आधुनिक शिक्षा: बुद्धि का पतन या पवित्रता की ओर? महाराज जी के उपदेश में समाधान

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लेख

आधुनिक शिक्षा: बुद्धि को भ्रष्ट कर रही है या पवित्र?

आज के समय में यह प्रश्न हर शिक्षक, अभिभावक और समाज के हर जागरूक व्यक्ति के मन में है—क्या आधुनिक शिक्षा हमारी बुद्धि को पवित्र बना रही है या भ्रष्ट कर रही है? इस विषय पर अंबाला से आई महिला शिक्षकों ने जब परम पूज्य वृंदावन रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज से मार्गदर्शन मांगा, तो महाराज जी ने गहन और यथार्थ उपदेश दिया1।

महाराज जी का उपदेश: शिक्षा का उद्देश्य और आज की वास्तविकता

महाराज जी ने कहा कि आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि हमारे बच्चे गंदी आदतों और व्यसनों के शिकार होते जा रहे हैं। चाहे लड़का हो या लड़की, “गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड” कल्चर और व्यसनों के कारण हिंसक प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि—

“हमें लगता है, आधुनिक शिक्षा बुद्धि को भ्रष्ट कर रही है या पवित्र? विद्या विनयम ददाती—जब विद्या बढ़ती है तो विनय, सौम्यता, शालीनता, गंभीरता, जितेंद्रियता, ये आचरण पवित्र होते हैं। आज विद्यालयों में आचरणहीनता फैल रही है।”1

महाराज जी ने यह भी कहा कि यदि यह आचरणहीनता नहीं रोकी गई, तो भारत का भविष्य संकट में पड़ जाएगा।

आधुनिक पढ़ाई से इंद्रियों व मन का नियंत्रण संभव नहीं

महाराज जी ने स्पष्ट किया कि केवल आधुनिक पढ़ाई से इंद्रियों और मन का नियंत्रण संभव नहीं है। उन्होंने उदाहरण दिया कि—

“आधुनिक पढ़ाई के साथ यदि आध्यात्मिक पढ़ाई नहीं होगी, तो इंद्रियों का नियंत्रण, माइंड का कंट्रोल, ओवरथिंकिंग, डिप्रेशन जैसी समस्याएँ बढ़ती जाएँगी।”1

उन्होंने बताया कि जब तक बच्चों को गीता, भागवत, नाम जप, ब्रह्मचर्य जैसे आध्यात्मिक मूल्यों का प्रकाश नहीं मिलेगा, तब तक उनका मन और आचरण नियंत्रित नहीं हो सकता।

समस्या के लक्षण: समाज में बढ़ती अशांति

महाराज जी ने कहा कि आज बच्चे अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते, हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं। पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य केवल डिग्री या नौकरी नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण होना चाहिए। उन्होंने कहा—

“विद्या का मतलब होता है ज्ञान, और ज्ञान का मतलब होता है सौम्य सदाचार, पवित्रता व्यवहार में आ जाए।”1

समाधान: शिक्षा में आध्यात्मिकता का समावेश

महाराज जी ने शिक्षकों को उपदेश दिया कि—

  • बच्चों को चरित्र पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए।

  • आचरण, विचार, भोजन—सब पवित्र रहें।

  • माता-पिता के चरण छूना, भगवान का नाम जपना, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

  • जब तक विवाह न हो, ब्रह्मचर्य का पालन करें।

  • गुरु और टीचर का सम्मान करें, क्योंकि बिना अनुशासन के पढ़ाई अधूरी है।

उन्होंने कहा कि यदि शिक्षक अपने प्रभाव क्षेत्र में बच्चों को चरित्र निर्माण, पवित्रता, और आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करें, तो नई पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है1।

शिक्षकों के लिए संदेश

महाराज जी ने शिक्षकों से कहा—

“आपकी जहाँ तक पहुँच है, बच्चों को चरित्र पवित्रता पर ध्यान दीजिए। आचरण, विचार, भोजन पवित्र रहे, तभी जीवन उन्नतशील रहेगा।”1

निष्कर्ष

आधुनिक शिक्षा यदि केवल भौतिक ज्ञान तक सीमित रह जाए, तो वह बुद्धि को भ्रष्ट कर सकती है। लेकिन यदि उसमें आध्यात्मिकता, चरित्र निर्माण, और संस्कारों का समावेश हो, तो वही शिक्षा बुद्धि को पवित्र बना सकती है। महाराज जी का संदेश है कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देना, मन और इंद्रियों का संयम, और चरित्र की पवित्रता है।

निष्कर्ष में

आधुनिक शिक्षा तभी सार्थक है जब उसमें आध्यात्मिकता और चरित्र निर्माण का समावेश हो। केवल भौतिक ज्ञान से मन और इंद्रियों का नियंत्रण संभव नहीं—इसके लिए जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन, संस्कार और आचरण की पवित्रता जरूरी है।

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