नाम जप करते हैं पर घर पर प्याज-लहसुन खाते है तो क्या करें? परम पूज्य वृन्दावन रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का दृष्टिकोण (EN)

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परिचय

भारतीय सनातन संस्कृति में भजन, नाम जप और साधना का अत्यंत महत्व है। लेकिन आज के दौर में, जब हम भजन या नाम जप में लगे रहते हैं, तब भी घर के अन्य सदस्य प्याज-लहसुन युक्त भोजन बनाते हैं या खाते हैं। ऐसे में साधक के मन में यह प्रश्न उठता है—क्या हमारा नाम जप सफल होगा? क्या प्याज-लहसुन के कारण साधना में कोई दोष आएगा? क्या इसका कोई समाधान है?

परम पूज्य वृंदावन रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज ने अपने प्रवचनों में इस विषय पर बहुत सरल, व्यावहारिक और गूढ़ मार्गदर्शन दिया है1। इस लेख में हम उन्हीं के विचारों के आधार पर विस्तार से समाधान, कारण, और व्यावहारिक उपाय जानेंगे।

प्याज-लहसुन और साधना का संबंध

तमोगुणी आहार का प्रभाव

  • पूज्य महाराज जी बताते हैं कि प्याज-लहसुन तमोगुणी आहार हैं। तमोगुण का अर्थ है जड़ता, आलस्य, और मन में अशुद्धि का भाव। साधना और भजन के लिए सात्विक (शुद्ध) वृत्ति आवश्यक है, जिससे मन निर्मल और शांत रहता है।

  • प्याज-लहसुन का सेवन मन में तमोगुण बढ़ाता है, जिससे भजन में एकाग्रता और पवित्रता में बाधा आती है।

आहार शुद्धि और मन की शुद्धि

  • “जैसा अन्न, वैसा मन”—यह सनातन सत्य है। अगर भोजन सात्विक रहेगा तो विचार भी शुद्ध रहेंगे। रजोगुण-तमोगुणी भोजन से मन चंचल और भटकाव वाला हो जाता है, जिससे साधना में बाधा आती है।

घर में प्याज-लहसुन बनता है, तो क्या करें?\

1. स्वयं सात्विक रहें, दूसरों को समझाएं

  • सबसे पहले, आप स्वयं सात्विक भोजन अपनाएं। अगर घर में अन्य सदस्य प्याज-लहसुन खाते हैं, तो उन्हें प्रेमपूर्वक समझाएं कि सात्विक भोजन का क्या लाभ है और भजन मार्ग में यह कितना सहायक है1।

  • अगर वे नहीं मानते, तो भी आप अपनी साधना को न छोड़ें। धैर्यपूर्वक अभ्यास जारी रखें।

2. अलग भोजन बनवाएं या अपनाएं

  • अगर संभव हो, तो अपने लिए अलग सात्विक भोजन बनवाएं। अगर घर में सबके लिए एक ही भोजन बनता है, तो आप नमक-रोटी, दही-रोटी, दूध-रोटी जैसे विकल्प चुन सकते हैं1।

  • महाराज जी कहते हैं—”अगर अलग बना के देने को तैयार हैं, तो बढ़िया है। सात्विक भोजन से ही चिंतन सात्विक बनेगा।”

3. संयम और धैर्य रखें

  • भजन मार्ग में थोड़ा कष्ट सहना ही पड़ता है। जबान को संभालना, स्वाद का त्याग करना—यही साधना का मार्ग है1।

  • महाराज जी कहते हैं, “अगर आप खुद नहीं चाहते कि प्याज-लहसुन की चटनी या सब्जी खाएं, तो संयम रखें।”

4. व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएं

  • विद्यार्थी, नौकरीपेशा, आर्मी आदि में जो लोग हैं, उनके लिए हर जगह सात्विक भोजन मिलना मुश्किल है। ऐसे में महाराज जी सलाह देते हैं कि जहां तक संभव हो, सात्विक भोजन लें; अगर कभी मजबूरी में प्याज-लहसुन युक्त भोजन लेना पड़े, तो उसे पाप नहीं मानें, बल्कि दोष (तमोगुण) मानें1।

  • “प्याज-लहसुन खाना पाप नहीं है, पर दोष है—तमोगुण है। उस तमोगुण वस्तु का त्याग करके भजन में बढ़ा जाता है।”

5. औषधि के रूप में अपवाद

  • आयुर्वेद में लहसुन का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। अगर चिकित्सकीय आवश्यकता हो, तो उसे औषधि रूप में लिया जा सकता है, पर भोजन के स्वाद के लिए नहीं।

सात्विक भोजन के लाभ

  • सात्विक भोजन से मन, बुद्धि और शरीर शुद्ध रहते हैं।

  • भजन, नाम जप और साधना में एकाग्रता आती है।

  • मानसिक शांति, प्रसन्नता और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।

  • शरीर स्वस्थ रहता है, और प्रकृति से जुड़ाव बढ़ता है।

भजन मार्ग में आगे कैसे बढ़ें?

1. अभ्यास बढ़ाएं

  • महाराज जी कहते हैं, “अगर 100% में 10% मन भी भजन में लग गया, तो बहुत बड़ी विजय है। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते रहें।”

  • रोज़ थोड़ा-थोड़ा समय बढ़ाते जाएं—चाहे काम करते हुए, चाहे फावड़ा चलाते हुए, चाहे व्यापार करते हुए—मन में नाम जप चलता रहे1।

2. संग शुद्ध रखें

  • आहार के साथ-साथ संग (संगति) भी शुद्ध रखें। अच्छे विचारों, भजन, सत्संग, और सकारात्मक लोगों के साथ रहें1।

3. निष्ठा बनाए रखें

  • अगर कभी घर में प्याज-लहसुन का भोजन बनता है, तो भी अपनी निष्ठा बनाए रखें। अगर परिवार के लोग आपके लिए अलग भोजन बना सकते हैं, तो यह बहुत अच्छा है। अगर नहीं, तो भी आप सात्विक विकल्प चुन सकते हैं1।

व्यावहारिक उदाहरण और प्रेरणा

  • महाराज जी कहते हैं—”वृंदावन में ठाकुर जी को 56 भोग लगते हैं, उनमें प्याज-लहसुन नहीं होता। बिना प्याज-लहसुन के भी सुंदर जीवन जिया जा सकता है।”

  • “बहुत से लोग भ्रम में पड़कर अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। थोड़ा संयम रखें, सात्विक भोजन अपनाएं, और भजन में आगे बढ़ें।”

सारांश

  • नाम जप और भजन-साधना के लिए सात्विक भोजन सर्वोत्तम है।

  • अगर घर में प्याज-लहसुन बनता है, तो भी आप अपनी साधना न छोड़ें।

  • प्रेमपूर्वक परिवार को समझाएं, अलग भोजन बनवाएं, संयम रखें।

  • मजबूरी में अगर लेना पड़े, तो उसे दोष मानें, पाप नहीं।

  • औषधि रूप में लेना हो तो आयुर्वेदाचार्य की सलाह से लें।

  • सात्विक भोजन, शुद्ध संगति, और निरंतर अभ्यास से ही भजन मार्ग में सफलता मिलेगी।

अंतिम संदेश

“भजन मार्ग में सात्विकता का महत्व सबसे अधिक है। अगर आप सात्विक भोजन, शुद्ध संगति और निरंतर अभ्यास को अपनाते हैं, तो भगवान की कृपा से साधना में सफलता निश्चित है। संयम और धैर्य ही आपकी सबसे बड़ी पूंजी है।”

Sources:1 Bhajan Marg by Param Pujya Vrindavan Rasik Sant Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj (YouTube Satsang)

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