इष्ट से भी इष्ट के नाम में प्रेम का मतलब है – साधक का हृदय जिस नुक्कड़ पर सबसे ज़्यादा टिका रहे, वह इष्ट का नाम हो जाए, वही उसकी असली साधना और असली पहचान बन जाए। इस एक वाक्य में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविन्द शरण महाराज की नाम–भक्ति, आत्मसमर्पण और सत्य–आधारित जीवन की पूरी दिशा संकेत रूप में समा जाती है।
1. “इष्ट से भी इष्ट के नाम में प्रेम” – मूल भाव
- महाराज जी समझाते हैं कि इष्ट (भगवान का रूप, विग्रह या लीला) तो क्षण–क्षण आँखों के आगे नहीं रहता, लेकिन उनका नाम तो हर समय जप में, स्मरण में, श्वासों में रह सकता है; इसलिए साधक के लिए नाम सबसे बड़ा सहारा है।
- जब इष्ट के नाम में प्रेम बस जाता है, तो व्यक्ति भय, असुरक्षा और अकेलेपन से स्वतः मुक्त होने लगता है; नाम स्मरण उसके मन का आंतरिक सहारा बन जाता है।
एक साधारण उदाहरण से समझें – किसी प्रिय व्यक्ति की फोटो आप हर जगह साथ नहीं रख पाते, लेकिन उसका नाम आपकी ज़ुबान और मन से कभी दूर नहीं होता; ऐसा ही संबंध भक्त और इष्ट–नाम के बीच हो जाए, यही इस वाक्य का सार है।
2. नाम जप: जीवन का पहला कर्तव्य
- महाराज जी के अनुसार जीवन का पहला कर्तव्य भगवद् स्मरण और नाम–जप का अभ्यास है; इसके बिना जीवन का असली उद्देश्य पूरा नहीं होता, चाहे बाहरी सफलता कितनी ही क्यों न हो।
- वे बार–बार कहते हैं कि “कल” कभी आता नहीं, इसलिए जो नाम जप करना है, वही अभी करना है; साधक अगर टालता रहा तो पूरा जीवन “कल से शुरू करूंगा” में निकल सकता है।
वे बताते हैं कि संन्यासी ही नहीं, गृहस्थ भी अपने परिवार, काम–धंधे के साथ–साथ नाम जप को जीवन में पिरो सकता है – चलते–फिरते, रसोई में, दफ्तर में, वाहन चलाते समय भी मन ही मन नाम चलता रह सकता है।
3. सामने इष्ट हों तब भी नाम न छोड़ना
- पूज्य महाराज जी एक गहरे भाव का उल्लेख करते हैं – अगर स्वयं भगवान सामने आ जाएँ, तब भी नाम–जप नहीं छोड़ना चाहिए; त्रिभुवन की ऐश्वर्य–लक्ष्मी मिल जाए, तब भी एक क्षण के लिए नाम का सौदा न किया जाए।
- इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान के दर्शन का अनादर हो, बल्कि यह है कि सच्चा प्रेम उस नाम से है जिसने भगवान तक पहुँचा दिया; अगर दर्शन के लोभ में नाम छूट गया तो आधार ही छूट गया।
नाम में यह निष्ठा साधक को इस स्थिति तक ले जाती है कि उसकी दृष्टि में संसार की कोई वस्तु, पद या उपलब्धि नाम–रस से अधिक मूल्यवान नहीं रह जाती।
4. आत्मसमर्पण और प्रेम–लक्षणा भक्ति
- एक अन्य उपदेश में महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि सच्ची भक्ति की शुरुआत आत्म–समर्पण से होती है; प्रेम–लक्षणा भक्ति का प्रथम पायदान ही यह है कि “मैं” और “मेरा” का भाव धीरे–धीरे इष्ट के चरणों में गलने लगे।
- वे सजग करते हैं कि जो कुछ साधन–संसाधन, परिवार, शरीर और सुख भोग रहे हो, वह सब ईश्वर का है; खुद को केवल सेवक या ट्रस्टी मानकर कर्म करो, जीवन हल्का और सुखमय होता जाएगा।
यह आत्मसमर्पण सिर्फ विचार नहीं, व्यवहार में दिखना चाहिए – निर्णय लेते समय, क्रोध आने पर, अपमान मिलने पर भी साधक का मन यही याद करे कि “मैं अपने इष्ट का हूँ, मेरी प्रतिक्रिया भी उन्हीं की मरज़ी से होनी चाहिए।”
5. सत्य, चरित्र और मन की शुद्धि
- महाराज जी ज़ोर देकर कहते हैं कि जिसका चरित्र ठीक नहीं है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता; सच्ची भक्ति और नाम–जप का फल यह होना चाहिए कि जीवन में सत्य, सदाचार और विनम्रता बढ़े।
- वे बताते हैं कि सबसे बड़ा मित्र सत्य है; जो सत्य को स्वीकार करता है, सत्य उसके जीवन की रक्षा करता है और उसे विपत्तियों से बचाता है, क्योंकि झूठ और ढोंग धीरे–धीरे भीतर से तोड़ देते हैं।
मन में उठते काम–वासना या गंदे विचारों पर वे बहुत सरल उपाय देते हैं – उनसे लड़ो मत, उन्हें राधा–नाम में डुबो दो; लगातार नाम–जप, सत्संग और सात्विक जीवन से ही मन की गंदगी धुलती है, और वही भक्ति की सुरक्षित राह है।
6. नाम–जप की शक्ति और विवेक
- महाराज जी बताते हैं कि संतों की मूल “पूँजी” नाम और हरि–कथा की महिमा है; जो यह धन जोड़ता है, उसे रोग, जरा, मृत्यु से परे एक उत्तम पद की प्राप्ति होती है, चाहे वह मोक्ष चाहे या प्रेम।
- वे चेतावनी भी देते हैं कि संशय–युक्त बुद्धि वाला व्यक्ति न शांति पा सकता है, न सुख; भगवान ने भी कहा है – “संशयात्मा विनश्यति”, इसलिए नाम–जप में साधक का मन विश्वास से भरा होना चाहिए।
साथ ही, वे विवेक की महत्ता समझाते हैं – यदि बुद्धि में विवेक नहीं होगा तो मन तुरंत उसे विषय–भोगों के अधीन कर लेगा; जहाँ बुद्धि अधीन हुई, वहाँ या तो राग पैदा होगा या द्वेष, और दोनों ही स्थितियाँ मन को जला देती हैं।
7. “सब में इष्ट को देखना” – भक्ति और ज्ञान का संगम
- महाराज जी के उपदेशों में एक खूबसूरत संतुलन दिखाई देता है – वे कहते हैं कि भक्ति–मार्ग में भजन और नाम–जप ज़रूरी है, और ज्ञान–मार्ग में “सब में नारायण” या “सब में इष्ट” देखना आवश्यक है; अंत में दोनों का फल समदर्शिता ही है।
- साधक के लिए इसका व्यावहारिक रूप यह है कि वह किसी में भी पूर्णता न ढूँढे, न किसी से घृणा करे; हर एक में अपने इष्ट की झलक देखकर सेवा, क्षमा और करुणा से व्यवहार करे, यही नाम–जप की परिपक्वता है।
जब ऐसा भाव आता है, तो इष्ट के नाम में प्रेम केवल जिह्वा तक सीमित नहीं रहता, वह व्यवहार, दृष्टि और संबंधों में भी उतर आता है; यही महाराज जी की समग्र भक्ति–दृष्टि है।
8. व्यावहारिक साधना: नाम को जीवन बना दें
- पूज्य महाराज जी के ये सारे उपदेश मिलकर एक सरल निष्कर्ष देते हैं – इष्ट के नाम को अपने दिनचर्या के केंद्र में ले आओ: उठते ही नाम, काम करते–करते नाम, सोते समय नाम, और कठिन परिस्थितियों में तो विशेष रूप से नाम।youtube+2
- नाम–जप के साथ–साथ सत्यनिष्ठ जीवन, चरित्र की पवित्रता, आत्म–समर्पण की भावना और सब में इष्ट–दर्शन की दृष्टि विकसित करते चलो; यही संयोजन साधक को भीतर से बदलकर उसे भय–रहित, शांति–युक्त और प्रेममय बना देता है।
इसीलिए वे बार–बार समझाते हैं – “इष्ट से भी अधिक, इष्ट के नाम में प्रेम होना चाहिए” – क्योंकि नाम ही वह डोर है, जो हमें हर क्षण अपने आराध्य से जोड़कर रखती है और अंततः उसी नाम के सहारे साधक अपने जीवन की मंज़िल तक पहुँच जाता है






