मोबाइल पर अचानक सामने आ जाने वाले “गलत दृश्य” को देखने की आदत सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, यह मन और भक्ति दोनों की परीक्षा है। इस प्रवचन में महाराज जी ने इसे स्पष्ट रूप से गलत बताया, इससे आध्यात्मिक उन्नति रुकती है और साधक को कठोर निर्णय लेकर इसे त्यागने का संदेश दिया है।
गलत दृश्य देखने की आदत क्यों खतरनाक है
- प्रश्नकर्ता कहती है कि भजन, नामजप और प्रवचन सुनने के बाद भी जब मोबाइल पर बुरा दृश्य सामने आता है तो वह उसे देख लेती हैं, जबकि जानती भी हैं कि यह गलत है।
- महाराज जी साफ कहते हैं – “नहीं देखना चाहिए… यह गलत बात है… ये गलत आदत को छोड़िए”, और बताते हैं कि गलत आदत को अपनाने से भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ना असंभव हो जाता है।
- वे समझाते हैं कि जो दृश्य हमारे मार्ग के नहीं हैं, उन्हें देखते रहने से भीतर गलत आचरण की इच्छा जागती है और मन उसी दिशा में खिंचने लगता है।
- इस प्रकार मोबाइल से दिखने वाले गलत दृश्य सिर्फ आंखों तक सीमित नहीं रहते, वे चित्त पर छाप छोड़ते हैं और काम-विकार को बढ़ाकर भक्ति की शुद्धता नष्ट कर देते हैं।
भक्ति का सही अर्थ क्या है
- महाराज जी बताते हैं कि भक्ति का मतलब केवल वेश बदल लेना या बाहरी साधु जैसा रूप धारण कर लेना नहीं है; भक्ति का असली अर्थ प्यार है – अच्छे आचरण के साथ दिल से भगवान का भजन।
- वे कहते हैं कि आप पट–शर्ट, सलवार–कुर्ता या साधारण वेश में भी सच्ची भक्ति कर सकते हैं, यदि आपका व्यवहार सात्त्विक हो और मन भगवान की ओर लगा हो।
- भक्ति का केंद्र बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि भीतर की स्मृति और चरित्र की निर्मलता है; इसलिए मोबाइल पर गलत दृश्य देखना भक्ति की जड़ पर प्रहार करने जैसा है।
- जब भक्ति को सिर्फ कपड़े, भाषा या मंच तक सीमित कर दिया जाता है, तब व्यक्ति भूल जाता है कि असली कसौटी यह है कि उसके विचार, दृष्टि और व्यवहार कितना शुद्ध हुआ है।
कठोर निर्णय की आवश्यकता
- महाराज जी बार-बार जोर देते हैं कि ऐसे दृश्य “तुरंत हटाना पड़ेगा” और जो दृश्य हमारे मार्ग के नहीं हैं, उन्हें नहीं देखना है; साधक को यहाँ कठोर बनना पड़ेगा।
- वे चेतावनी देते हैं कि आज के नौजवान मोबाइल पर गलत बातें देखकर बहुत गलत होते जा रहे हैं और गलत आचरणों में प्रवृत्त हो रहे हैं, इसलिए साधक को अपने लिए स्पष्ट रेखा खींचनी होगी।
- यह कठोरता बाहरी कठोर व्यवहार नहीं, बल्कि आत्म-संयम है – जैसे ही गलत दृश्य दिखे, तुरंत स्क्रीन बदल देना, ऐप बंद कर देना या ऐसी सामग्री के स्रोत को ही हटाना इस निर्णय का हिस्सा है।
- महाराज जी कहते हैं कि यदि इन बातों को जारी रखा जाएगा तो “भक्ति कैसे होगी? बिल्कुल नहीं”, यानी आध्यात्मिक यात्रा वहीं रुक जाएगी, चाहे बाहरी रूप से कितना ही धार्मिक वातावरण क्यों न हो।
भगवत मार्ग पर सही प्रगति के संकेत
- दूसरे प्रश्न के उत्तर में महाराज जी बताते हैं कि भगवत मार्ग के पथिक को सही दिशा में चलने का पहला संकेत यह है कि कामादि विकार निष्प्रभावी होने लगें।
- वे कहते हैं कि जो काम पूरे त्रिभुवन को अधीन किए हुए है, भक्त के हृदय में वही काम भगवान के प्रभाव से स्फुरित होकर नष्ट होने लगता है, और उसके आकर्षण में कमी आनी शुरू हो जाती है।
- परिवार के मोह का आकर्षण, धन की महत्ता, मान–प्रतिष्ठा की चाह – ये सब सुनने लगें, यानी मन इन्हें बहुत बड़ा न मानने लगे, तो समझना चाहिए कि नामजप, कथा, सत्संग का सच्चा लाभ मिलने लगा है।
- यदि अभी भी बुद्धि विकारग्रस्त है, धन पर अधिक महत्त्वबुद्धि है, मान–प्रतिष्ठा की तीव्र चाह है, तो महाराज जी कहते हैं – “अभी भजन का रंग नहीं आया”, अर्थात भक्ति अभी गहराई तक नहीं उतरी।
विकारों पर विजय ही सच्ची उन्नति
- महाराज जी स्पष्ट संकेत देते हैं कि भजन का रंग तभी माना जाएगा जब काम, क्रोध, मद, मान, लोभ, राग–द्वेष आदि विकारों पर विजय प्राप्त हो जाए और हृदय शांत हो, बिना किसी स्वार्थी चाह के।
- वे दोहावली के रूप में कहते हैं कि जिनके हृदय में कपट, दंभ और माया नहीं होती, उन्हीं के हृदय में रघुनाथ का वास होता है; यह आंतरिक शुद्धि ही भगवत साक्षात्कार से पहले की तैयारी है।
- जब मन में निरंतर भगवत स्मृति, विकारों पर विजय और मान–मदादि का त्याग होने लगे, और भीतर अद्भुत आनंद व उमंग के साथ केवल एक ही पुकार रहे – “कब मिलेंगे प्रभु” – तो समझना चाहिए कि मार्ग बहुत ठीक है।
- यदि अभी भी कंचन (धन), कामिनी (इंद्रिय-सुख) और कीर्ति (मान–प्रतिष्ठा) में प्रियता है, तो महाराज जी कहते हैं कि मार्ग अभी ठीक नहीं है और अध्यात्म मार्ग में वास्तविक उन्नति नहीं हो रही।






