क्या सच में सुरक्षित है बच्चों को मेड के हवाले छोड़ना?

बच्चों को पूरा‑का‑पूरा दिन या ज़्यादातर समय मेड/नैनी के भरोसे छोड़ देना न तो पूरी तरह सुरक्षित है और न ही उनके समग्र व्यक्तित्व‑विकास के लिए आदर्श माना जाता, लेकिन सही चुनाव, प्रशिक्षण, निगरानी और माता‑पिता की सक्रिय भागीदारी के साथ यह एक व्यावहारिक और कई बार मददगार व्यवस्था बन सकती है। भारत में कामकाजी माता‑पिता, संयुक्त परिवारों के टूटने और शहरों की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के कारण बहुत‑से माता‑पिता बच्चों की देखभाल के लिए मेड/नैनी पर निर्भर हो रहे हैं, पर विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते हैं कि अगर माता‑पिता ने दूरी बना ली तो बच्चे में असुरक्षा, भावनात्मक दूरी और व्यवहार की समस्याएँ बढ़ सकती हैं।​


भारत में मेड के पास बच्चे क्यों छोड़े जाते हैं?

  • दोहरे करियर वाले माता‑पिता: शहरों में माँ और पिता दोनों नौकरी करते हैं, दफ्तर के घंटे लंबे हैं और ट्रैफिक भी ज़्यादा है, इसलिए पूरे समय बच्चे के साथ रहना संभव नहीं होता।​
  • संयुक्त से एकल परिवार: पहले दादी‑नानी बच्चों को संभाल लेती थीं, अब अलग‑अलग शहरों में बसने से घरेलू सपोर्ट कम हो गया, इस गैप को भरने के लिए मेड रखी जाती है।​
  • डे‑केयर की कमी/महँगा विकल्प: अच्छे डे‑केयर सेंटर्स हर जगह नहीं हैं या बहुत महँगे हैं, जबकि घर पर रहने वाली या पार्ट‑टाइम मेड अपेक्षाकृत सस्ती पड़ती है।​
  • सुविधा और लचीलापन: मेड एक साथ घर के काम भी कर देती है और समय भी परिवार के हिसाब से एडजस्ट कर लेती है, इसलिए माता‑पिता को व्यावहारिक समाधान जैसा लगता है।​

स्वास्थ्य और सुरक्षा: जोखिम और हकीकत

  • शारीरिक सुरक्षा के मामले: कई रिपोर्टेड केस हैं जिनमें डे‑केयर या स्कूल की आया/मेड ने छोटे बच्चों को मारा, झकझोरा या जान‑बूझकर चोट पहुँचाई, जैसे नोएडा के डे‑केयर में 15 महीने की बच्ची को अटेंडेंट द्वारा पटकने का मामला या हैदराबाद के स्कूल में अटेंडेंट द्वारा नर्सरी की बच्ची पर हमला।​
  • निगरानी की कमी: कई बार माता‑पिता सोचते हैं बच्चे “खुश” हैं, लेकिन बाद में सीसीटीवी या बच्चे की बॉडी पर निशान से पता चलता है कि उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ।​
  • स्वच्छता और हेल्थ: प्रशिक्षित केयर‑गिवर न होने पर मेड को सही हाथ धोने, खाना सुरक्षित ढंग से देने, दवाइयों की डोज़, टीकाकरण आदि की समझ नहीं होती, इससे संक्रमण, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।​

व्यक्तित्व‑विकास पर असर: विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

  • भावनात्मक दूरी और असुरक्षा: क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रerna Kohli लिखती हैं कि जब बच्चा ज़्यादातर समय मेड के साथ रहता है और माँ‑बाप व्यस्त रहते हैं, तो बच्चे में असुरक्षा, अकेलापन और लो‑सेल्फ‑एस्टीम जैसी समस्याएँ विकसित हो सकती हैं, खासकर अगर मेड का व्यवहार रूखा हो।​
  • बंधन किससे बनता है: टाइम्स ऑफ इंडिया की बाल‑मनोचिकित्सक डॉ. मंजू मेहता बताती हैं कि जब रोज़मर्रा के काम – नहलाना, खाना खिलाना, स्कूल छोड़ना‑लाना – सबकी ज़िम्मेदारी मेड की हो जाती है, तो माता‑पिता और बच्चे के बीच भावनात्मक बंधन कमज़ोर हो सकता है।​
  • अनुशासन और व्यवहार: रिपोर्ट्स में माता‑पिता ने नोट किया कि जब उन्होंने खुद बच्चों को संभाला तो बच्चे ज़्यादा अनुशासित रहे, जबकि मेड के साथ रहने पर वे “ढीले” और कभी‑कभी मनमानी करने वाले बन गए, क्योंकि मेड ना तो सख्ती कर पाती है और न ही लगातार सीमाएँ तय कर पाती है।​
  • मूल्य‑बोध और दूसरों के प्रति व्यवहार: अगर बच्चा देखता है कि घर में मेड के साथ रूखा या अपमानजनक व्यवहार होता है, तो वह भी कमजोर या निर्भर लोगों को कमतर समझने लगता है, इससे उसके अंदर बराबरी और सम्मान की भावना कमज़ोर पड़ सकती है।​

कब और कैसे मेड के पास रखना अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है?

  • चयन और वेरिफिकेशन:
    • विश्वसनीय एजेंसी या रेफरेंस से मेड लेने, पुलिस वेरिफिकेशन, आईडी‑प्रूफ और पिछला अनुभव ज़रूरी माना जाता है ताकि क्राइम या दुर्व्यवहार का जोखिम कम हो।​
    • बच्चों के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित नैनी/चाइल्ड‑केयर मेड में शुरुआती बाल‑शिक्षा, फर्स्ट‑एड और सेफ्टी की ट्रेनिंग बेहतर होती है।​
  • स्पष्ट नियम और सीमाएँ:
    • विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि माता‑पिता मेड की भूमिका साफ तय करें – वह बच्चे को संभालेगी, लेकिन भावनात्मक निर्णय, अनुशासन की मुख्य ज़िम्मेदारी और महत्वपूर्ण बातचीत माता‑पिता के हाथ में रहे।​
    • किस तरह की सज़ा बिल्कुल मना है, कौन‑सा व्यवहार स्वीकार्य नहीं है, यह शुरुआत में ही स्पष्ट कर देना चाहिए।​
  • निगरानी और सहभागिता:
    • घर में सीसीटीवी, अचानक विज़िट, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से समय‑समय पर फीडबैक लेने से बच्चे की सेफ्टी पर नज़र रखी जा सकती है।​
    • दिन में काम से लौटने के बाद 1–2 घंटे “क्वालिटी‑टाइम” – कहानी सुनाना, खेलना, बच्चे की बात ध्यान से सुनना – बच्चे के भावनात्मक विकास के लिए ज़्यादा मायने रखता है।​
  • सीमित अवधि और उम्र पर ध्यान:
    • नवजात और बहुत छोटे बच्चों (पहले कुछ हफ्ते) के लिए “जापा मेड” जैसी प्रशिक्षित देखभाल करने वालों की भूमिका सिर्फ सपोर्ट के रूप में होनी चाहिए, मुख्य बॉन्डिंग फिर भी मां‑बाप से ही हो।​
    • जैसे‑जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे मेड पर नहीं, माता‑पिता, स्कूल, दोस्त और खुद के अनुभवों पर ज़्यादा निर्भर होने देना स्वस्थ व्यक्तित्व के लिए बेहतर माना जाता है।​

क्या मेड के पास छोड़ना पूरी तरह गलत है?

  • व्यावहारिक ज़रूरत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: बड़े शहरों में बढती नौकरी की माँग और महँगाई के कारण बिना मदद के बच्चों और घर दोनों को संभाल पाना कई परिवारों के लिए लगभग असंभव है, इसलिए “मदद लेना” गलत नहीं है।​
  • संतुलन की कुंजी: विशेषज्ञ साफ कहते हैं – समस्या मेड होने से नहीं, मेड पर भावनात्मक, अनुशासनिक और नैतिक रूप से “पूरी निर्भरता” से शुरू होती है; माता‑पिता अगर उपस्थित, सजग और जुड़े रहें तो बच्चा अपेक्षाकृत संतुलित रह सकता है।​
  • क्या करें, क्या न करें (संक्षिप्त सलाह):
    • पूरी बैकग्राउंड जाँच और रेफरेंस के बिना कभी भी बच्चे के साथ अकेले मेड न छोड़ें​
    • बच्चे को सिखाएँ कि अगर कोई उसे मारे, डाँटे, गलत तरीके से छुए या डराए तो तुरंत माँ‑पापा को बताए।​
    • रोज़ बच्चे से खुलकर बात करें – “दिन कैसा था, मेड/दीदी ने क्या किया, तुम्हें अच्छा लगा या बुरा?” – ताकि छोटी समस्या बड़ी घटना बनने से पहले पकड़ी जा सके।​

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