साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण सत्संग! कृपा का आश्रय तो लें पर यह गलती न करें! Bhajan Marg


भूमिका: साधक की सबसे बड़ी भूल क्या है?

  • साधक अक्सर मन में मान्यता रखते हैं कि “एक दिन अचानक कोई झटका‑सी कृपा होगी और हमारा नाम‑भजन अपने आप जम जाएगा।”
  • महाराज जी स्पष्ट कर देते हैं कि यह सोच साधक को आलसी, प्रमादी और कायर बना देती है; कृपा का आश्रय लेकर प्रमाद करना ही सबसे बड़ी गलती है।

हठ, अभ्यास और नाम–जप की दृढ़ता

प्रश्न: “महाराज जी, संकल्प भी बनता है, उत्साह भी आता है कि नाम‑जप करेंगे, पर मन फिर गिरा देता है, क्या करें?”

उत्तर – हठपूर्वक अभ्यास की आवश्यकता

  • महाराज जी कहते हैं: “नहीं, इसमें हठ काम करता है। हठपूर्वक जप किया जाता है, दृढ़ता हठपूर्वक करने पर आती है।”
  • “जब हम अभ्यास करते हैं तो हमारा मन निश्चित लग जाता है भगवान में, निश्चित लग जाता है, अभ्यास तो कीजिए।”[youtube]​

उदाहरण – चन्दन और अग्नि

  1. महाराज जी चन्दन का उदाहरण देते हैं:
    • “अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रकट चंदन ते होई।” चन्दन स्वभाव से शीतल है, पर अधिक रगड़ने पर अग्नि निकलती है।
    • इसी प्रकार “जबान से ‘राधा राधा राधा’ रगड़ते रहो, नाम जपो, ज्ञान‑अग्नि प्रकट हो जाएगी, समस्त कर्म‑संस्कारों को भस्म कर देगी और भगवत‑साक्षात्कार करा देगी, पर लगे रहना पड़ेगा।”

महत्वपूर्ण कोट्स – नाम‑जप और दृढ़ता

  • “अपने आप भजन हो, यह तो सिद्धों का होता है, साधकों का थोड़ा होता है; अपने को तो लगे रहना ‘राधा राधा राधा’ कहना है।”
  • “शरीर से कार्य करना है, कायर बन के नहीं बैठना। मुख से नाम‑जप करना है, हृदय से भगवत‑आश्रित हो जाना है।”

साधक के लिए पॉइंट्स

  • रोज़ थोड़ा‑बहुत सही, पर निरंतर अभ्यास।
  • जप मन से न भी लगे, तब भी जीभ से नाम चलते रहना।
  • “अकेले अपने आप भजन हो” – ऐसी अपेक्षा न रखें, यह अवस्था सिद्धों की है, आरम्भिक साधक की नहीं।

कृपा का आश्रय और प्रमाद की भूल

प्रश्न: “कृपा का आश्रय लें, पर प्रमाद न करें – इसका अर्थ क्या है?”

कृपा की सही समझ

  • एक जिज्ञासु पंडित बाबा की वाणी पूछते हैं: “कृपा का आश्रय लेके साधक प्रमाद न करे, जुटा रहे – इसका आशय क्या है?”
  • महाराज जी उत्तर देते हैं:
    • “हमारे हृदय में कृपा के सिवा कुछ नहीं रह गया है… लेकिन हमारा साधन देखो, सुबह से लेकर रात तक साधन देखो; हमारा साधन नहीं है, वह हमसे कराया जा रहा है, हम तो सिर्फ कृपा के आश्रित हैं, साधन कराया जा रहा है।”

मुख्य बिंदु – कृपा और साधन का संबंध

  • “ऐसा नहीं कि हम संसार का मनोरंजन करें और कृपा हमको परम पद में पहुँचा दे – ऐसा कभी नहीं होता।”
  • “जो कायर, आलसी, प्रमादी हैं, भोगों में लगे हैं, मनमानी आचरण करते हैं और सोचते हैं ‘कभी कृपा होगी तो निकल जाएँगे’, उन पर भगवान कृपा नहीं करते।”
  • “जो दृढ़ता‑पूर्वक प्रयास करते हैं, उन पर कृपा होती है, उनको कृपा उठाकर चलाती है। हम दृढ़ता‑पूर्वक लगे हैं लेकिन असफल हैं – अब कृपा आपको उठाएगी, सफलता देगी।”

साधन धाम और कृपा का अनुभव[

  • “यह साधन‑धाम शरीर है, मोक्ष‑द्वार शरीर है; हमें साधना करनी पड़ेगी, अवश्य अवश्य करनी पड़ेगी।”
  • “बिना साधना के कृपा का अनुभव नहीं होता, कृपा तो है; साधना ही आपको कृपा का अनुभव कराएगी।”

साधक के लिए चेतावनी

  • “ऐसे नहीं होता कि केवल कृपा की बात की और मनमानी आचरण किए।”
  • केवल ‘श्रीजी की कृपा से सब हो जाएगा’ कहकर भोगों में डूबना – “तो दुर्गति हो जाएगी, हमारी बात मान लो।”

भोग, धर्मयुक्त जीवन और गृहस्थ साधक

प्रश्न: “क्या भगवान की प्राप्ति बहुत कठिन है? गृहस्थ जीवन में क्या करें?”

भोगों से बचाव और साधना

  • “संसार के भोगों से, निंदनीय भोगों से, अपने मन‑इन्द्रियों को बचाकर भगवान के भजन में लगाओ, साधना में लगाओ, तुम्हारा परम कल्याण हो जाएगा।”
  • “भगवत‑प्राप्ति कोई कठिन नहीं है, कठिन है निंदनीय भोगों का त्याग करना।”

गृहस्थ के लिए नियम – महाराज जी की स्पष्ट रेखा

  1. अधर्मिक पैसे से बचाव
    • “आप नियम ले लो – मैं अधर्म का पैसा स्वीकार नहीं करूँगा, धर्मयुक्त पैसे की नमक‑रोटी खाऊँगा, उसी से अपने परिवार को चलाऊँगा।”
    • स्त्री‑पुरुष संबंध की पवित्रता
    • “मैं कभी पराई स्त्री का स्पर्श भी नहीं करूँगा काम‑भाव से, अपनी पत्नी से मैं अनुराग रखूँगा।”
  2. सम्पत्ति का भाव
    • “नाथ, सकल संपदा तुम्हारी; मैं सेवक समेत सुत‑नारी – यह भावना रखकर नाम‑जप करूँगा।”​
  3. फल – संत जैसी गति
    • “अब जो एक संत की गति होगी वही आपकी गति होगी।”

मनमानी आचरण की हानि

  • “पर ऐसा नहीं हो पाता, मनमानी आचरण होते हैं, फिर वो बात नहीं बनती।​
  • “मनमानी आचरण चाहे गृहस्थ हो, चाहे विरक्त हो, अगर ऐसा करेगा तो भगवत‑मार्ग से विमुख हो जाएगा, भ्रष्ट हो जाएगा।”

भजन में उतार‑चढ़ाव: तमोगुण बनाम अपराध

1. भजन में शिथिलता – सामान्य उतार‑चढ़ाव

प्रश्न: “कभी बहुत उत्साह होता है भजन का, कभी बहुत मंद हो जाता है – क्या सबके साथ ऐसा होता है?”

  • महाराज जी कहते हैं: “हाँ, ऐसा होता है, सबके हृदय में होता है – ‘कबहु तो थोरो भजन, कबहु होत विशाल… मन को धीरज छूटे नहीं, गए न दूजी चाल’।”
  • “जिस समय भजन में मन नहीं लग रहा, उस समय चाहे सो जाओ, पर गंदे पुरुषों का संग मत करो, गंदी आदतों वाली कोई क्रियाएँ न करो।”

उपाय – सत्संग और नाम

  • “थोड़ी देर के लिए तमोगुण आया है, वो चला जाएगा; जहाँ सतोगुण आया, फिर भजन में रति हो जाएगी।”
  • “जब मन भोगों की तरफ उतावला हो, भजन में मन न लगे, अशांति आए – उस समय सत्संग सुनो, तुरंत रजोगुण‑तमोगुण का नाश होकर सतोगुण बढ़ेगा, नाम‑कीर्तन करो – ‘राधा राधा’।”

जरूरी सावधानी

  • “नाम बिल्कुल मन न लगे तो सो जाओ, पर गलत आचरण मत करो, गलत संग न करो, यह जो तमोगुण और रजोगुण हैं, आगमन‑पवन हैं, आने‑जाने वाले हैं।”

2. तमोगुण‑जनित और अपराध‑जनित शिथिलता

प्रश्न: “तमोगुण जनित जो भजन में शिथिलता आती है और अपराध जनित शिथिलता – दोनों में क्या अंतर है?”

महाराज जी का उत्तर – मूल अंतर

  • “तमोगुणित जो शिथिलता आएगी, वह थोड़े ही समय में परिवर्तित होकर भजन करने लगेगा।”
  • “अपराध‑जनित शिथिलता आएगी तो जब तक अपराध‑मुक्त नहीं होगा, तब तक उसका भजन नहीं बन सकता।”

अंदर के संकेत

  • “अपराध‑जनित जो भजन में (शिथिलता है) उसमें जलन होती है, अशांति होती है।”
  • “तमोगुण‑जनित हो तो उसे समझ में नहीं आता; निद्रा, प्रमाद, आलस्य ये चीजें लगेंगी, लेकिन उसकी भजन‑प्रियता बनी रहेगी – ‘हमसे भजन नहीं हो रहा’ यह पीड़ा रहेगी।”
  • “थोड़ी देर में फिर भजन‑प्रियता जागृत हो जाएगी; लेकिन अपराधी की भजन‑प्रियता ही खत्म हो जाएगी, और भोग‑प्रियता, जलन, अशांति, बहुत प्रकार के व्यवधान उपस्थित हो जाएँगे।”

3. दो‑तीन दिन की शिथिलता हो तो क्या करें?

प्रश्न: “बहुत से साधक कहते हैं कि अचानक भजन की शिथिलता आ जाती है; समझ नहीं आता कि यह तमोगुण है या अपराध। दो‑तीन दिन तक अगर ऐसा चले तो क्या करें?”

पहला परीक्षण – उपवास

  • “जैसे तमोगुण बढ़ रहा है, भजन में शिथिलता हो रही है – उपवास एक दवा है; तुरंत उपवास करो, उपवास करते ही सतोगुण आ जाएगा।”
  • “जो भोजन‑जनित या तमोगुण‑जनित भजन में कमी हो रही है, उपवास से तुरंत ठीक हो जाएगी – 24 घंटे का उपवास, 12 घंटे का उपवास, जैसे आपको लगे, जल और फल से काम चला लो।”​

दूसरा परीक्षण – अपराध की जाँच

  • “अगर इस पर भी भजन नहीं हो रहा तो आपका अपराध है, आप चिंतन करो।”
  • “किसी न किसी संत‑महापुरुष के प्रति, किसी भक्त‑वैष्णव के प्रति आपकी गलत बात निकल गई, निंदा सुन ली या निंदा कर दी – यह देखो।”

प्रायश्चित्त और क्षमा‑याचना

  • “यदि जानकारी लगती है कि हमारे द्वारा ऐसा हुआ, तो उस संत‑महापुरुष के चरणों में जाकर नमन करो, क्षमा‑याचना करो।”​
  • “यदि उनकी प्राप्ति नहीं हो पा रही, वे बहुत दूर हैं, तो मन से प्रार्थना करो, भगवान से प्रार्थना करो – शांति मिल सकती है।”

परिक्रमा, मन‑परिक्रमा और अपराध‑मोचन

प्रश्न: “आपने एक बार परिक्रमा भी साधन बताया था कि परिक्रमा कर लो, क्या हर साधक के लिए यही दवा है?”

रोग और दवा – व्यक्ति अनुसार साधन

  • “रोग के अनुसार है; बुखार एक तरह का थोड़ी होता है, कई तरह के बुखार होते हैं, कई तरह के टेबलेट होते हैं, तो सबको एक ही बात थोड़ी होती है।”
  • “जो जैसा मरीज सामने आया, उसके लिए वैसी दवा होती है; अब सबके लिए परिक्रमा थोड़ी है।”​

जो वृन्दावन न आ पाए – मन से परिक्रमा

  • “कोई वृद्ध है, वृन्दावन नहीं आ पा रहा – वह कैसे वृन्दावन की परिक्रमा करेगा? वह मन से चिंतन करे।”
  • प्रार्थना का भाव: “हे विश्व के समस्त व्यक्त‑अव्यक्त महापुरुषों, हे भगवान के परम प्रेमी भक्त जनों, यदि मेरे से जाने‑अन्जाने कोई अपराध बन गया हो, नाथ! आप भगवत‑स्वरूप हैं, आप क्षमा करो प्रभु, क्षमा करो।”

अपराध‑मोचन का संकेत

  • “बार‑बार ऐसी प्रार्थना करो, देख लेना – या तो अपराध‑मोचन हो जाएगा, या फिर सामने वही संत आपके ध्यान में आ जाएँगे।”
  • “अगर कोई संत आपके ध्यान में आ जाएँ तो जान लेना कि वहाँ जाना पड़ेगा, और वहाँ जाकर उनसे क्षमा‑याचना करनी पड़ेगी, क्योंकि संत‑अपराध फिर भजन नहीं होने देता।”

निंदा से बचने का नियम

  • “यदि सही भजन हमारा करना है तो न किसी की निंदा सुनें, न किसी की निंदा करें, न हम परदोष‑दर्शन करें – तो हमारा भजन बढ़ता चला जाएगा।”

निष्कर्षात्मक बिंदु: साधक के लिए दिनचर्या‑जैसे सूत्र

महाराज जी के प्रवचन से साधक के लिए सरल, व्यवहारिक सूत्र

  • रोज हठपूर्वक नाम‑जप; मन न भी लगे, जीभ से ‘राधा राधा’ चलती रहे।
  • कृपा का आश्रय रखें, पर उसे बहाना बनाकर भोग, आलस्य और प्रमाद न करें।
  • शरीर को “साधन‑धाम, मोक्ष‑द्वार” मानकर इसे साधना में, न कि निंदनीय भोगों में, लगाएँ।
  • गृहस्थ साधक: धर्मयुक्त कमाई, नमक‑रोटी भी चलेगी पर अधर्म का धन नहीं; पराई स्त्री‑पुरुष से काम‑भाव रहित दूरी।
  • भजन में शिथिलता आए तो पहले उपवास और सत्संग‑नाम‑कीर्तन से तमोगुण हटाएँ।
  • यदि अशांति, जलन, भोग‑प्रियता बढ़ जाए और भजन‑प्रियता खत्म हो जाए, तो इसे अपराध‑जनित मानकर अपराध‑मार्जन, क्षमा‑याचना और प्रार्थना करें।
  • निंदा, दोष‑दर्शन, बुरे संग से सख़्ती से बचें; यही भजन की रक्षा है।

इसी तरह सतत साधना और सही अर्थ में ली गई कृपा का आश्रय – यही महाराज जी के अनुसार साधक की वास्तविक साधुता और सफल भजन‑मार्ग है।

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