परमपिता परमेश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल और सुंदर मार्ग, जैसा कि महाराज जी ने इस अंश में समझाया, संत संग और भागवत धर्म है– अर्थात संतों की आज्ञा का पालन, लोकधर्मों का समर्पण भगवत धर्म में, कामना‑तृष्णा का त्याग, दोष‑गुण चिंतन का त्याग, कथा‑सेवा और नामजप। यह मार्ग किसी जटिल क्रिया‑कांड से नहीं, बल्कि जीवन के केंद्र को भगवान और उनके भक्तों की ओर मोड़ने से खुलता है।
भागवत धर्म: परमपिता तक पहुँचने का सरल मार्ग
महाराज जी से प्रश्न पूछा गया – “परमपिता परमेश्वर तक पहुँचने का सबसे सुगम और सबसे सुंदर मार्ग साधक के लिए कौन‑सा है?” इस पर वे श्रीमद्भागवत महापुराण के उस उपदेश का सहारा लेते हैं, जिसमें गोकर्ण जी अपने पिता आत्मदेव ब्राह्मण को भगवत‑मार्ग समझाते हैं –
“धर्मं भजस्व सततं त्यज लोकधर्मान्, सेवस्व साधुपुरुषाञ् जहि कामतृष्णाम्।
अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु मुक्त्वा, सेवाकथारसमहो नितरां पिबत्वम्॥”
इस एक श्लोक में, परमात्मा तक पहुँचने का संपूर्ण रोडमैप संक्षेप में आ गया है। महाराज जी इसी श्लोक को खोलकर साधक के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हैं।
“धर्मं भजस्व सततम्”: धर्म का सतत भजन
श्लोक का पहला वाक्य है – “धर्मं भजस्व सततम्” – सतत धर्म का भजन करो।
- यहाँ धर्म का अर्थ केवल बाहरी कर्मकांड या जाति‑धर्म नहीं, बल्कि भगवान से संबंधित भगवत धर्म है।
- “सततम्” का अर्थ है – कभी‑कभार नहीं, बल्कि निरंतर, जीवन के हर क्षण में भगवान‑चिंतन, भगवान‑भजन और भगवत‑सम्मत आचरण।
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जब तक व्यक्ति को भगवान का परिचय नहीं, जब तक वास्तविक सत्संग नहीं हुआ, तब तक सामान्य लोकधर्म – जैसे परिवार, समाज, रिश्तेदारी, कर्तव्य आदि – की भी आवश्यकता है। इन्हें छोड़ देना नहीं, सही ढंग से निभाना है। पर जैसे ही वास्तविक सत्संग हो, भगवान से परिचय हो, तब जीवन का केंद्र बदल जाना चाहिए।youtube
“त्यज लोकधर्मान्”: लोक धर्मों का समर्पण
श्लोक का अगला भाग है – “त्यज लोकधर्मान्” – लोकधर्मों का त्याग करो।
यहाँ “त्याग” का अर्थ महाराज जी बहुत सुंदर तरह से समझाते हैं –
- यह भागना नहीं, समर्पण है।
- पिता होना, पुत्र होना, भाई होना, पति‑पत्नी, रिश्तेदारी, समाज की जिम्मेदारियाँ – इन सबको छोड़कर जंगल भाग जाना ये “त्याग” नहीं है।youtube
- वे कहते हैं – “इन सबका समर्पण भगवान में कर दो।” यानी –
- “मैं पिता हूँ” – यह भाव रहे, पर “मैं भगवान की आज्ञा से, भगवान की संतुष्टि के लिए पिता‑धर्म निभा रहा हूँ।”
- “मैं पति/पत्नी हूँ” – यह रहे, पर “ये संबंध भी भगवान की देन हैं, इनका उद्देश्य भी भगवान की प्रसन्नता है।”youtube
लोकधर्मों का समर्पण भगवत धर्म में कर देना ही भागवत धर्म है।
महाराज जी बताते हैं कि हम सब आज लोकधर्मों में फंसे हुए हैं – कोई परिवार में, कोई समाज में, कोई अपनी छवि, प्रतिष्ठा और जिम्मेदारियों में। लेकिन कुछ लोग तो इतने गिर जाते हैं कि लोकधर्म भी छोड़कर अधर्म में रति करने लगते हैं – यह दशा सबसे खराब है।youtube
इसलिए क्रम यह है –
- पहले अधर्म की रति का त्याग।
- फिर लोकधर्म का ठीक‑ठीक पालन।
- फिर लोकधर्म का समर्पण कर भागवत धर्म की प्राप्ति।
भागवत धर्म का सार: कर्म और संबंधों का समर्पण
भागवत धर्म क्या है? महाराज जी इसका सार देते हैं –
- “सब कर्मों का समर्पण और सब संबंधों का समर्पण भगवान को – यही भागवत धर्म है।”youtube
- “सबकी ममता का ताग बटोरकर भगवान के चरणों में बांध दो।” इस भाव में जीवन जीना, यही सच्चा भगवत धर्म है।youtube
इस दृष्टि से, घर‑परिवार छोड़ना जरूरी नहीं, बल्कि भाव बदलना जरूरी है:
- पहले: “ये मेरा है, मैं ही कर्ता हूँ।’’
- भागवत धर्म में: “सब भगवान का है, मैं तो सेवक मात्र हूँ, कर्ता भगवान हैं।”youtube
यहीं से साधक के जीवन में आनंद की शुरुआत होती है, क्योंकि जो समर्पित है, वह परिणामों का बोझ स्वयं नहीं उठाता।
“सेवस्व साधुपुरुषान्”: संत संग का महत्त्व
श्लोक का अगला आदेश है – “सेवस्व साधुपुरुषान्” – संत पुरुषों की सेवा करो।
महाराज जी कहते हैं कि लोकधर्म का त्याग करके भागवत धर्म में दृढ़ होना बहुत कठिन है, क्योंकि –
- लोकधर्म में मन थोड़ा‑बहुत लग भी जाता है।
- लेकिन भागवत धर्म – जिसमें केवल भगवान, उनका नाम, उनकी कथा, उनका चिंतन है – उसमें तो मन जाता ही नहीं।youtube
तो फिर साधक क्या करे? उत्तर है –
- “सेवन सदा साधुपुरुषान्” – सदा संतों की सेवा और संग।
संत सेवा का वास्तविक अर्थ
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि संतों की सेवा का प्रथम और मुख्य अर्थ है –
- उनकी आज्ञा का पालन करना।
- वे जो उपदेश देते हैं, वे अपने अनुभव और शास्त्र की प्रमाणिकता के आधार पर देते हैं; उस उपदेश को जीवन में उतारना ही वास्तविक सेवा है।
इसके बाद सेवा के अन्य अंग आते हैं –
- वस्त्र सेवा
- भोजन सेवा
- औषधि सेवा, आदि – पर ये सब दूसरे स्तर पर हैं।youtube
यदि कोई व्यक्ति संत के शरीर के समीप रहकर भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करता है, तो वह वास्तविक संत संग में नहीं है। वहीं, जो हजारों कोस दूर रहकर भी उनकी आज्ञा को अपने जीवन में उतार रहा है, वह सच्चे अर्थ में संत संग कर रहा है।youtube
इससे एक गहरा सिद्धांत निकलता है –
- संत संग का मतलब शारीरिक निकटता नहीं, आज्ञा पालन है।
संत संग की दुर्लभता और कठिनाई
महाराज जी देवर्षि नारद के वचनों का उल्लेख करते हैं कि महापुरुषों का संग अत्यंत दुर्लभ है।youtube+1
तीन चरण हैं –
- महान संत पुरुषों का मिलना ही कठिन।
- यदि मिल जाएँ, तो उनके साथ निर्वाह करना कठिन।
- यदि निर्वाह हो भी जाए, तो उनकी आज्ञा का पालन कर पाना और अपनी कामना‑तृष्णा छोड़ पाना अत्यंत दुर्लभ।youtube
संग का लाभ तभी होता है, जब –
- कामना और तृष्णा का त्याग हो,
- संत की आज्ञा का उल्लंघन न हो,
- उनके बताए मार्ग पर दृढ़ता से चला जाए।youtube
तभी यह संग ‘अमोघ’ – अर्थात निष्फल न होने वाला – बनता है और निश्चित भगवत प्राप्ति की ओर ले जाता है।
“जहि कामतृष्णाम्”: कामना और तृष्णा का त्याग
श्लोक का अगला भाग है – “जहि कामतृष्णाम्” – कामना और तृष्णा का त्याग करो।
महाराज जी इन दोनों की सुक्ष्म व्याख्या करते हैं –
- कामना – पढ़े हुए, सुने हुए, देखे हुए भोगों को भोगने की इच्छा।
- जो भोग अभी तक अनुभव नहीं हुए, पर उनके बारे में सुना‑देखा‑पढ़ा है, उन्हें भोगने की लालसा कामना है।youtube
- तृष्णा – पहले से भोगे हुए भोगों को पुनः भोगने की इच्छा।
- जो सुख पहले मिल चुका, उसे बार‑बार पाने की प्यास तृष्णा है।youtube
भगवत मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध यही कामना और तृष्णा हैं, क्योंकि वे साधक को संत की आज्ञा से विचलित कर देती हैं।youtube
कामना‑तृष्णा और संत संग
बहुत बार होता यह है कि –
- संत मार्ग बताते हैं,
- पर साधक अपनी कामना‑तृष्णा के कारण उस मार्ग से हट जाता है,
- इस प्रकार संत संग का फल नष्ट हो जाता है।youtube
यदि कामना‑तृष्णा का त्याग कर, संत की आज्ञा पर डटे रहें, तो –
- संत संग ‘अमोघ’ हो जाता है,
- और निश्चित भगवत प्राप्ति होती है।
“अन्यस्य दोषगुणचिन्तनम्… मुक्त्वा”: दोष‑गुण चिंतन का त्याग
श्लोक में आगे कहा गया – “अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु मुक्त्वा” – दूसरों के दोष और गुणों के चिंतन का त्याग करो।
महाराज जी बताते हैं कि –
- गुण और दोष दोनों माया के क्षेत्र में हैं।
- दूसरे के गुण देखने से अपने अभिमान की पुष्टता होती है (“मैं तो इतना अच्छा नहीं, वह इतना बड़ा है” या “मैं तो इससे भी बड़ा हूँ”).
- दूसरे के दोष देखने से निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती है।
रामचरितमानस का भाव भी उद्धृत है – “तात सुनो माया गुण दोष अनेक, गुण या उभय न देखु जो अविवेक।”
साधक के लिए उचित दृष्टि यह है कि –
- किसी में भी विशेष दोष न देखे, न गुणों का हिसाब रखे।
- सब में भगवान का दर्शन करे – पापी में भी, पुण्यात्मा में भी, साधक में भी, सिद्ध में भी।
इससे दृष्टि निर्दोष बनती है और हृदय शांत रहता है।
“सेवाकथा‑रस‑महः नितरां पिबत्वम्”: कथा और नाम का रस
श्लोक का अंतिम आदेश है – “सेवाकथारसमहो नितरां पिबत्वम्” – भगवान की सेवा और कथा‑रस को नितरां अर्थात पूरे मन से, बार‑बार पियो।
मaharaj जी इसको समेटते हुए कहते हैं –
- भगवान की कथा सुनो।
- भगवान का नाम जप करो।
- शरीर से सेवा करो – भगवत स्वरूप मानकर सब की सेवा।
- और दूसरों के दोष‑गुण के चिंतन में समय नष्ट न करो।youtube
ऐसा जीवन साधक को धीरे‑धीरे भगवत प्राप्ति के योग्य बनाता जाता है –
- चाहे कोई निराकार ब्रह्म का साक्षात्कार चाह रहा हो,
- या साकार स्वरूप भगवद्‑रूप का।
दोनों प्रकार के साधक के लिए यही मार्ग सर्वसिद्धि‑प्रद है।youtube
सबसे सरल साधन: संत संग और आज्ञा‑पालन
पूरे उत्तर के अंत में महाराज जी एक वाक्य में सार दे देते हैं –
- “इसलिए सबसे सरल साधन संतों का संग है।”
- संतों के संग में जो उपदेश सुने जाएँ, उन्हें आचरण में उतारना और साथ‑साथ नाम जप करना – इससे निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाती है।
इस “सरलता” का अर्थ यह नहीं कि यह मार्ग बिना परिश्रम के है, बल्कि –
- अन्य साधनों की तुलना में यह सीधा है।
- उलझनों, जटिल कर्मकांड और केवल बौद्धिक वाद‑विवाद की जगह, यहाँ केंद्र में है –
- संत संग,
- आज्ञा पालन,
- समर्पण,
- नामजप और कथा‑श्रवण।youtube+1
साधक के लिए व्यावहारिक सूत्र
महाराज जी के इस उत्तर से साधक के लिए कुछ सरल, व्यवहारिक सूत्र निकलते हैं –
- भगवत धर्म अपनाएँ
- रोजमर्रा के सभी काम – नौकरी, व्यापार, घर‑परिवार – को भगवान को समर्पित भाव से करें।
- “मैं” को “आपकी सेवा” में बदलें।
- लोकधर्म छोड़कर भागना नहीं, समर्पित होना है
- परिवार‑त्याग नहीं, बल्कि ममता‑त्याग।
- संबंधों को भगवान की देन मानकर निभाना।youtube
- संत संग का सही अर्थ समझें
- केवल सत्संग सुनना या पास बैठ जाना पर्याप्त नहीं।
- जो सुना, उसे जीवन में उतारना ही सच्चा संग है।
- कामना‑तृष्णा पर नज़र रखें
- मन की इच्छाओं का ईमानदारी से निरीक्षण करें –
- क्या यह नई भोग‑लालसा (कामना) है?
- या पुरानी आदत और सुख को दोहराने की प्यास (तृष्णा)?
- इनसे ऊपर उठने की प्रार्थना और अभ्यास करते रहें।
- मन की इच्छाओं का ईमानदारी से निरीक्षण करें –
- दोष‑गुण चिंतन छोड़ें
- दूसरों की चर्चा, तुलना और आलोचना से दूरी बनाएँ।
- जहाँ भी देखें, यह मानें – “यहाँ भी वही भगवान विराजमान हैं।”
- कथा, सेवा और नामजप
- रोज कुछ समय हरि‑कथा सुनने या पढ़ने के लिए निकालें।
- किसी न किसी रूप में सेवा – घर में, समाज में, सत्संग में – जरूर करें, पर सेवा के पीछे अहंकार नहीं, समर्पण हो।youtube
- अपने इष्ट नाम (जैसे “राधे‑राधे”, “राम”, “कृष्ण”) का नियमित जप करें।
निष्कर्ष: जीवन का केंद्र बदलना ही मार्ग
मaharaj जी के उत्तर का मूल संदेश यह है कि परमपिता परमेश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग किसी विशेष स्थान, वेशभूषा या बाहरी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि जीवन‑दृष्टि और हृदय के केंद्र से जुड़ा है।
- जब तक जीवन का केंद्र “मैं और मेरा” है, तब तक साधना भी बंधन बढ़ा सकती है।
- जब जीवन का केंद्र “भगवान और उनका संत” हो जाता है –
- कर्म भगवान को समर्पित,
- संबंध भगवान को समर्पित,
- बुद्धि संत की आज्ञा में लगती है,
- और जिह्वा “राधा‑नाम” या हरिनाम का रस पीती है –
तब वही साधारण‑सा जीवन भगवत‑मार्ग बन जाता है।
यही है – संत संग, आज्ञा‑पालन, समर्पण, कामना‑तृष्णा का त्याग, दोष‑गुण चिंतन का त्याग, कथा‑सेवा और नामजप – जो महाराज जी के अनुसार परमपिता परमेश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल, सुंदर और सुनिश्चित मार्ग है।







