प्रश्न-किसी रोग के कारण गर्भपात कराना अनिवार्य हो जाए तो क्या करें ? कुंवारी अवस्था गर्भ रह जाए तो उसको गिराना चाहिए या नहीं ? (EN)

प्रश्न-किसी रोग के कारण गर्भपात कराना अनिवार्य हो जाए तो क्या करें ? कुंवारी अवस्था गर्भ रह जाए तो उसको गिराना चाहिए या नहीं ?

उत्तर-गर्भपात का पाप तो लगेगा ही। स्त्री के बचाव के लिए लोग गर्भपात करा देते हैं, पर ऐसा नहीं करना चाहिए, प्रत्युत इलाज कराना चाहिए। जो होनेवाला है, वह तो होगा ही। स्त्री मरनेवाली होगी तो गर्भ गिराने पर भी वह मर जाएगी। यदि उसकी आयु शेष होगी तो गर्भ गिराने पर भी वह नहीं मरेगी। मृत्यु तो समय आने पर ही होती है, निमित्त चाहे कुछ भी बन जाए। अतः गर्भपात कभी नहीं कराना चाहिए।

कुंवारी अवस्था गर्भ रह जाए तो उसको गिराना चाहिए या नहीं ?

जिसके संग से गर्भ रह जाए, उसके साथ विवाह करा देना चाहिए। अगर विवाह न करा सकें तो भी उस गर्भ को गिराना नहीं चाहिए। उसका पालन करना चाहिए और थोड़ा बड़ा होने पर उस बच्चे को अनाथालय में भरती करा देना चाहिए अथवा कोई गोद लेना चाहे तो उसको दे देना चाहिए।

यदि कोई कन्या के साथ जबर्दस्ती (बलात्कार) करे तो जर्बर्दस्ती करने वाले को बड़ा भारी पाप लगेगा। यदि कन्या ने उसमें (संग का) सुख लिया है तो उतने अंश में उसको भी पाप लगेगा; क्योंकि सभी पाप भोगेच्छा से ही होते हैं। सर्वथा भोगेच्छा न होने पर पाप नहीं लगता।

यदि कुंवारी कन्या के गर्भ रह जाए तो उसके माता-पिता को भी असवाधानी के कारण उसका पाप लगता है। अतः माता पिता को चाहिए कि वे शुरू से ही बड़ी सावधानी के साथ अपनी कन्या की सुरक्षा रखें, उसको स्वतंत्रता न दें।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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