जीवन में कष्ट आने पर जब लोग यह ताना मारते हैं कि “अब तुम्हारे भगवान कहाँ गए, तुम्हें इतने कष्ट में रखा है”, तब महाराज जी के वचनों का मुख्य संदेश यह है कि दुख हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का प्रारब्ध है, लेकिन हर पल भगवान हमारे साथ हैं, हमें संभाल रहे हैं और दुख के माध्यम से भी कृपा ही कर रहे हैं।[youtube]
कष्ट और प्रारब्ध का सिद्धांत
- महाराज जी बताते हैं कि जीवन में जो कष्ट, बीमारी या विपत्ति आती है, वह हमारे पूर्व जन्मों के पाप–पुण्य कर्मों का प्रारब्ध है, जिसे भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता।[youtube]
- भगवान ने स्वयं कहा है कि शुभ–अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ेगा, इसलिए केवल प्रार्थना करने से प्रारब्ध मिट नहीं जाता, हाँ उसे सहने की शक्ति अवश्य मिलती है।[youtube]
- सुख में होना यह प्रमाण नहीं कि भगवान हैं, और दुख में होना यह प्रमाण नहीं कि भगवान साथ नहीं हैं; वास्तविक बात यह है कि दुख में तो भगवान विशेष रूप से भक्त के साथ रहते हैं।[youtube]
भगवान का साथ और हमारा दृष्टिकोण
- जब कोई पूछे “अब तुम्हारे भगवान कहाँ गए?”, तो उत्तर यही है – “मेरे भगवान मेरे साथ हैं, यह जो कष्ट है, यह मेरा प्रारब्ध है, भगवान की अनुपस्थिति नहीं।”[youtube]
- महाराज जी कहते हैं कि भगवान हर क्षण साथ हैं, पर समस्या यह है कि हमारा मुख संसार की ओर है और भगवान की ओर पीठ है, इसलिए भगवान की कृपा और दुलार दिखाई नहीं देता।[youtube]
- यदि मन से यह निश्चय हो जाए कि “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई”, तब जीवन के हर मोड़ पर भगवान का प्रेम और संरक्षण अनुभव होने लगता है, फिर विपत्ति भी कृपा के रूप में दिखने लगती है।[youtube]
दुख भी भगवान की कृपा कैसे?
- महाराज जी कहते हैं कि भगवान हमारे पूर्व पाप कर्मों को भोगवाकर हमें पवित्र कर रहे हैं; दुख के द्वारा वे आत्मा की शुद्धि कर रहे हैं, यह भी बड़ी कृपा है।[youtube]
- वे अपने ही जीवन की किडनी फेल होने की घटना का उदाहरण देते हैं कि यदि यह बीमारी न आती तो आज जो भक्ति की दशा, एकांत साधना और सेवा का वातावरण मिला है, वह संभव ही नहीं था।[youtube]
- बीमारी के कारण उन्हें भीड़ से दूर एक ऐसे वातावरण में रहना पड़ा, जिसे समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता, लेकिन उसी के माध्यम से गंगा किनारे जैसी एकांत भक्ति का भाव और ईश–अनुभूति प्रगाढ़ हुई।[youtube]
- वे स्पष्ट कहते हैं कि इतना बड़ा सिस्टम भगवान के बिना चल ही नहीं सकता; दोनों किडनी फेल होने पर भी वे बोल रहे हैं, प्रवचन कर रहे हैं, यह स्वयं सिद्ध करता है कि भगवान प्रतिपल साथ हैं।[youtube]
सच्ची भक्ति का स्वरूप
- महाराज जी समझाते हैं कि ध्रुव जी, प्रह्लाद जी जैसे भक्तों के साथ भगवान का प्रत्यक्ष अवतार लेकर आना उनकी निष्कपट, एकनिष्ठ भक्ति के कारण था, हमारी भक्ति में अभी भी “कोई और” बसता है।[youtube]
- माधवदास बाबा का प्रसंग सुनाते हुए वे बताते हैं कि जब भक्त के जीवन में भगवान के सिवा कोई दूसरा सहारा नहीं रहता, तब स्वयं भगवान उसके सेवक की तरह भी सेवा करते हैं, जैसे बाबा की मलभरी लंगोटी समुद्र में धोना।[youtube]
- भगवान अर्जुन का सारथि बनकर, पैदल चलकर, बिस्तर बिछाकर, रथवान बनकर यह दिखाते हैं कि थोड़ी सी सच्ची भक्ति पर भी वे दासवत होकर कृपा बरसाते हैं।[youtube]
- इसलिए महाराज जी कहते हैं कि यदि हम वास्तविक भक्त बन जाएँ, तो कदम–कदम पर प्रभु का संरक्षण, प्रेम और कृपा अनुभव होने लगेगी, और दुखों का स्वाद भी बदल जाएगा।[youtube]
कष्ट में साधक की मनोभूमि
- महाराज जी बार–बार जोर देते हैं कि दुख आने पर विचलित नहीं होना चाहिए कि “भगवान कहाँ गए, अब तो हमारे दुख नहीं मिटा रहे”; भगवान सब देख रहे हैं और भीतर–भीतर शक्ति, धैर्य और विवेक दे रहे हैं।[youtube]
- वे उदाहरण देते हैं कि बड़े–बड़े सिद्ध संतों को भी अपने कर्मों का भोग करना पड़ा – जैसे रामकृष्ण परमहंस जी को गले का कैंसर, पांडवों को बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास, और द्रौपदी का सभा में चीरहरण।[youtube]
- यह सब भगवान की अवज्ञा नहीं, बल्कि भगवान का विधान है, जो इस कर्मभूमि में सबको अपने–अपने कर्मों का फल दिलाता है, चाहे वे कितने बड़े भक्त ही क्यों न हों।[youtube]
- सच्चा भक्त वही कहलाएगा जो सुख–दुख दोनों को भगवान का विधान मानकर समान भाव से स्वीकार करे और किसी अवस्था में प्रभु को न भूले, बल्कि हर परिस्थिति को ईश्वर–अनुग्रह समझकर आगे बढ़ता चला जाए।[youtube]
नाम–स्मरण और शरणागति का महत्व
- महाराज जी चेतावनी देते हैं कि हमारे पाप कर्म हमें दंड देने के लिए बलवान होकर तैयार खड़े हैं; यदि भगवान की शरण न हो तो वे हमें तोड़कर रख देंगे।[youtube]
- इसलिए वे सभी से कहते हैं – “राधा राधा रटो, राधा राधा नाम जप करो”, ताकि भगवान की शरण से पाप–फल का प्रभाव बहुत कम होकर आए, और हम दुख सह भी पाएँ और भीतर से न टूटें।[youtube]
- भगवान की शरण में रहने से कष्ट आता तो है, पर इतना हल्का होकर आता है कि साधक उसे पार कर जाता है, जबकि बिना शरणागति के वही दुख मनुष्य को भीतर से तोड़ देता है।[youtube]
- प्रार्थना का अर्थ यह नहीं कि सारे दुख तुरंत समाप्त हो जाएँ, बल्कि यह कि दुख के मध्य भी हृदय भगवान से जुड़ा रहे, मन स्थिर रहे और भक्ति का रंग इतना चढ़ जाए कि हर हाल में प्रभु का प्यार अनुभव होने लगे।[youtube]







