भजन को भगवान को समर्पित करने से उसका ब्याज भी मिलता है – यही भाव इस प्रवचन का केन्द्रीय संदेश है। नाम-जप और भजन को महाराज जी “भगवतिक बैंक” की एफडी की तरह समझाकर बताते हैं कि मूल धन भगवत-प्राप्ति के रूप में सुरक्षित रहता है और इच्छाओं की पूर्ति मानो उसके ब्याज से हो जाती है।
भागवत बैंक और नाम-जप का ब्याज
सत्संग की शुरुआत में संजय जी ग्वालियर से प्रश्न करते हैं कि वे नाम-जप करते हैं, उसे श्रीजी को समर्पित भी कर देते हैं और बदले में कोई इच्छा-भाव नहीं रखते, पर मन में कई इच्छाएं उत्पन्न हो जाती हैं, जब भगवान उन्हें पूर्ण कर देते हैं तो क्या नाम-जप खर्च हो जाता है या भागवत बैंक में जमा नाम-जप के ब्याज से यह सब होता है। वे पूछते हैं कि अगर हमने नाम-जप भगवान की बैंक में जमा कर दिया और कोई कार्य पूरा हो जाए, तो क्या वह ब्याज में हो जाएगा, मूल नाम-जप तो सुरक्षित रहेगा न।
महाराज जी उत्तर में बड़े सरल शब्दों में कहते हैं कि यदि तुम नाम-जप को भगवान को समर्पित कर देते हो, तो जो भी कामनाएं पूर्ण होंगी, वे उसी के ब्याज में होंगी, मूल धन अर्थात नाम-जप का आध्यात्मिक फल सुरक्षित रहेगा। वे स्पष्ट कहते हैं – “नाम जप जो भगवान को समर्पित कर रहे हो तो उसके ब्याज में हो जाएगा, मूल तो भगवत प्राप्ति होगी।”
भारतीय बैंक और सरकारी ठाकुर जी की बैंक
महाराज जी नाम-जप के फल को समझाने के लिए भारतीय बैंक का बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। वे हंसते हुए पूछते हैं – “भारतीय बैंक ब्याज नहीं देती क्या, एफडी बना दो, जब भारतीय बैंक दे रही है तो सरकारी ठाकुर जी की बैंक हमें ब्याज नहीं देगी?” वे कहते हैं कि जैसे भारतीय बैंक में एफडी करने पर मूल राशि सुरक्षित रहती है और उस पर ब्याज मिलता रहता है, वैसे ही भगवान की बैंक में जमा किया गया भजन, नाम-जप और साधना का मूल फल भगवत-प्राप्ति के रूप में सुरक्षित रहता है।
वे आगे कहते हैं कि भारतीय बैंक में यदि आप पैसा रखें या एफडी भी न बनाएं तो भी किसी न किसी रूप में ब्याज व्यवस्था मिल ही जाती है, तो जो सारी व्यवस्था चलाने वाले भगवान हैं, उनकी दिव्य “सरकारी बैंक” भला भक्तों को ब्याज क्यों न देगी। उनका स्पष्ट संकेत है कि जो भी सांसारिक या आध्यात्मिक लाभ भक्त को मिलते हैं, वे समर्पित भजन के ब्याज जैसे हैं, जबकि वास्तविक मूल धन अंततः भगवान की प्राप्ति के रूप में प्रकट होता है।
सकाम भक्ति से निष्काम भक्ति तक
महाराज जी बताते हैं कि हर एक की भक्ति प्रायः सकामता से ही शुरू होती है और धीरे-धीरे निष्कामता में पूर्ण होती है। वे कहते हैं कि यदि धन की आकांक्षा है, संकट निवारण की इच्छा है या परिवार के सुख की कामना है, तो भी कोई दोष नहीं, व्यक्ति भगवान से जुड़े, भगवान से मांगे, भगवान से ही प्रार्थना करे।
वे यह भी समझाते हैं कि यदि भगवान किसी इच्छा को पूर्ण नहीं करते, तो उसे भी भगवान की कृपा का विधान मानना चाहिए। भगवान सर्वज्ञ हैं, मंगलमय हैं और बहुत बड़े दाता हैं, यदि वे कोई वस्तु या स्थिति नहीं देते, तो उसके पीछे भी भक्त के कल्याण का ही रहस्य होता है। इसीलिए वे कहते हैं कि हमें दूसरों से न मांगना चाहिए, केवल भगवान से ही मांगना चाहिए और यदि वे न दें तो विश्वास रखना चाहिए कि ऐसा न देना ही हमारे लिए अधिक मंगलकारी था।
इच्छाओं की पूर्ति और इच्छा का नाश
महाराज जी बताते हैं कि भगवान जब इच्छाएं पूर्ण करते हैं, तो दो तरह से काम करते हैं। या तो इतना सुख दे देते हैं कि मन तृप्त हो जाता है और पुनः उसी प्रकार की लौकिक लालसा पकड़ कम हो जाती है, या फिर वे उस कामना का ही नाश कर देते हैं।
वे संकेत करते हैं कि भजन-साधना और नाम-जप का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि मन की वृत्तियों का शुद्ध होना और अंततः भगवत-प्राप्ति है। कामनाओं की पूर्ति यदि भगवत-पथ पर आगे बढ़ने में सहायक हो, तो वह भी कृपा है, और यदि भगवान किसी इच्छा को रोक दें, तो वह भी उतनी ही बड़ी कृपा है, क्योंकि इससे मन निष्कामता की ओर अग्रसर होता है।
भगवान से मांगने का अधिकार और उदार भक्त
महाराज जी यह भ्रांति दूर करते हैं कि जो भगवान से मांगता है, वह अभक्त है। वे स्पष्ट कहते हैं कि भगवान ने ऐसे मांगने वाले भक्त को “उदार भक्त” कहा है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान दाता के सामने अपना दीन भाव रखता है और केवल उसी के सामने हाथ फैलाता है।
वे कहते हैं कि भगवान से धैर्यपूर्वक मांगो, इसमें कोई निषेध नहीं है। मुख्य बात यह है कि मांगते समय विश्वास हो कि जो वे देंगे या नहीं देंगे, वही हमारे लिए सर्वोत्तम होगा और मांग केवल भगवान से की जाए, संसार से नहीं। इससे मन में भगवान के प्रति गहरा विश्वास और समर्पण का भाव दृढ़ होता है और भक्ति का मार्ग स्थिर बनता है।
समर्पण की अत्यंत आवश्यकता
आगे महाराज जी भजन और नाम-जप को भगवान को समर्पित करने की महत्ता पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें समर्पित करना अत्यंत आवश्यक है, यदि समर्पण नहीं करते तो जो फल मिलता है, वह फलभोग में खर्च हो जाएगा और मूल आध्यात्मिक संपदा मानो घटती चली जाएगी।
इसीलिए वे “कृष्णार्पणमस्तु” या “राधा वल्लभपणमस्तु” जैसे भाव से सब कुछ ईष्टदेव को अर्पित करने की प्रेरणा देते हैं। वे समझाते हैं कि यदि पैसा घर में रखोगे तो खर्च करने पर समाप्त होता जाएगा, लेकिन बैंक में रखोगे तो उसके ब्याज से खर्च चलता रहेगा और मूल बैंक में जमा रहेगा, ठीक इसी प्रकार भजन को यदि समर्पण के साथ “भगवतिक बैंक” में जमा कर दो, तो मूल भक्ति सुरक्षित रहती है और फल रूप में जो भी मिलता है, वह ब्याज की तरह मिलता रहता है।
टैक्स-फ्री कृपा और ईश्वरीय व्यवस्था
महाराज जी आगे कहते हैं कि भगवान की यह बैंक पूरी तरह टैक्स-फ्री है, इसमें कोई टैक्स नहीं लगता। वे उदाहरण देते हैं कि भगवान ने वायु दी, कोई टैक्स नहीं; सूर्य का प्रकाश दिया, कोई टैक्स नहीं; धरती पर वास दिया, कोई टैक्स नहीं; जल दिया, कोई टैक्स नहीं; आकाश दिया, कोई टैक्स नहीं; मनुष्य शरीर दिया, कोई टैक्स नहीं – सब कुछ फ्री में दिया है।
वे बताते हैं कि भगवान निरंतर बिना मूल्य और बिना कर के अनंत प्रकार की कृपा बरसा रहे हैं। संतजन इसलिए प्रयत्नशील रहते हैं कि समाज भागवतिक बने, भगवत-केन्द्रित सोच विकसित हो और लोग इस सहज, निशुल्क, कर-मुक्त दिव्य अनुग्रह का लाभ लें।
आज की मानसिकता और मांसाहार की समस्या
महाराज जी आज की समाज की मानसिकता पर चिंता प्रकट करते हुए कहते हैं कि लोगों की मानसिकताएं बिगड़ रही हैं। वे कहते हैं कि लोग केवल जीभ के स्वाद के लिए मुर्गा, भैंसा, गाय, बकरी सबको खा रहे हैं और यह सोचते हैं कि इससे वे बलवान बन जाएंगे, जबकि यह गलत बात है।
वे समझाते हैं कि वास्तविक बल ब्रह्मचर्य, पवित्र भोजन और व्यायाम से आता है, मांसाहार से नहीं। हमारे यहां गाय कितना दूध देती है, उसका घी, मक्खन, मट्ठा, खोया – कितने पवित्र और स्वास्थ्यप्रद पदार्थ सहज उपलब्ध हैं, फिर भी लोग पशु हत्या और गौ-हत्या जैसे अधर्म में लिप्त हो रहे हैं।
रामराज्य, अहिंसा और दिव्य आनंद
महाराज जी कहते हैं कि यदि ये सब गंदी बातें, विशेषकर पशु हत्या और गौ-हत्या, बंद हो जाएं, तो हमारे प्रभु का जिसे रामराज्य कहते हैं, वह छा जाएगा। वे कहते हैं कि ऐसा रामराज्य आने पर बिना किसी विशेष प्रयास के सर्व-सुख की प्राप्ति हो जाएगी और समाज में आनंद ही आनंद छा जाएगा।
वे याद दिलाते हैं कि यह सृष्टि भगवान ने रची है, हम सब भगवान के ही बंदे हैं, और जो कानून उन्होंने बनाया है, उसी के अनुसार चलना हमारा धर्म है। मांसाहार को वे राक्षसों और हिंसक पशुओं का भोजन बताते हैं, मनुष्यों के लिए नहीं, क्योंकि मनुष्य के लिए छप्पन भोग के छत्तीस व्यंजन रचे गए हैं, जिन्हें भगवान को अर्पित करके प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य, व्यायाम और वास्तविक बल
महाराज जी बार-बार ब्रह्मचर्य और पवित्र आहार पर बल देते हैं। वे प्रेरित करते हैं कि ब्रह्मचर्य ठीक रखिए, पवित्र भोजन कीजिए, व्यायाम कीजिए और फिर देखिए कि आपका शरीर स्वस्थ रहता है या नहीं।
वे प्रश्न करते हैं कि कौन ऐसा है जो मांस भक्षण करके बहुत बड़ा बलवान बना हो। इसके विपरीत वे हनुमान जी का उदाहरण देते हैं कि हमारे यहां परम ब्रह्मचारी हनुमान जी महाराज हैं, जिनकी शक्ति का वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि हनुमान जी के पैर पड़ जाएं तो गिरि-चरण से ही पाताल तक आघात हो जाता था, पहाड़ पाताल में चला जाता था, लंका में घुसकर उन्होंने राक्षसों का संहार किया, हजारों को पकड़-पकड़ कर अपनी जंघा पर पटक दिया।
हनुमान जी की शक्ति का रहस्य
महाराज जी बताते हैं कि हनुमान जी की शक्ति दो मुख्य स्तंभों पर टिकी थी – भगवान का बल और ब्रह्मचर्य का बल, साथ ही नाम-जप की अखंड साधना। वे कहते हैं कि हनुमान जी की विजय का रहस्य ही यह था कि वे परम ब्रह्मचारी थे और हर क्षण भगवान के नाम का जप करते थे।
इसके विपरीत वे आज के मनुष्य की स्थिति बताते हैं कि आज हमारे अंदर व्यभिचार, नशा और गंदा चिंतन भर गया है, इसीलिए सब मरे हुए जैसे टहल रहे हैं। वे एक वाक्य में कहते हैं – “मुर्दा है जिन हरि भगत हृदय नहीं”, अर्थात जिसके हृदय में हरि-भक्ति नहीं, वह जीते-जी भी मानो मृत समान है।
अधर्म के मार्ग से बचने की प्रार्थना
महाराज जी विनती करते हैं कि नर्क जाने का रास्ता पक्का मत करो। वे साफ कहते हैं – मांस मत खाओ, शराब मत पियो, भगवान के चरणों का आश्रय लेकर नमक-रोटी खाओ, पर धर्म से चलो।
वे आश्वासन देते हैं कि यदि व्यक्ति धर्म से चलेगा, पाप से बचेगा और भगवान के आश्रय में रहेगा, तो उसके अंदर ऐसा बल आएगा जो हार नहीं, केवल विजय ही दिलाएगा। इस बल का स्रोत बाहरी पदार्थ नहीं, बल्कि भीतर की भक्ति, नाम-जप, ब्रह्मचर्य और पवित्र जीवन है।
“खाओ-पियो-मौज करो” की मान्यता का परिणाम
महाराज जी बताते हैं कि आजकल समाज में एक मान्यता चल रही है – “खाओ, पियो, मौज लो, इसके बाद जो होगा देखा जाएगा।” वे चेतावनी देते हैं कि यह दृष्टिकोण अत्यंत विनाशकारी है, क्योंकि दुर्गत काल आने पर भगवान के न्याय से कोई बच नहीं सकता।
वे कठोर किंतु सच्ची बात कहते हैं कि जैसे तुम पशुओं को जला-जला कर खाते हो, वैसे ही आगे चलकर स्वयं भी जीवित जलना पड़ेगा, अर्थात नरक और दीन-दुःखी जीवन के भयंकर परिणामों का सामना करना पड़ेगा। इसीलिए वे आग्रहपूर्वक कहते हैं कि यदि सचमुच सुखी रहना चाहते हो, मौज-मस्ती में रहना चाहते हो, तो अधर्म मत करो, पाप मत करो।
नाम-जप, पवित्र भोजन और उपकार का मार्ग
समापन की ओर महाराज जी सबको प्रेरित करते हैं कि नाम-जप करो, पवित्र भोजन ग्रहण करो और दूसरों का उपकार करो। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति अपने जीवन में भगवान के नाम का जप करता है, सात्विक और पवित्र भोजन करता है और दूसरों के प्रति उपकारी भाव रखता है, वह सदैव सुखी और शांत बना रहता है।
इस पूरी चर्चा का सार वे यही दिखाते हैं कि भगवान के चरणों का आश्रय लेकर साधारण जीवन भी अत्यंत सुखी, शांत और बलपूर्ण बन सकता है। यहां भजन, नाम-जप और समर्पण जीवन की मुख्य धुरी बन जाते हैं, जिनके चारों ओर संपूर्ण चरित्र, आहार-विहार और व्यवहार व्यवस्थित होता है।
भजन समर्पण, ब्याज और भगवत-प्राप्ति
प्रवचन के मूल प्रश्न – “क्या भगवान को भजन समर्पित करने से उसका ब्याज भी मिलेगा?” – का उत्तर महाराज जी पूरे प्रवाह में बार-बार स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जब भजन, नाम-जप और साधना को पूर्ण समर्पण भाव से भगवान की बैंक में जमा कर दिया जाता है, तो उससे दो प्रकार का लाभ मिलता है – एक तो ब्याज के रूप में सांसारिक और सूक्ष्म आध्यात्मिक लाभ, और दूसरा मूल धन के रूप में अंतिम भगवत-प्राप्ति।
वे समझाते हैं कि जो भी इच्छाएं भगवान पूर्ण करते हैं, वे उसी ब्याज के खाते से पूरी होती हैं, मूल नाम-जप और भक्ति का फल सुरक्षित रहते हुए आगे बढ़ता रहता है। इसीलिए वे बार-बार प्रेरित करते हैं – खूब नाम-जप करो, जैसे बने वैसे नाम-जप करो, भाव से, कु-भाव से, आलस में भी नाम-जप करो, क्योंकि नाम-जप सर्व-मंगलकारी है और भजन को भगवान को समर्पित करना अत्यंत आवश्यक है।
इस प्रकार, महाराज जी की वाणी में भजन समर्पण का अर्थ है – जीवन, कर्म, इच्छाओं और साधना सबको भगवान की “सरकारी बैंक” में जमा कर देना, जहां से ब्याज के रूप में सुख-शांति, संकट-निवारण और आवश्यकताएं पूर्ण होती रहती हैं और मूल में जीवन की परम निधि, भगवत-प्राप्ति, भक्त को प्रदान होती है।






