत्कट प्रेम में डूब गया, उसके लिए विधि‑निषेध (करो‑मत करो) की पकड़ ढीली हो जाती है।[youtube]
- जब व्यक्ति रघुनाथ जी/प्रिया‑प्रीतम से सच्चा प्रेम कर लेता है, तो फिर उसे कोई रोकेगा, वह रुकेगा नहीं; उसका हर श्वास, हर कार्य भगवत सेवा बन जाता है।[youtube]
परंतु मार्मिक बात यह भी कही –
जब तक हम सामान्य गृहस्थ हैं, “प्रेमी महाभागवत” के स्तर पर नहीं पहुँचे हैं, तब तक शास्त्रीय नियम छोड़ना चतुराई नहीं, मूर्खता है।[youtube]
गुरु‑संपत्ति और सूतक‑विषय की पृष्ठभूमि
वीडियो में सूतक‑प्रश्न से पहले व बाद में जो बातें आईं, वे भी समझने योग्य हैं, क्योंकि वही मानसिकता सूतक वाले प्रश्न पर भी लागू होती है।[youtube]
गुरु की “आंतरिक” और “बाह्य” संपत्ति
- महाराज जी ने कहा –
- शिष्य का असली लक्ष्य गुरु की आंतरिक संपत्ति पाना है, न कि बाहर की गद्दी, भवन, पैसा आदि।[youtube]
- यदि गुरु प्रसाद से स्वयं बाह्य संपत्ति दे दें, तो शिष्य को सेवक बनकर उस संपत्ति का उपयोग गुरु की इच्छा के अनुसार करना चाहिए, स्वामी बनकर कब्जा नहीं जमाना चाहिए।[youtube]
इसी भाव को सूतक‑विषय में भी जोड़ सकते हैं –
गृहस्थ का काम नियम‑साधना और मर्यादा को मानते हुए, अंदर से भक्ति को सुरक्षित रखना है, बाहर के मान‑प्रतिष्ठा के लिए शास्त्रीय मर्यादा तोड़ना नहीं।[youtube]
संत‑द्रोह, निंदा और उसकी भयंकरता
- महाराज जी ने स्पष्ट कहा – संत‑द्रोह सबसे भयंकर अपराध है, इससे बड़ा अपराध नहीं, क्योंकि इसका प्रक्षालन केवल वही संत कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।[youtube]
- उन्होंने बताया कि
- उन्होंने दुर्वासा और अमरीश जी की कथा का उदाहरण दिया कि जब संत से अपराध हो जाता है तो भगवान भी कहते हैं – जाओ पहले भक्त से क्षमा माँगो, तब मैं भी शांत होऊँगा।[youtube]
यह सब इसलिए भी बताया कि जो मन सूतक‑अशौच जैसे विषयों में बहुत उलझता है, उसे पहले निंदा, द्वेष, राग‑झगड़ा छोड़कर भजन और विनम्रता पर ध्यान देना चाहिए।[youtube]
भजन, योग और “सबसे बड़ी चतुराई”
संत‑भगवान के दूसरे प्रश्न के उत्तर में महाराज जी ने जो “चतुराई” बताई, वह भी सूतक‑विषय के पीछे की मूल सोच को समझाती है।[youtube]
- असली चतुराई यह नहीं कि
- “भगवान के नाम का सहारा लेकर अपना मान, यश, प्रतिष्ठा, इच्छाएँ पूरी कर लें।”[youtube]
- असली चतुराई यह है कि
- “अन्य भावों का त्याग कर, निरंतर भजन में लग जाएँ; भगवान का स्मरण ही जीवन बना लें।”[youtube]
- योग के बारे में भी उन्होंने कहा –
- ज्ञान मार्ग में चित्तवृत्ति का परमात्मा में लय है।
- योग मार्ग में चित्तवृत्ति का निरोध कर परमात्मा के चिंतन में डूबना है।
- और भक्ति मार्ग में भगवान के नाम‑कीर्तन व नाम‑स्मरण में डूब जाना ही सबसे बड़ा योग, ‘सुमिरन योग’ है।[youtube]
सूतक वाले नियम भी उसी मन को पवित्र रखने के लिए हैं, ताकि मन निंदक‑द्रोही न बनकर भजन‑मय बन सके।[youtube]
आम जन के लिए सरल मार्गदर्शन (सार)
- अगर आप गृहस्थ हैं
- माताएँ‑बहनें
- प्रेम‑मार्ग पर चलने वाले
- जब तक वास्तविक प्रेम की अवस्था न आ जाए, जहाँ हर श्वास भगवान के लिए उठे,
- तब तक “हमें तो प्रेम है, हम सूतक नहीं मानेंगे” कहकर नियम तोड़ना उचित नहीं।[youtube]
- दूसरों की तेरहवीं, क्रिया‑कर्म आदि
- ऐसे सूतक‑प्रभावित घरों में जाकर वहाँ की रसोई या भोग‑प्रसाद में भाग लेने से बचिए।[youtube]
- भीतर की सफाई बाहर से बड़ी है







