सारी बुरी आदतें तो छूट गई पर कामवासना खत्म नहीं हो रही ! Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

कामवासना साधक के लिए सबसे बड़ा शत्रु है, परन्तु श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज बताते हैं कि यह अजेय नहीं है; सही समझ, साधना, नामजाप, सत्संग और वैराग्य से इसे धीरे‑धीरे क्षीण किया जा सकता है, जब तक कि भगवद्‑दर्शन और पूर्ण समर्पण से यह मूल से शांत न हो जाए। कामवासना से सीधी लड़ाई नहीं, बल्कि आश्रय काटना, मन को हर समय श्री नाम और सेवा में लगाना, तथा गुरु‑कृपा और सात्विक आचरण से अंतःकरण को शुद्ध करना — यही उनका मुख्य संदेश है।

नोट: नीचे लिखा गया लेख श्री महाराज जी के अनेक प्रवचनों के सार पर आधारित है, शाब्दिक उद्धरण नहीं है; शब्दों की संख्या अनुमानित है, अर्थ की पूर्णता पर ज़ोर है।


1. कामवासना की वास्तविकता और गहराई

  • श्री महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि अन्य बुरी आदतें जैसे शराब, सिगरेट, माँस आदि अपेक्षाकृत जल्दी छूट सकती हैं, लेकिन कामवासना बहुत सूक्ष्म, गहरी और दीर्घकालिक वृत्ति है।
  • वे बताते हैं कि यह केवल शरीर की आदत नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और संस्कारों में बैठी हुई प्रवृत्ति है, इसलिए साधना के वर्षों बाद भी सूक्ष्म रूप में बनी रह सकती है।
  • कामवासना को वे “बहुत बड़ा शत्रु” कहते हैं, जो बड़े‑बड़े विद्वान, तपस्वी और साधकों तक को गिरा सकती है; शास्त्रों में भी इन्द्रियों की बलवानता का वर्णन इसी अर्थ में किया गया है।
  • इसका असर केवल पाप के रूप में नहीं, बल्कि प्राणशक्ति की क्षति, मन की चंचलता और भक्ति‑रस की घटती क्षमता के रूप में भी होता है; काम‑विचार प्राणशक्ति को “चूस लेते हैं” इस प्रकार की चेतावनी भी वे देते हैं।

2. “क्यों नहीं खत्म होती?” – कारणों की बिन्दुवार व्याख्या

  • वे बताते हैं कि केवल बाहरी बुरी आदतें छोड़ देने से भीतर की वासना स्वतः समाप्त नहीं होती, क्योंकि मूल कारण – मन का आसक्ति‑भाव और विषयों के प्रति आकर्षण – ज्यों का त्यों बना रहता है।
  • मन जब खाली होता है, वैराग्य और भगवद्‑चिंतन से भरा न हो, तो पुरानी वासनाएँ तरंगों की तरह पुनः उभर आती हैं; केवल दमन करने से वे दब तो जाती हैं पर नष्ट नहीं होतीं।
  • आधुनिक वातावरण (अश्लील सामग्री, असंगत संगति, सोशल मीडिया आदि) को भी वे कारण बताते हैं कि मन बार‑बार उसी दिशा में खिंच जाता है, जिससे संस्कार बार‑बार पुष्ट हो जाते हैं।
  • कामवासना को वे “आश्रित” वृत्ति बताते हैं – जब तक उसे कोई आश्रय (दृश्य, व्यक्ति, कल्पना, स्मृति, स्थान, वस्तु या कंटेंट) मिलता रहेगा, तब तक वह प्रबल होती रहेगी।

3. कामवासना से सीधे न लड़ो, आश्रय काटो

  • श्री महाराज जी की विशेष शिक्षा यह है कि कामवासना से “रिंग में उतरकर कुश्ती” नहीं लड़नी, बल्कि उसका आश्रय ही छीन लेना है; काम को आश्रय न मिले तो वह तुम्हें परास्त नहीं कर सकता।
  • वे अष्ट‑मैथुन की चर्चा करते हैं कि केवल शारीरिक संपर्क ही नहीं, आंखों, कानों, कल्पना, स्पर्श, स्मृति, वार्तालाप आदि के माध्यम से भी काम को आश्रय मिलता है, और इन्हें एक‑एक करके काटना होता है।
  • जहां‑जहां जाने से, जिन‑जिन को देखने‑सुनने से, या जिन चीज़ों/ऐप्स के प्रयोग से कामोत्तेजना बढ़ती हो, उन सब स्थानों और साधनों से सचेत दूरी बनाना आवश्यक बताया गया है।
  • “भागना ही है, लड़ना नहीं” – वे कहते हैं कि जो साधक काम के अवसर से स्वयं को हटाकर बच जाता है, वही वास्तविक विजयी है; जो “देखूँ क्या होता है” सोचकर खेल करता है, वही फँस जाता है।

4. भगवद्‑दर्शन तक सूक्ष्म काम – निराश न हों

  • महराज जी बताते हैं कि बहुत ऊँची साधना, यहां तक कि पचास वर्षों की साधना के बाद भी सूक्ष्म कामवासना तरंग के रूप में रह सकती है; इससे साधक को निराश नहीं होना चाहिए।
  • वे समझाते हैं कि जब तक भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन, परम अनुभूति और स्थायी भगवद्‑रस की प्राप्ति नहीं होती, तब तक सूक्ष्म स्तर पर वासनाएँ उठ सकती हैं, क्योंकि कर्म‑संस्कार पूरी तरह जले नहीं होते।​
  • भगवद्‑दर्शन या पूर्ण अनुभूति के क्षण में कामवासना की जड़ कट जाती है; तब साधक का राग‑द्वेष तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) से शांत हो जाता है और वह मात्र दृष्टा बन जाता है।
  • इससे वे यह भाव देते हैं कि “अभी क्यों नहीं जा रही” के स्थान पर “प्रयास जारी रखो, यह क्रमिक प्रक्रिया है” – इस प्रकार धैर्य और उत्साह बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं।

5. कामवासना और भक्ति‑मार्ग की बाधा

  • प्रश्न में जैसे कहा गया कि भक्ति में बाधा आती है, वैसे ही महाराज जी भी मानते हैं कि कामवासना साधक को भगवत‑मार्ग से विमुख कर देती है; मन नाम‑जप के स्थान पर विषय‑चिंतन में लग जाता है।
  • वे गीता का श्लोक भी स्मरण कराते हैं – विषय‑चिंतन से संग, संग से काम, काम से क्रोध, क्रोध से स्मृति‑भ्रंश, बुद्धि‑नाश और अन्ततः पतन – यह शृंखला कामवासना के माध्यम से ही शुरू होती है।
  • जब मन बार‑बार गंदे विचारों में जाता है, तो कीर्तन, जप, शास्त्र‑श्रवण में रस नहीं आता; इससे साधक को लगता है कि “मेरी भक्ति फेल हो रही है”, और वह हीन‑भावना में डूब सकता है।​
  • महाराज जी समझाते हैं कि यह समय और अधिक नाम‑स्मरण, सत्संग और गुरु‑चिन्तन का है; अगर वही मन निराश होकर छोड़ देता है, तो कामवासना और अधिक बलवान हो जाती है।​

6. नाम‑जप: वासनाओं को नष्ट करने का सीधा उपाय

  • “समस्त वासनाओं को नष्ट करने का सीधा उपाय नाम‑जप है” – इस भाव को वे बार‑बार दोहराते हैं; विशेषतः श्री राधा‑नाम या इष्ट‑नाम का अनन्य, प्रेमपूर्वक, निरंतर जप।
  • वे कहते हैं कि मन को खाली मत रहने दो; जहाँ मन खाली होगा, वहाँ पुरानी वासनाएँ और गंदे विचार फिर से भर जाएंगे, इसलिए नाम‑जप, भगवत‑कीर्तन, भजन और शास्त्र‑श्रवण से मन को भरा हुआ रखो।
  • महाराज जी के अनुसार गंदे विचारों से लड़ने के बजाय उन्हें “राधा‑नाम में डुबो दो”; जैसे गंदे कपड़े को पवित्र गंगाजल में बार‑बार धोने से मैल स्वयं छूट जाता है, वैसे ही नाम‑जप से अंतःकरण धुलता है।
  • वे यह भी बताते हैं कि नाम‑जप की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बढ़ानी होंगी – केवल औपचारिक जप नहीं, बल्कि ध्यानपूर्वक, विनय से, रोता हुआ हृदय लेकर जप करने से वासनाओं की पकड़ ढीली पड़ती है।

7. सत्संग, कथा और भगवद्‑चर्चा का महत्व

  • महाराज जी बार‑बार कहते हैं कि कामवासना और गंदी आदतों से छुटकारा पाना है तो नियमित सत्संग, कथा‑श्रवण और भगवद्‑चर्चा अनिवार्य है; कान में जो सुना जाएगा, वही मन में घूमेगा।
  • यदि दिन भर मोबाइल, फिल्मों, गालियों, मज़ाक और अशोभनीय वार्तालाप से कान भरे रहेंगे, तो रात को जप करने पर भी मन उसी की तस्वीरें बनाता रहेगा; सत्संग वह धारा है जो दिशा बदल देती है।
  • वे गीता और भागवत को साधक की कसौटी बताते हैं – ज्ञान, वैराग्य और भक्ति‑रस से परिपूर्ण शास्त्र‑श्रवण से मन का दृष्टिकोण बदलता है; काम की क्षणिकता और भगवान की नित्यता स्पष्ट होती है।
  • सत्संग को वे केवल भाषण सुनना नहीं, बल्कि संत‑समागम, उनके चरणों में रहकर उनके आचरण को देखना, सेवा करना और उनके द्वारा दी गयी साधना पर स्थिर रहना मानते हैं।

8. गुरु‑कृपा, शरणागति और कर्म‑बंधन का नाश

  • “कामवासना से छुटकारा कैसे पाएं? होगा ब्रह्मचर्य पुष्ट!” – इस विषय पर वे बताते हैं कि जब साधक आचार्य (सद्गुरु) के चरणों में पूर्ण शरणागति करता है, तो जो काम केवल साधना से नहीं होता, वह कृपा से हो जाता है।
  • वे समझाते हैं कि हृदय से, विश्वास के साथ यदि कोई अपना सर्वस्व आचार्य को समर्पित कर दे, तो संचित कर्म जलते हैं, क्रियमाण निष्फल होते हैं, और प्रारब्ध को सहने की शक्ति मिलती है; इससे भीतर की वासनाएँ धीरे‑धीरे शांत होती हैं।
  • “मात्र शरणागति से कटे कर्म‑बंधन” – इस प्रकार के भजन‑श्लोक वे उद्धृत करते हैं, ताकि साधक समझे कि अकेले अपने बल पर नहीं, बल्कि कृपा‑शक्ति के सहारे भी यह युद्ध जीता जाता है।
  • गुरु‑कृपा को वे इष्ट‑कृपा से अभिन्न बताते हैं – आचार्य, गुरुदेव और इष्ट‑देव के चरणों में स्थिर निष्ठा ही मन को भोग से हटाकर भजन में स्थिर बनाती है, जिससे कामसंस्कार सूखते हैं।

9. वैराग्य की बाढ़ और शुद्ध अंतःकरण

  • एक अन्य प्रवचन में वे कहते हैं कि केवल द्रवण (भावुकता) काफी नहीं, उसके साथ वैराग्य की बाढ़ होनी चाहिए; यदि वैराग्य नहीं है, तो भावुकता भी इधर‑उधर फैल जाती है और साधक फिर विषयों में लौट जाता है।
  • वैराग्य का अर्थ वे यह बताते हैं कि विषयों की निंदा भर नहीं, बल्कि हृदय से उनकी असारता का अनुभव; जब यह बोध गहरा होता है कि “यह सब क्षणभर का है, इससे कभी तृप्ति नहीं होगी”, तब मन स्वतः हटने लगता है।
  • शुद्ध अंतःकरण वह अवस्था है जहां स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों स्तरों से राग कम हो जाता है; ऐसे शुद्ध मन पर भगवद्‑रस टिकता है, और काम की पकड़ प्राकृतिक रूप से छूटती जाती है।
  • वे बताते हैं कि भक्त और ज्ञानी दोनों का लक्ष्य अंतःकरण की शुद्धि है; पर भक्त शुद्ध अंतःकरण के बाद दास्य‑भाव और आत्म‑निवेदन में स्थित होता है, जहां अन्य इच्छाएँ, विशेषतः काम‑इच्छा, स्थान ही नहीं पाती।

10. व्यावहारिक उपाय: दिनचर्या, शरीर और मन की दिशा

  • महाराज जी साधकों को केवल आध्यात्मिक सलाह ही नहीं, बल्कि शारीरिक‑मानसिक अनुशासन की भी सलाह देते हैं – सुबह दौड़ना, व्यायाम, नियमित दिनचर्या, इससे दिमाग फ्रेश होता है और गंदी बातों से दूरी बनती है।[instagram]​
  • वे कहते हैं कि यदि शरीर सुस्त, पेट भरा, नींद ज्यादा, और काम ही कम हो, तो मन स्वतः विषयों में भागेगा; इसलिए शरीर को तंदरुस्त, सक्रिय और अनुशासित रखना भी ब्रह्मचर्य की मदद करता है।[youtube]​[instagram]​
  • सुबह जल्दी उठना, स्नान, जप, पाठ, थोड़ासा भजन‑कीर्तन, और फिर नियमानुसार कार्य‑व्यवहार – यह सब मिलकर मन को सही दिशा में व्यस्त रखते हैं, ताकि खालीपना गंदी कल्पनाओं को जगह न दे।[youtube]​[livehindustan]​
  • भोजन में सात्विकता – हल्का, कम मिर्च‑मसाला, मदिरा‑मांस से दूरी – को वे आवश्यक मानते हैं, क्योंकि तामसी‑भोजन से मन और इन्द्रियाँ अधिक उत्तेजित रहती हैं।[aajtak]​

11. संगति, मीडिया और “ट्रिगर” से सावधानी

  • वे बार‑बार चेताते हैं कि संगति और देखे‑सुने का सीधा प्रभाव कामवासना पर पड़ता है; गंदी बातें करने‑सुनने, अश्लील मज़ाक और अशोभनीय जोक‑वीडियो आदि से मन में चित्र बनते हैं जो बाद में एकांत में उभरते हैं।[facebook]​
  • जो मित्र, समूह या ऑनलाइन पेज/चैनल बार‑बार अश्लीलता, रोमांस या भोगवादी जीवन‑शैली दिखाते हैं, उनसे दूरी ही “आश्रय काटने” की पहली सीढ़ी है।[youtube]​[livehindustan]​
  • वे यह भी कहते हैं कि यदि किसी विशेष सोशल मीडिया ऐप, वेबसाइट या समय (जैसे देर रात मोबाइल) पर बार‑बार गिरावट होती है, तो उस ट्रिगर को ही काट दो – समय बदलो, डिवाइस साधारण बनाओ, या इंटरनेट उपयोग सीमित करो।[youtube]​[livehindustan]​
  • “गंदी बातें करते रहोगे और अच्छी बातें करोगे नहीं तो निराश तो होते ही चले जाओगे” – इस प्रकार वे समझाते हैं कि नकारात्मक इनपुट काटे बिना केवल सकारात्मक प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।[instagram]​

12. जब काम की लहर उठे – उस क्षण की साधना

  • वे बताते हैं कि जब अचानक काम‑वेदना की लहर उठे, उस समय दो ही विकल्प होते हैं – या तो मन तुरंत उस तरफ भागे, या यह समझे कि “यह मेरी परीक्षा है”; जो इसे परीक्षा मानकर इष्ट‑नाम में लग जाता है, वह बच जाता है।[youtube]​
  • उस क्षण तुरंत स्थान बदल देना, एकांत से निकलकर लोगों के बीच आ जाना, ठंडा पानी पी लेना, जप‑माला उठा लेना, या जोर से कीर्तन लगा लेना – ये सब व्यावहारिक उपाय भी वे सुझाते हैं।[youtube]​
  • “देखते हैं करता हूँ या नहीं करता” – इस तरह का खेल महाराज जी मना करते हैं; वे कहते हैं, यह सोच ही पतन की शुरुआत है, क्योंकि मन अवसर का मज़ा लेना चाहता है।[youtube]​
  • वे यह भी कहते हैं कि उस समय अगर मन में रखोगे कि “भगवान देख रहे हैं, यह मेरी परीक्षा है, मैं उनका हूँ, मुझे उन्हें प्रसन्न करना है”, तो भीतर शक्ति आती है और साधक फिसलने से बच सकता है।[youtube]​

13. निराशा, अपराध‑बोध और पुनः उठ खड़े होना

  • अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि “बहुत बार गिर जाता हूँ, ब्रह्मचर्य नहीं रह पाता, अब क्या करूँ?” – इस पर महाराज जी अपराध‑बोध में डूबने के बजाय, पश्चाताप के साथ पुनः प्रयास की शिक्षा देते हैं।[youtube]​[livehindustan]​
  • वे कहते हैं कि गिरने के बाद यदि मन निराश होकर भजन छोड़ दे, तो शत्रु जीत गया; यदि साधक रोकर, पछताकर, फिर से नाम‑जप, सत्संग और गुरु‑शरण में लौट आए, तो यह गिरना भी आगे की सावधानी का कारण बन जाता है।[youtube]​[livehindustan]​
  • “घबराना मत” – इसी भावना से वे कहते हैं कि कामवासना को नष्ट करने का एकमात्र उपाय नाम, भगवत‑रस और शरणागति है; इस मार्ग पर लगे रहो, बीच की ठोकरों से घबराकर वापस न लौटो।[youtube]​
  • वे यह भी समझाते हैं कि पाप‑बोध को रूपांतरित करके “करुणा‑याचना” बनाओ – भगवान से विनती करो कि “दोष मेरा है, बल मेरा नहीं; आप कृपा करके मुझे इस वृत्ति से बाहर निकालिए।”[livehindustan]​[youtube]​

14. भोग से ऊब और परमानंद की चाह

  • महाराज जी यह भी अनुभव कराते हैं कि जो व्यक्ति भीतर से यह अनुभव कर ले कि “बहुत भोग लिया, बहुत देख लिया, अब इससे सच्चा सुख नहीं मिलने वाला”, उसके लिए वैराग्य का द्वार खुल जाता है।[youtube]​[livehindustan]​
  • वे कहते हैं कि लाखों में कोई एक साधक ऐसा होता है जो हृदय से कहता है, “मुझे परमानंद प्रभु चाहिए, भोग अब नहीं”, और जो यह निर्णय कर लेता है, उसका जीवन बदलने लगता है।[youtube]​
  • कामवासना का सुख क्षणिक और बाद में शून्यता, ग्लानि और कमजोरी छोड़ जाता है; इसके विपरीत भगवत‑नाम, कीर्तन और सेवा का आनंद शांत, गहरा और दीर्घकालिक होता है – यह तुलना भीतर स्पष्ट होना जरूरी है।[youtube]​[livehindustan]​
  • जब मन यह मान ले कि “भगवान का प्रेम ही मेरा लक्ष्य है”, तब वह धीरे‑धीरे भोग के अवसरों से स्वयं बचने लगता है, केवल डर से नहीं, बल्कि ऊँचे रस की प्रतीक्षा के कारण।[youtube]​

15. निष्कर्ष: कामवासना से मुक्ति का सम्पूर्ण मार्ग

  • श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अनुसार कामवासना साधक की सबसे जिद्दी वृत्ति है, जो अन्य बुरी आदतें छूट जाने के बाद भी लंबे समय तक बनी रह सकती है; इससे घबराने के बजाय इसे समझकर रणनीति बदलनी है।
  • इस रणनीति के मुख्य स्तंभ हैं:
    • कामवासना से सीधी लड़ाई नहीं, उसके सभी “आश्रय” काट देना।
    • अनन्य नाम‑जप, सत्संग, कथा‑श्रवण और भगवद्‑चर्चा से मन को निरंतर भरण।
    • गुरु‑शरणागति और कृपा‑निष्ठा द्वारा कर्म‑बंधन और वासनाओं का क्रमिक क्षय।
    • वैराग्य की बाढ़, सात्विक जीवन, अनुशासित दिनचर्या और अच्छी संगति।
    • गिरने पर निराश न होकर, पश्चाताप के साथ पुनः नाम‑रूप में लौट आना।
  • अंततः वे यही आशा देते हैं कि जो साधक सच्चे मन से भगवान की शरण पकड़ ले, नाम में मन लगाये, संगति सुधारे और अपने आचरण को शास्त्रोक्त मार्ग पर ढाले, उसकी कामवासना अवश्य क्षीण होगी और भगवत‑रस से उसका हृदय परिपूर्ण हो जाएगा।

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